अप्रैल २०२१

इतिहास दिवाकर
आयतन 14, मुद्दा 1
अप्रैल
01 जन 2020
कश्मीर संघर्ष भारतीय इतिहास वैदिक अध्ययन संस्कृति समाज सुधार स्वतंत्रता संग्राम हिमाचल प्रदेश
अप्रैल २०२१
यह 'इतिहास दिवाकर' का अप्रैल 2021 का अंक है, जो विविध ऐतिहासिक विषयों पर केंद्रित है। इसमें नववर्ष प्रतिपदा का विश्लेषण, ऋग्वेद और गद्दी जनजाति की सृष्टि रचना की तुलना, कश्मीर में सैयदों और कश्मीरियों के संघर्ष, भारत में रोहिल्ला शक्ति का विस्तार, और राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाओं की भूमिका जैसे लेख शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, वजीर रामसिंह पठानिया के जीवन, पुजारली गांव के इतिहास, और डॉ. हेडगेवार व पं. दीनदयाल उपाध्याय पर पुस्तक समीक्षाएं भी प्रस्तुत की गई हैं।
Facebook पर साझा करें Twitter पर साझा करें LinkedIn पर साझा करें
लिंक कॉपी हो गया!

मुख्य विशेषताएं

भारतीय कालगणना के वैज्ञानिक और सार्वभौमिक आधार का विश्लेषण, जिसमें दिन, मास, युग और कल्प की विस्तृत चर्चा की गई है।

कश्मीर में सैयदों और तुर्क-मंगोलों के सांस्कृतिक आक्रमण और उसके परिणामस्वरूप कश्मीरियों के साथ हुए गहरे संघर्ष की ऐतिहासिक पड़ताल।

राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी में सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों की महत्वपूर्ण भूमिका पर एक विस्तृत लेख।

वीर योद्धा वजीर रामसिंह पठानिया के साहसिक जीवन का वर्णन, जिन्होंने 1857 के संग्राम से पहले ही ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी थी।

योगदानकर्ताओं

डश
डॉ. राकेश कुमार शर्मा
सम्पादक (Editor)
डव
डॉ. विवेक शर्मा
सह सम्पादक
आव
आचार्य विजय
लेखक (Author)
नर
निकू राम
लेखक (Author)
डक
डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
लेखक (Author)
कुलपति, हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला
डन
डॉ. नवीन.सी. गुप्ता
लेखक (Author)
सहायक आचार्य, इतिहास विभाग, एन.ए.एस.पी.जी कॉलेज मेरठ
AB
Dr. Ankush Bhardwaj
लेखक (Author)
Assistant Professor, Deptt. Of History, ICDEOL, Himachal Pradesh University, Shimla
रस
राजेन्द्र सिंह सम्बयाल
लेखक (Author)
डओ
डॉ. ओम प्रकाश शर्मा
लेखक (Author)

प्रकाशन सारांश

इतिहास दिवाकर - अप्रैल २०२१

सम्पादकीय

आज़ादी का अमृत महोत्सव

भारत आज़ादी के ७५वें वर्ष में पहुंच गया है। प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने कलियुगाब्द ५१२२, विक्रमी संवत् २०७७, १२ मार्च, २०२१ को इस बात को कहते हुए शुभारम्भ किया- 'आज़ादी के अमृत महोत्सव का अर्थ स्वतन्त्रता की ऊर्जा का अमृत है। जिसमें स्वातन्त्र्य योद्धाओं की प्रेरणा, नए विचारों, संकल्पों तथा आत्मनिर्भरता का अमृत है।' उन्होंने स्वतन्त्रता संग्राम से उत्पन्न विचारों, उपलब्धियों, कार्यवाही और संकल्प से उत्पन्न ऊर्जा से वर्तमान में अपने सपनों और दायित्त्व के लिए प्रेरणा देने वाला बताया है।

भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन में समाज का हर वर्ग अमीर-गरीब, किसान-मजदूर, साधु-संयासी सभी सामूहिक रूप से ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए आन्दोलित हुआ। उसका स्मरण करना और युवा पीढ़ी के समक्ष उन जन-आन्दोलनों, घटनाओं, महापुरुषों और संस्थाओं के कार्य का विस्तार से चर्चा खड़ी करना राष्ट्र को एकताबद्ध करने का सुअवसर है।

पर्व विशेष: नववर्ष प्रतिपदा

आचार्य विजय

नववर्ष अभिनन्दन जहां राष्ट्र के हर्षोल्लास, नवोत्साह और दृढ़ विश्वास युक्त वातावरण का निर्माण करता है, वहीं कई ऐतिहासिक पक्षों को जागृत करता है। भारतीय काल-विज्ञान एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक पक्ष है। भारतीय मनीषियों ने ब्रह्माण्ड, खगोलीय पिण्डों और ग्रहों की गति-युति आदि विषयों का चिरकाल पर्यन्त सूक्ष्म अध्ययन कर भारतीय संस्कृति और ज्ञान परम्परा को वैज्ञानिक और सार्वभौमिक कालगणना नामक विषय प्रदान किया। दिन, पक्ष, मास, वर्ष, युग, महायुग, मन्वन्तर और कल्प आदि इस शोध पत्र के मुख्य विषय हैं।

महान वेदज्ञ यास्काचार्य काल की व्युतपत्ति करते हुए लिखते हैं कि कालः कालयतेर्गतिकर्मणः अर्थात् काल शब्द गत्यर्थक कल् धातु से घञ् प्रत्य करने पर बनता है। इस व्युत्पत्ति से स्पष्ट है कि काल का सम्बन्ध गति से है। परमेश्वर सम्पूर्ण चराचर जगत् को गति प्रदान करता है। अतः उसका एक नाम काल शब्द से अभिहित है।

संवीक्षण: ऋग्वेद एवं गद्दी जनजाति की लोकगाथाओं में सृष्टि रचना - एक तुलनात्मक अध्ययन

निकू राम

ज्ञानराशि वेद मानव समाज में ज्ञान के आदि स्रोत हैं। मन्त्रद्रष्टा ऋषियों द्वारा अनुभवसिद्ध एवं साक्षात्कृत दिव्य ज्ञान वेदमन्त्रों में निबद्ध हैं। मानवीय सद्गुणों के पोषक सर्वोच्च सांस्कृतिक मूल्यों का प्रतिपादन वेदों में हुआ है। इसी दिव्य वेद ज्ञान के गूढ़तम विषयों को लोकसामान्य की ग्रहण क्षमता के अनुकूल बनाने हेतु इनकी पुराणों, दर्शन शास्त्रों, स्मृति आदि धर्मशास्त्रों तथा विभिन्न शास्त्रीय ग्रन्थों में विस्तारपूर्वक सरल व्याख्या हुई है। वेद के प्रकृत विभिन्न विषयों में से एक सृष्टि-रचना सम्बन्धी आख्यान लोक में प्रचलित है। हिमाचल प्रान्त की सुदूर भरमौर (ब्रह्मपुर) वास्तव्य गद्दी जनजाति की लोकगाथा जलबिम्बी में सृष्टि-रचना और सृष्टि से पूर्व की परिस्थितियों का वर्णन है, जिसका उपजीव्य ऋग्वेद का नासदीय सूक्त एवं हिरण्यगर्भ सूक्त तथा पुराणादि में वर्णित सृष्टि-रचना तत्त्व हैं।

संवीक्षण: कश्मीर का रिसता घाव : सैयदों व कश्मीरियों का संघर्ष

डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

कश्मीरी साहित्य विशेषकर कश्मीरी लोक साहित्य में अरब के सैयदों और मध्य एशिया के तुर्क-मंगोलों द्वारा कश्मीर पर किए गए सांस्कृतिक आक्रमण की वेदना सर्वत्र देखी जा सकती है। वैसे तो भारत वर्ष पर अरब व मध्य एशिया के आक्रमणों से उत्पन्न स्थितियों का विश्लेषण सभी भारतीय भाषाओं में मिलता है लेकिन कश्मीर घाटी की वेदना ज्यादा गहरी है क्योंकि वहाँ सांस्कृतिक आक्रमण ज्यादा गहरा व प्रभावी रहा और किसी न किसी रूप में आज भी जारी है। इतना ही नहीं कालान्तर में घाटी का सत्ता पक्ष भी अरब के सैयदों और मध्य एशिया के तुर्क-मंगोलों के साथ मिल गया लगता था। कश्मीर घाटी में आज भी जिस सैयद की सबसे ज्यादा चर्चा होती है वह सैयद अली हमदानी था।

संवीक्षण: भारत में रोहिल्ला शक्ति का विस्तार और क्षेत्रीय शक्तियों का संघर्ष

डॉ. नवीन सी. गुप्ता

अफगान के मूल निवासी रूहेलों ने अपनी शक्ति के बूते मध्य हिमालय क्षेत्र के कुमाऊं और गढ़वाल के सैन्य अभियानों के द्वारा, साथ-साथ रुहेलखंड की सरजमी को भी अपने अधिकार में ले लिया था। यह ऐसे ऐतिहासिक घटनाक्रम थे, जिसने धीरे-धीरे भारतीय मध्यकालीन इतिहास की धारा को मोड़ने का काम किया, जिसकी ऐतिहासिक दृष्टिकोण से मीमांसा करना ही इस शोध पत्र का उद्देश्य है। यह तथ्य सर्वविदित है कि भारतीय संस्कृति ने हमेशा शरणागत की रक्षा का उद्घोष और महान आदर्श लेकर जिन विधर्मी शरणार्थियों को अपने यहां शरण दी, उन्होंने हमारी संस्कृति और सभ्यता के आदर्शों व नैतिक मूल्यों को व्यापक क्षति पहुंचाते हुए यहां पर आधिपत्य स्थापित करने का काम किया, जो उनके मूल चरित्र और उनकी प्रवृत्ति को दर्शाता है।

व्यक्ति विशेष: वजीर रामसिंह पठानिया का साहसिक एवं संघर्षमय जीवन

राजेन्द्र सिंह सम्बयाल

अंग्रेजों के दमनचक्र के खिलाफ अगर १८५७ के स्वतन्त्रता संग्राम का आन्दोलन हुआ तो उसकी पहली चिंगारी वजीर रामसिंह पठानिया के रूप में फूटी थी। विधर्मी अंग्रेजी हुकूमत की ज्यादतियों के खिलाफ पहली तलवार वजीर रामसिंह पठानिया की उठी। जिन्होंने नूरपुर रियासत को अंग्रेजों से स्वतन्त्र करवा लिया था। किशोरवय उम्र में वीर रामसिंह पठानिया ने यह दिखा दिया कि अकेले चलकर भी विरोध की ऐसी चिंगारी पैदा की जा सकती है जो अन्याय की हुकूमत को घुटने के बल पर खड़ा कर दे।