जुलाई 2019

इतिहास दिवाकर
आयतन 12, मुद्दा 2
जुलाई
01 जुल 2019
इतिहास खगोल विज्ञान योग लिपिविज्ञान लोक साहित्य विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्कृति हिमाचल प्रदेश
जुलाई 2019
इतिहास दिवाकर का जुलाई 2019 अंक एक त्रैमासिक अनुसंधान पत्रिका है जो विभिन्न ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विषयों पर केंद्रित है। इस अंक में प्राचीन चीन पर भारतीय विज्ञान के प्रभाव, हिमाचल प्रदेश की 'साञ्चा' पांडुलिपियों की लिपियों, और सिरमौर के योद्धा नेगी नतीराम की लोकगाथा जैसे विषयों पर गहन लेख शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, यह चम्बा की लोकगाथाओं में रामायण के प्रसंग, भारतीय खगोल-अवलोकन परंपरा, हठयोग के आसनों पर एक तुलनात्मक अध्ययन और गुरु-शिष्य परंपरा में महर्षि वेदव्यास के महत्व पर भी प्रकाश डालता है।
Facebook पर साझा करें Twitter पर साझा करें LinkedIn पर साझा करें
लिंक कॉपी हो गया!

मुख्य विशेषताएं

प्राचीन चीन पर भारतीय विज्ञान के गहरे प्रभाव का अन्वेषण, जिसमें गणित, चिकित्सा और खगोलशास्त्र के क्षेत्र में भारत के योगदान पर प्रकाश डाला गया है।

हिमाचल की दुर्लभ 'साञ्चा' पांडुलिपियों और उनकी प्राचीन लिपियों जैसे पाबुची, भट्टाक्षरी और पण्डवाणी का विस्तृत विश्लेषण, जो इस क्षेत्र की समृद्ध विरासत को दर्शाता है।

सिरमौर के वीर योद्धा नेगी नतीराम की 'हारूल' (लोकगाथा) का ऐतिहासिक वर्णन, जो मुगलों के खिलाफ उनके संघर्ष को जीवंत करती है।

योगदानकर्ताओं

डश
डॉ. राकेश कुमार शर्मा
सम्पादक (Editor)
डव
डॉ. विवेक शर्मा
सह सम्पादक (Co-editor)
डध
डॉ. धर्म चन्द चौबे
लेखक (Author)
डओ
डॉ. ओम प्रकाश शर्मा
लेखक (Author)
पश
प्रो. शिव भारद्वाज
लेखक (Author)
चस
चंचल सरोलवीं
लेखक (Author)
वक
विनोद कुमार शर्मा
लेखक (Author)
वन
विकास नड्डा
लेखक (Author)
डओ
डॉ. ओम दत सरोच
लेखक (Author)
पच
प्यार चन्द परमार
लेखक (Author)
गांव नेरी, डा. खगल, जिला हमीरपुर (हि.प्र.)
डश
डॉ० शिवाजी सिंह
मार्गदर्शक (Mentor)
इख
इरविन खन्ना
मार्गदर्शक (Mentor)
चग
चेतराम गर्ग
मार्गदर्शक (Mentor)

प्रकाशन सारांश

सम्पादकीय

भारतीय इतिहास परम्परा

भारतीय इतिहास परम्परा लोक कल्याणकारी है। यह मानव और प्रकृति के सर्वपक्षों के अध्ययन और चिन्तन पर निहित है। ज्ञान का प्रचार–प्रसार सम्पूर्ण मानव समुदाय में हो, यह आदि काल से ही भारत में दिखाई देता है। भारत की विश्व को देन–मानवता का चिन्तन सर्वोपरि है, तो भी जब हम अन्य क्षेत्रों पर भी दृष्टि डालते हैं तो भारत के विज्ञान, गणित तथा खगोल विद्या का विशेष महत्त्व है। प्राचीन चीन को भारतीय विज्ञान का अभिज्ञान लेख इस ओर ही संकेत करता है।

इतिहास दिवाकर पत्रिका तथा इतिहास शोध संस्थान नेरी परिवार हिन्दू धर्म एवं संस्कृति के महान सन्त, समाज सेवक, हिन्दू धर्म ध्वजवाहक स्वामी सत्यामित्रानन्द गिरि महाराज को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता है जो कलियुगाब्द ५१२१, विक्रमी संवत् २०७६ (२५ जून, २०१९) को ब्रह्मलीन हो गए। स्वामी जी सामाजिक समरसता के वाहक तथा हिन्दू समाज में आई कमजोरियों को समाप्त करने हेतु दृढ़ संकल्पित थे। उन्होंने हरिद्वार में भारत माता मन्दिर का निर्माण किया जिसका संदेश भारत राष्ट्र की एकात्म शक्ति को जागृत करता है। उनके द्वारा विश्व हिन्दू परिषद्, गौरक्षा व गिरि कन्दराओं में रह रहे वनवासी बन्धुओं के लिए किए गए सेवा कार्य शताब्दियों तक स्मरण किए जाते रहेंगे।

भारत में मई, २०१९ में सम्पन्न हुए चुनाव का जब हम निपक्ष अवलोकन करते हैं तो समझ आता है कि भारतीय मतदाता ने अब जाति, सम्प्रदाय का त्यागकर सार्वभौमिक एकत्व, भारत माँ की अस्मिता को एक सशक्त नेतृत्व के हाथ में सौंपने का संकल्प दिखाया है। यह आम भारतीय की सूझ-बूझ का परिणाम है। विश्वास की इसी कड़ी में सर्वभौम की उन्नति है।

हिमाचल प्रदेश में द्वितीय भाषा के रूप में संस्कृत को मान्यता प्राप्त होना गौरव की बात है। अपने सार्थक प्रयासों के लिए संस्कृत भारती तथा हिमाचल सरकार को साधुवाद। इस अंक में प्राचीन साञ्चा ग्रन्थों में लिपियों और महान योद्धा नतीराम (नोतीराम) की हारूल गाथा (यशोगान) हमें विशेष प्रेरणा देती है।

ऋषि परम्परा भारतीय समाज की एक उत्कृष्ट विरासत है। ऋषि ज्ञान के स्रष्टा है। उन्होंने उस ज्ञान को अनुभूत कर सूत्र व मन्त्र रूप में समाज को दिया है। शोध संस्थान नेरी कलियुगाब्द ५१२१, विक्रमी संवत् २०७६ (१०,११,१२ नवम्बर, २०१९) को 'पश्चिम हिमालय में ऋषि परम्परा' विषय पर राष्ट्रीय परिसंवाद आयोजित करने जा रहा है।

प्राचीन चीन को भारतीय विज्ञान का अभिज्ञान

डॉ. धर्मचन्द चौबे

विश्व की दो महान सभ्यताएं हिमालय के इस पार और उस पार अनादिकाल से चली आ रही है जो हमें भौगोलिक तथा सांस्कृतिक समानता के अनेक पक्षों का दर्शन करवाती है। १६वीं शताब्दी के अन्तिम दशक में मथुरा के एक डॉक्टर ब्रिटिश भारत की सेना के साथ चीन गये थे। उन्होंने बंदरगाह नगरों (Port towns) के घेरे से बाहर निकलकर दक्षिणी चीन के देहात और अन्य नगरों में भ्रमण किया था और वे आश्चर्यचकित रह गए कि हिमालय के दोनों ओर के निवासियों की सोच, रीति-रिवाज, पहनावा, वैज्ञानिक व्यवहार, भाषा, बोली, गीत, गणित, रसायनशास्त्र, चिकित्सा पद्धति, जड़ी बूटियों का ज्ञान, विवाह के रस्मों-रिवाज में कितनी समानता है। उन्होंने कहा कि हिमालय पर्वत अगर नहीं होता तो दोनों देश ‘यूरेशिया' की तरह ही एक भौगोलिक और सांस्कृतिक इकाई होते।

हिमालयी उपत्यका और रानीपूल नदी के पश्चिमी तट पर बसा गंगटोक उस ऐतिहासिक महामार्ग पर स्थित है जो तिब्बत के ल्हासा से ताम्रलिप्ति बन्दरगाह और वहां से दक्षिणी-पूर्वी एशिया के श्रीविजय साम्राज्य तक जाता था। गंगटोक से चीन को जोड़ने वाले दरें है – नाथुला और जलेपला। कभी इस मार्ग से भारतीय संस्कृति, धर्म और विज्ञान चीन देश में गये थे। विज्ञान के क्षेत्र में चीन को भारत की देन गणित, चिकित्सा और खगोलशास्त्र का वर्णन इस शोध पत्र में प्रस्तुत है।

पाँचवी सदी में संपादित चीन के सोंग वंश के इतिहास से जानकारी मिलती है कि भारत की तरह चीन भी २८ नक्षत्रों और नवग्रह की जानकारी रखता था। उनका भी सूर्य भारत की तरह १२ राशियों में परिभ्रमण करता था। बाद में टांग कालीन चीन में भारतीय खगोल की कई पुस्तकें गई और चीनी विद्वानों ने वर्तमान चीन में प्रचलित खगोलीय ज्ञान को विकसित किया। तीसरी शताब्दी के बाद भारत और चीन के मध्य वस्तुओं और विचारों का आदान-प्रदान तेजी से बढ़ा। टांग चीन में २१ भारतीय खगोल की पुस्तकों का चीनी भाषा में अनुवाद हुआ। मातंगीसूत्र का भी चीनी में अनुवाद हुआ। धर्मरुचि नामक खगोलशास्त्री ने ३० खगोलशास्त्र के ग्रंथों का चीनी में अनुवाद किया। भारतीय खगोलशास्त्री खरोष्ठ की पुस्तक महासन्निपात सूत्र का चीनी भाषा में अनुवाद हुआ। यह वह समय है जब गुप्तकालीन भारत का विज्ञान दुनिया में फैल गया।

हिमाचल के साञ्चा ग्रन्थों की लिपियां

डॉ. ओम प्रकाश शर्मा

हिमाचल के शिमला, सिरमौर तथा सोलन जिलों व उत्तराखण्ड के जौंसार-बावर आदि जनपदीय गांव में असंख्य साञ्चा पाण्डुलिपियां उपलब्ध हैं। ये साञ्चा ग्रन्थ पाबुची, भट्टाक्षरी, पण्डवाणी और चन्दाणी (चन्दवाणी) लिपियों में निबद्ध हैं। इन लिपियों पर प्रकाश डालने से पूर्व यहां इन साञ्चों में निबद्ध विषयवस्तु को रेखांकित करना अपेक्षित है। वस्तुतः वैदिक वाङ्मय की विषयवस्तु ही सूत्र रूप में इन साञ्चा ग्रन्थों में विद्यमान है।

वेद, ब्राह्मणग्रन्थ, आरण्यक, उपनिषद् और वेदाङ्ग वैदिक वाङ्मय के आधारभूत प्रकाश स्तम्भ हैं। सम्पूर्ण वैदिक ज्ञान अथवा वैदिक मन्त्रों में निहित ज्ञान परवर्ती स्मृति ग्रन्थों, रामायण, महाभारत, दर्शन ग्रन्थों और पुराणों में भी निबद्ध हुआ। यही ज्ञान आदिकाल से समाज के जीवन दर्शन का निर्माण करता आया है। ज्ञान के ये आधारभूत गन्थ प्राच्यविद्या के रूप में विश्व-समुदाय के समक्ष आए। वैदिक ज्ञान या मन्त्र तीन भागों में विभाजित है, जिन्हें त्रिकाण्ड कहते हैं। ये त्रिकाण्ड – ज्ञान काण्ड, कर्मकाण्ड और उपासना काण्ड रूप में प्रसिद्ध हैं। ज्ञानकाण्ड में सृष्टि, स्थिति और लय के दार्शनिक सिद्धान्त निबद्ध हैं। वेदाङ्ग ज्योतिष त्रिकाल ज्ञान का कालगणना के सिद्धान्तों के अनुरुप विवरण प्रस्तुत करता है। कर्मकाण्ड में आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक इन त्रितापों से उपजे दुःखों के निवारण के सिद्धान्त निहित हैं। षोडष संस्कार के कर्म इसके प्रबल प्रमाण हैं। उपासना काण्ड में जीवन दर्शन के दार्शनिक सूत्रों के साथ-साथ तन्त्र, मन्त्र और यन्त्र के सिद्धान्त निबद्ध हैं। प्राच्यविद्या के रूप में विख्यात उपर्युक्त भारतीय शास्त्र अथवा विद्याएं सत्यं, शिवं और सुन्दरम् पक्षों को समेटे हुए हैं। ये पक्ष जन कल्याण की बात कहते हैं।