अक्टूबर 2013

इतिहास दिवाकर
आयतन 6, मुद्दा 3
अक्टूबर
01 अक्ट 2013
इतिहास इतिहास-लेखन दर्शन प्रतीकवाद लोकश्रुति संस्कृति स्वामी विवेकानन्द
अक्टूबर 2013
यह प्रकाशन, 'इतिहास दिवाकर' का अक्टूबर 2013 का अंक, भारतीय इतिहास, संस्कृति और दर्शन पर केंद्रित एक त्रैमासिक अनुसंधान पत्रिका है। इसमें स्वामी विवेकानन्द के परोपकार पर विचार, प्रोफेसर शिवाजी सिंह द्वारा भारतीय इतिहास-लेखन की चुनौतियों और समाधानों का विश्लेषण, तथा पंडित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा 'चिति' के रूप में राष्ट्र के स्वरूप की अवधारणा जैसे लेख शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, 'श्री' और 'स्वस्तिक' जैसे प्रतीकों का महत्व और छत्तीसगढ़, कुल्लू एवं सतलुज घाटी की लोकश्रुतियों में सृष्टि की उत्पत्ति की कथाओं पर भी प्रकाश डाला गया है।
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मुख्य विशेषताएं

भारतीय इतिहास-लेखन में औपनिवेशिक, मार्क्सवादी और राष्ट्रवादी दृष्टिकोणों की चुनौतियों का विश्लेषण और वस्तुनिष्ठ लेखन की आवश्यकता पर बल।

'चिति' की अवधारणा, जो राष्ट्र की स्वाभाविक चिन्तनधारा और सांस्कृतिक मूल्यों का प्रतिनिधित्व करती है, राष्ट्रीय एकात्मता का मूल स्रोत है।

'श्री' और 'स्वस्तिक' जैसे प्राचीन भारतीय प्रतीकों के गहरे सांस्कृतिक, धार्मिक और सौभाग्य सूचक महत्व का विवेचन।

विभिन्न भारतीय क्षेत्रों, जैसे छत्तीसगढ़ और कुल्लू की लोक कथाओं के माध्यम से सृष्टि की उत्पत्ति के वृत्तान्तों का अन्वेषण।

योगदानकर्ताओं

डश
डॉ० शिवाजी सिंह
मार्गदर्शक (Mentor)
चेतराम
मार्गदर्शक
इख
इरविन खन्ना
मार्गदर्शक (Mentor)
डव
डॉ० विद्या चन्द ठाकुर
सम्पादक (Editor)
चग
चेतराम गर्ग
सह सम्पादक (Co-editor)
डर
डॉ० रमेश शर्मा
सम्पादक मण्डल
डओ
डॉ० ओम प्रकाश शर्मा
सम्पादक मण्डल
अक
अश्वनी कालिया
टंकण एवं सज्जा
सव
स्वामी विवेकानन्द
लेखक (Author)
पश
प्रो. शिवाजी सिंह
लेखक (Author)
पद
पं. दीनदयाल उपाध्याय
लेखक (Author)
लश
ललित शर्मा
लेखक (Author)
कत
किशोर तारे
लेखक (Author)
डस
डॉ० सूरत ठाकुर
लेखक (Author)
दश
दीपक शर्मा
लेखक (Author)

प्रकाशन सारांश

सम्पादकीय

राष्ट्रीय एकात्मता का विलक्षण शक्ति स्रोत

हम सब ने बार-बार पढ़ा और सुना है कि भारतीय संस्कृति की सब से बड़ी विशेषता उसकी आध्यत्मिकता है। क्या अर्थ है, इस कथन का? क्या एक सामान्य भारतीय एक औसत अमेरिका या चीनी नागरिक से अधिक आध्यत्मिकता होता है? नहीं, ऐसा समझना गलत होगा। हम भारतीय उतने ही अच्छे या बुरे हैं जितने अन्य देशों के नागरिक। फिर भी, एक औसत भारतीय के विषय में एक विलक्षण बात यह है कि वह स्वयं जैसा भी हो, एक सन्त या महात्मा के प्रति उसके मन में आत्मस्फूर्त अगाध श्रद्धा उपजती है। बड़े-बड़े शक्तिशाली राजनेता या धनाढ्य के लिए उसके अन्तःकरण में अकृत्रिम और आत्मस्फूर्त आदर भाव नहीं होता। सन्त और महात्मा ही उसका आदर्श है। यही और इसी प्रकार के अन्य आदर्श जो हमारे अन्तःकरण या चित्त में रच-बसे हैं, हमारे सांस्कृतिक मूल्य हैं। सुविख्यात इतिहासविद् डॉ० शिवाजी सिंह के उपरोक्त विचारों को स्वामी विवेकानन्द ने इस रूप में अभिव्यक्त किया है –

क्या आपने ऐसे देश का नाम सुना है जिसके बड़े-बड़े राजा अपने को अरण्यवासी अर्धनग्न तपस्वियों की सन्तान कहने में ही अधिक गौरव समझते हैं? यदि आपने न सुना हो तो सुनिए – हमारी मातृभूमि ही वह देश है। दूसरे देशों में बड़े-बड़े धर्माचार्य अपने को किसी राजा का वंशधर कहने की बड़ी चेष्टा करते हैं, लेकिन भारतवर्ष में बड़े-बड़े राजा अपने को किसी ऋषि की सन्तान प्रमाणित करने की चेष्टा करते हैं।

भारतवर्ष के ये सांस्कृतिक मूल्य हमारे राष्ट्र की प्रकृति है। यही प्रकृति राष्ट्र की स्वाभाविक चिन्तनधारा है जिसे चिति कहा जाता है। चिति की अवधारणा पर पण्डित दीनदयाल उपाध्याय का गहन विश्लेषण अवलोकनीय है। चिति राष्ट्रीय एकात्मता का विलक्षण शक्ति स्रोत है जिसमें राष्ट्र का स्पष्ट स्वरूप प्रकट होता है। राष्ट्र के इतिहास बोध के लिए चिति का बोध अत्यावश्यक है।

विवेकानन्दामृतम्

परोपकार में ही अपना उपकार

स्वामी विवेकानन्द

यह विचार करने से पहले कि कर्तव्यनिष्ठा हमें आध्यात्मिक उन्नति में किस प्रकार सहायता पहुँचाती है, मैं तुम लोगों का संक्षेप में यह भी बता देना चाहता हूँ कि भारत में जिसे हम कर्म कहते हैं, उसका एक दूसरा पक्ष क्या है। प्रत्येक धर्म के तीन विभाग होते हैं। प्रथम दार्शनिक, दूसरा पौराणिक और तीसरा कर्मकाण्ड। दार्शनिक भाग तो वास्तव में प्रत्येक धर्म का सार है। महापुरुषों की कम या अधिक काल्पनिक जीवनी तथा अलौकिक विषय सम्बन्धी कथाओं एवं आख्यायिकाओं द्वारा पौराणिक भाग इस दार्शनिक भाग की व्याख्या करता है। कर्मकाण्ड इस दर्शन को और भी स्थूल रूप देता है, जिससे वह सर्वसाधारण की समझ में आ सके। वास्तव में अनुष्ठान दर्शन का ही एक स्थूलतर रूप है। यह अनुष्ठान ही कर्म है। प्रत्येक धर्म में इसकी आवश्यकता है, क्योंकि जब तक हम आध्यात्मिक जीवन में बहुत उन्नत न हो जाएँ, तब तक सूक्ष्म आध्यात्मिक तत्त्वों को समझ नहीं सकते।

दूसरों के प्रति हमारे कर्तव्य का अर्थ है-- दूसरों की सहायता करना, संसार का भला करना। हम संसार का भला क्यों करें? इसलिए कि देखने में तो हम संसार का उपकार करते हैं, परन्तु असल में हम अपना ही उपकार करते हैं। हमें सदैव संसार का उपकार करने की चेष्टा करनी चाहिए, और कार्य करने में यही हमारा सर्वोच्च उद्देश्य होना चाहिए। परन्तु यदि ध्यानपूर्वक देखा जाए, तो प्रतीत होगा कि संसार को हमारी सहायता की बिल्कुल आवश्यकता नहीं। यह संसार इसलिए नहीं बना कि हम अथवा तुम आकर इसकी सहायता करें।

संवीक्षण

भारतीय इतिहास लेखन में चुनौतियां और समाधान

प्रो. शिवाजी सिंह

भारतीय इतिहास कई दृष्टियों से लिखा गया है और लिखा जा रहा है। फलतः इसके विविध प्रकार के संस्करण जिनमें परम्परा विरोधी स्वर एवं निष्कर्ष उपलब्ध होते हैं, साथ-साथ प्रचलित है। इससे एक संभ्रमात्मक स्थिति उत्पन्न है और राष्ट्रीय प्रगति के लिए अत्यावश्यक इतिहास-चेतना के समुचित निर्माण में बाधा उत्पन्न हो रही है। प्रश्न है, ऐसा क्यों? ऐतिहासिक यथार्थ एक, पर व्याख्यायें अनेक क्यों? इस प्रश्न पर विचार करेंगे तो पायेंगे कि ऐतिहासिक व्याख्याओं या निर्वचनों में मिलने वाली विभिन्नतायें दो प्रकार से उत्पन्न हुई हैं। एक कोटि उन विभिन्नताओं की है जो अचिन्तित या अनवधानित (इनऐडवर्टेट) हैं। दूसरी कोटि उन विभिन्नताओं की है जो सोद्देश्य (इंटेंशनल) हैं अर्थात् जानबूझकर उत्पन्न की गई है।

ऐतिहासिक व्याख्याओं की अनवधानित विविधता

ऐतिहासिक यथार्थ इतिहासकार के मन-मस्तिष्क से गुजर कर ही लिखित इतिहास का स्वरूप ग्रहण करता है। इस प्रक्रिया में इतिहासकार की भूमिका उस दर्पण के तुल्य होती है जिसमें वास्तविक जगत की वस्तुओं के प्रतिबिम्ब बनते हैं। दर्पण जितना ही त्रुटिहीन बना होता है, प्रतिबिम्ब उतने ही अधिक स्पष्ट और वस्तु के अधिकाधिक समरूप बनते हैं। जबकि दर्पण के त्रुटिपूर्ण होने पर प्रतिबिम्ब विकृत हो जाते हैं। इतिहासकार का दायित्व भी ऐतिहासिक यथार्थ का यथासम्भव वास्तविक चित्र उकेरना है किन्तु इस सन्दर्भ में उसका कार्य दर्पण से कहीं अधिक दुष्कर है। कारण, इतिहासकार जिस ऐतिहासिक यथार्थ को प्रतिबिम्बित करना चाहता है वह दर्पण के सम्मुख रखी गई किसी वस्तु के समान साकार नहीं होता।

सोद्देश्य की गई ऐतिहासिक व्याख्यायें

इतिहास एक अनुशासन है। उसकी अपनी सुनिश्चित एवं सार्वभौमिक शोध-पद्धतियां और क्रियाविधियां है। उसके अपने मानक या आदर्श (नार्म्स) हैं। इस अनुशासन की एक सुस्थापित वैश्विक मान्यता यह है कि इतिहासकार का कार्य एक न्यायाधीश की तरह तथ्यों एवं साक्ष्यों के सम्यक् जांच-पड़ताल के बाद निष्कर्ष पर पहुंचना है। निष्कर्षों के अवनिश्चयन में वह तटस्थ होता है।