अक्टूबर 2019

इतिहास दिवाकर
आयतन 12, मुद्दा 3
अक्टूबर
01 अक्ट 2019
1857 की क्रांति इतिहास औपनिवेशिक भारत गुरु नानक देव जलियांवाला बाग भारतीय स्वतंत्रता संग्राम महात्मा गांधी राष्ट्रवाद
अक्टूबर 2019
यह प्रकाशन 'इतिहास दिवाकर' का अक्टूबर 2019 का अंक है। यह अंक राष्ट्रवादी इतिहासकार प्रो. सतीश मित्तल को समर्पित है, जिसमें उनके जीवन और योगदान पर एक विस्तृत लेख शामिल है। इसमें औपनिवेशिक काल में भू-सर्वेक्षण, गुरु नानक देव जी के काव्य में समकालीन चित्रण, जलियांवाला बाग नरसंहार, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के संदर्भ में गांधी, और 1857 की क्रांति जैसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक विषयों पर शोध लेख शामिल हैं। साथ ही, यह अंक राष्ट्रीय महत्व की हालिया घटनाओं पर भी संपादकीय टिप्पणी प्रस्तुत करता है।
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मुख्य विशेषताएं

यह अंक प्रख्यात राष्ट्रवादी इतिहासकार प्रो. सतीश मित्तल को समर्पित है, जिसमें उनके अकादमिक जीवन, लेखन यात्रा और राष्ट्र के प्रति उनके योगदान का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।

जलियांवाला बाग नरसंहार की भयावह घटना और 1857 की महान क्रांति में कसौली के योगदान जैसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महत्वपूर्ण पहलुओं पर गहन शोध प्रस्तुत किया गया है।

गुरु नानक देव जी की 550वीं जयंती और महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में, उनके दर्शन, सामाजिक सुधारों और समकालीन समाज पर उनके प्रभाव का विश्लेषण किया गया है।

औपनिवेशिक काल में ब्रिटिशों द्वारा किए गए भारतीय भू-सर्वेक्षण के उद्देश्यों, तरीकों और प्रभावों पर एक विश्लेषणात्मक लेख शामिल है, जो राजस्व और प्रशासन पर केंद्रित है।

योगदानकर्ताओं

डश
डॉ. राकेश कुमार शर्मा
सम्पादक (Editor)
डव
डॉ. विवेक शर्मा
सह सम्पादक
चग
चेतराम गर्ग
लेखक (Author)
लश
लकी शर्मा
लेखक
डक
डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
लेखक (Author)
कुलपति, हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला
डप
डॉ. प्रशान्त गौरव
लेखक
डश
डॉ. शिवाजी सिंह
मार्गदर्शक मण्डल
पक
प्रो. कुमार रत्नम
मार्गदर्शक मण्डल
नई दिल्ली
पच
प्यार चन्द परमार
व्यवस्थापक
गांव नेरी, डा. खगल, जिला हमीरपुर (हि.प्र.)

प्रकाशन सारांश

इतिहास दिवाकर - अक्टूबर २०१९

अनुक्रमणिका

  • सम्पादकीय
  • व्यक्तित्व
    • राष्ट्रवादी इतिहासकार – प्रो. सतीश मित्तल (चेतराम गर्ग)
  • संवीक्षण
    • औपनिवेशिक काल में भारतीय भू-सर्वेक्षण (लकी शर्मा)
    • दशगुरु परम्परा के प्रथम गुरु श्री नानक देव जी के काव्य में समकालीन चित्रण (डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री)
    • जलियांवाला बाग नरसंहार : बलिदानी प्रथा (डॉ. प्रशान्त गौरव)
    • सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के परिप्रेक्ष्य में गांधी (डॉ. जयप्रकाश सिंह)
    • १८५७ की महान क्रान्ति में कसौली का योगदान (डॉ. ओम प्रकाश शर्मा)
    • श्रीमद्भागवत पुराण में काल विवेचन (डॉ. ओम दत्त सरोच)
    • एक सतत् संघर्षशील योद्धा – पण्डित जयकृष्ण शर्मा (भूमिदत्त शर्मा)
  • ध्येय-पथ
    • गतिविधियां (प्यार चन्द परमार)

सम्पादकीय

राष्ट्राय स्वाहा, इदं न मम

सुविख्यात इतिहासकार प्रो. सतीश मित्तल जी का आकस्मिक परलोक गमन राष्ट्रवादी चिन्तकों तथा इतिहासविज्ञों के लिए एक अपूर्णीय क्षति है। मित्तल जी बाल्यकाल से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गए थे, जिसका प्रभाव इनके लेखन एवं अध्ययन में प्रत्यक्ष परिलक्षित होता है। वे अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना समिति के संस्थापक सदस्य तथा राष्ट्रीय स्तर के विभिन्न दायित्वों का निर्वहण करते हुए सन् २०१२ से अब तक राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। ब्रिटिश साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा गढ़े गए मिथ्या सिद्धान्तों का प्रो. मित्तल ने सत्य साक्ष्यों के आधार पर अपनी सशक्त लेखनी से खण्डन किया। उन तथाकथित इतिहासकारों पर भी उन्होंने प्रहार किया जो तथाकथित इतिहास के अध्येता के पद पर होने पर भी यूरोपीय विचारों का ही पोषण कर रहे थे। इस अंक में शोध संस्थान के निदेशक चेतराम गर्ग जी के साथ उनकी भेंट वार्ता व संस्मरण को भी सम्मिलित किया जा रहा है। हम यह अंक ऐसे मनीषी के चरणों में सादर समर्पित करते हैं।

केन्द्र सरकार का कश्मीर के मुद्दे पर लिया गया ऐतिहासिक फैसला तथा तीन तलाक का साहसिक निर्णय इस तिमाही के राजनीतिक परिदृश्य के केन्द्र में रहे। यह प्रयास केन्द्र में एक मजबूत सरकार होने के परिणामों को परिलक्षित करता है। चन्द्रयान-२ अभियान भारत की अन्तरिक्ष यात्रा का एक बड़ा पड़ाव है। वैज्ञानिकों का साहस और मेहनत उस दिशा में किया जाने वाला बड़ा अभियान राष्ट्र की उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है। गत माह शोध संस्थान तथा हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला के संयुक्त तत्वावधान में 'जलियांवाला बाग नरसंहार' विषय पर दो दिवसीय परिसंवाद का आयोजन हुआ।

प्रस्तुत अंक गुरु नानक देव जी के ५५०वें प्रकाश उत्सव पर्व, गांधी जी की १५०वीं जयन्ती, जलियांवाला बाग नरसंहार आदि विषयों के पक्षों को केन्द्र बिन्दु में रखकर पाठकों को समर्पित किया जा रहा है। सुझाव व प्रोत्साहन सम्बन्धी संपर्क अपेक्षित है। दीपावली की मंगल कामनाओं के साथ।

राष्ट्रवादी इतिहासकार - प्रो. सतीश मित्तल

चेतराम गर्ग

प्रो. सतीश मित्तल का जन्म उत्तर प्रदेश के मुजफरनगर जिलान्तर्गत कांघला कस्बे में कलियुगाब्द ५०३६, विक्रमी संवत् १६६४ (०१ जनवरी, १६३८) को हुआ था। उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से इतिहास विषय में, पंजाब विश्वविद्यालय से राजनीतिक शास्त्र में स्नातकोत्तर तथा कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय हरियाणा से “पंजाब में स्वतन्त्रता आन्दोलन (१६०५-१६२६)” (Freedom movement in Punjab 1905-1929) विषय पर शोध प्रबन्ध लिखकर पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। कुछ वर्षों तक आर.के.एस.डी. महाविद्यालय कैथल में अध्यापन कार्य किया, तत्पश्चात् कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में प्रोफेसर के पद पर साढ़े तीन दशकों तक राष्ट्र सेवा में संलग्न रहे। १२ सितम्बर, २०१६ गोरखपुर मन्दिर में ब्रह्मलीन महन्त दिग्विजयनाथ की ११५ वीं जयन्ती के उपलक्ष्य में आयोजित समारोह में वे मुख्यवक्ता रहे। कार्यक्रम के उपरान्त अकस्मात् सायं ५ः३० बजे उनकी हृदयगति रूक जाने से गोरखपुर में ही उन्होंने अन्तिम सांस ली। राष्ट्रवादी इतिहास लेखन के क्षेत्र में यह एक अपूर्णीय क्षति है।

प्रो. सतीश मित्तल मानवीय संवेदना, विश्वास और इतिहास की प्रतिमूर्ति थे। इतिहास के क्षेत्र में विशेषकर उन्होंने भारत में ब्रिटिश साम्राज्यकाल में गढ़े गए मिथ्या सिद्धान्तों का पर्दाफाश किया तथा भारतीय इतिहास के सत्य साक्ष्यों को समाज के समक्ष लाया। प्रो. मित्तल बड़े हंसमुख, कर्मठ व सरल स्वभाव के व्यक्ति थे। बाल्यकाल में ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बन गए थे।

औपनिवेशिक काल में भारतीय भू-सर्वेक्षण

लकी शर्मा

सामान्यतः इतिहासकार इस बात पर एकमत हैं कि भारत में उपनिवेशवाद का प्रस्फुटन प्लासी के युद्ध के पश्चात् हुआ। यूरोपीय कम्पनियां पूर्व के प्राकृतिक संसाधनों की तरफ प्रारम्भ से ही आकर्षित रही व तदनुरूप क्षेत्रों का विस्तार किया। विभिन्न प्रान्तीय सत्ता व खोखले पड़े मुगल साम्राज्य को क्षत-विक्षत करने के बाद यूरोप की विभिन्न ताकतों में से ब्रिटिश सबसे मजबूत बनकर उभरे। श्रीरंगपट्नम के विजेता वेलेजली ने सर्वप्रथम भूमि के सर्वेक्षण की आवश्यकता को महसूस किया जिससे कि कर वसूलने, यात्रा करने व क्षेत्र के विस्तार करने में आसानी हो सकती थी।

ब्रिटिश शक्ति इस बात से अवगत थी कि एक सुदृढ़ व स्थायी शासन प्रणाली की स्थापना एवं नियमित तथा संतुलित कर उगाही के लिए भी भू-मापन एक अनिवार्य प्रक्रिया है। इस प्रयास में ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के द्वारा मुख्यतः तीन प्रकार के भू-सर्वेक्षण प्रारम्भ किए गए – राजस्व सर्वेक्षण (Revenue Survey), स्थलाकृतिक सर्वेक्षण (Topographical Survey), और त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण (Trigonometrical Survey)। यह तीनों ही प्रकार के सर्वेक्षण विभिन्न उद्देश्यों के साथ लगभग एक ही समय में (१७६६-१८०२ ई.) में प्रारम्भ हुए।