इतिहास दिवाकर - अक्टूबर २०१७
सम्पादकीय
कर्मठ ध्येय साधक
सहृदय मानस, कुशल प्रबन्धक एवं कर्मठ ध्येय साधक पुण्य आत्मा स्वर्गीय चेतराम जी हिमाचल प्रदेश के सामाजिक एवं सास्कृतिक कार्यों में रचे बसे थे। उन्होंने जन्म तो पंजाब की पुण्य भूमि में लिया, पर उनकी कर्मस्थली देवभूमि हिमाचल प्रदेश बनी। स्वर्गीय चेतराम जी अपनी शिक्षा पूरी करने के उपरान्त सन् १९७१ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बने और सन् १९८२ में हिमाचल आ गए। बस, हिमाचल की सेवा ही जीवन का ध्येय पथ बन गया। संघ के प्रचारक व प्रान्तकार्यवाह का दायित्व निर्वहन करते हुए विविध आयामों को साकार रूप में देने में अपना सर्वस्व लगा दिया। स्वर्गीय चेतराम जी की विशिष्टता थी कि जो कार्य हाथ में ले लिया उसे करना ही है, चाहे वह कितना भी कठिन क्यों न हो। उनका व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि संघ के अतिरिक्त अन्य सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता उनसे विचार विमर्श किया करते थे। ठाकुर जगदेव चन्द स्मृति शोध संस्थान नेरी की नींव ठाकुर रामसिंह ने रखी परन्तु उसे मूर्त रूप देने में स्वर्गीय चेतराम जी का महत्वपूर्ण योगदान है। उनके सुनियोजित प्रयासों से ही इस शोध संस्थान की स्थापना हुई। लम्बी बिमारी के बाद ५ अगस्त, २०१७ को पार्थिव शरीर को छोड़कर पंचतत्व में विलीन हो गए। सामान्य परन्तु प्रभावशाली एवं प्रेरक व्यक्तित्व के धनी स्वर्गीय चेतराम जी का जीवन समाज को सदा राष्ट्र सेवा में समर्पित होने की प्रेरणा देता रहेगा। इस अंक में चेतराम जी का जीवन वृत्त, उनके निकट रहे कार्यकर्ताओं के संस्मरण, चित्रावली तथा समय–समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित उनके लेखों को सम्मिलित किया गया है। ठाकुर जगदेव चन्द स्मृति शोध संस्थान नेरी, स्वर्गीय चेतराम जी द्वारा चलाए गए कार्यों को आगे बढ़ाता रहेगा, यही उनके लिए सच्ची श्रद्धाञ्जलि होगी।
जीवन वृत्त
एक कर्म योगी की जीवन यात्रा
जीवन यात्रा
स्वर्गीय चेतराम जी की जीवन यात्रा ‘एक कर्म योगी' की जीवन यात्रा है। उनका व्यक्तित्व बहुमुखी रहा है। उन्होंने पंजाब के झण्डवाला हनुमन्ता से चलना आरम्भ किया और महर्षि व्यास की तपोस्थली बिलासपुर को अपने पुण्य कार्यों का केन्द्र बनाया। उसमें उनका एक पड़ाव पंजाब का रोपड़ जिला भी रहा है। अद्भुत प्रबन्ध व्यवस्था शिल्पी, कुशल संगठनकर्ता, मितभाषी एवं निरन्तर कर्मशील रहना उनके सहज गुण रहे है। कितने ही कार्य कार्यकर्ताओं को उन्होंने अपने हाथों से गढ़ा और समाज के विविध क्षेत्रों में राष्ट्र कार्य के लिए प्रेरित किया। संगठन ने जो कार्य दिया उसे सहर्ष स्वीकार किया और लक्ष्य तक पहुंचाया।
झण्डवाला हनुमन्ता
झण्डवाला हनुमन्ता स्वर्गीय चेतराम जी का पैत्रिक गांव है। यहीं पर पिता राम प्रताप के घर माता दाखा देवी की कोख से कलियुगाब्द ५०५०, विक्रमी संवत् २००५, आषाढ़ कृष्ण १३ (३ अगस्त, १९४८) को जन्म लिया। राम प्रताप की कुल सात सन्तानों में चेतराम जी सहित पांच बहने तथा एक बड़े भाई गोपी राम है। झण्डवाला हनुमन्ता पंजाब प्रान्त के अबोहर जिला में पड़ता है।
संस्मरण
दृढ़ इच्छा शक्ति
प्रिय मित्र चेतराम जी के बिछुड़ने का दुःख हुआ। हम दोनों का संघ शिक्षा वर्ग - प्रथम वर्ष सन् १९७२ में कैथल, हरियाणा में हुआ था। उस समय वर्तमान उत्तर क्षेत्र पंजाब प्रान्त ही था। महन्त बनने के बाद मैंने संघ का प्रशिक्षण प्राप्त किया था। मेरी चेतराम जी से मित्रता इस प्रकार से हुई कि जब उन्होंने अपना परिचय अबोहर से बताया तो मैंने अपने एक दूसरे महन्त, जो अबोहर के आसपास ही कहीं रहते थे, उनकी जानकारी चेतराम जी से लेनी चाहिए। एक दिन उसी संघ शिक्षा वर्ग में दोपहर के भोजन में गलती से चटनी में जमालघोटा डाल दिया। खाना खा चुके सभी शिक्षक व शिक्षार्थियों को दस्त शुरू हो गए। चेतराम जी को स्वयं १६ बार शौच जाना पड़ा। इस हालत में भी चेतराम जी दूसरे स्वयंसेवकों को अस्पताल पहुंचाने के काम में जुटे हुए थे। इससे मुझे ही नहीं सभी शिक्षार्थियों को हैरानी हो रही थी। ऐसी थी उनकी दृढ़ इच्छा शक्ति।
ईश्वर ने मुझे संघ कार्य के लिए भेजा है
पांच अगस्त को सुबह अबोहर से शाम सुन्दर का फोन आया। उसने बताया कि चेतराम जी का रात्रि को शिमला के अस्पताल में निधन हो गया है और आज ही सायं को अन्तिम संस्कार झण्डवाला हनुमन्ता में है। यह स्थान अबोहर के पास ही है। लेकिन पंजाब से उनका सम्बन्ध केवल जन्म का और अन्तिम संस्कार का ही बना। अबोहर के डीएवी कालेज से बीए करने के बाद उन्होंने सामान्य जीवन जीने के बजाए अपने लिए नया रास्ता खोजने का निर्णय लिया और इस निर्णय ने उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रचारक बना दिया। प्रचारक के नाते उन्होंने अपना अधिकांश जीवन हिमाचल प्रदेश में ही व्यतीत किया।
आलेख
मिलेनियम बनाम वर्ष प्रतिपदा के बहाने से
न्यू मिलेनियम का बुखार थोड़ा-थोड़ा उतरना शुरू हुआ है। कोई भी पोस्टर, टेलीवीजन कार्यक्रम व सामाचारपत्र का विज्ञापन ऐसा नहीं था, जिस पर न्यू मिलेनियम या नव-सहस्राब्दि न लिखा हो। सवाल यह है कि जिस कैलेण्डर ईयर में इतनी अशुद्धियां हो, ईसा के जन्म तक के विषय में विवाद हो, ईस्वी के आरम्भ को लेकर झगड़ा हो, फरवरी के दिन कितने हो इस पर भी संशय हो, सहस्राब्दि एवं शताब्दी कब प्रारम्भ होगी यह भी विवादास्पद हो, आखिर उस कैलेण्डर को सरकारी कलैण्डर की मान्यता कैसे दी जा सकती है। क्यों न भारत की गणना पद्धति को ही आधार बनाया जाए।
समर्थ गुरु राम दास जी की ४००वीं जयन्ती
भारतवर्ष की सन्त परम्परा में समर्थ गुरु रामदास जी का एक विशिष्ट अतुलनीय स्थान है जिन्होंने अध्यात्म के दिव्य मार्ग से राष्ट्र शक्ति को सशक्त बनाया है। अतः समर्थ गुरु रामदास युग प्रवर्तक राष्ट्र भक्त सन्त थे। उत्तर भारत में जिस प्रकार हमारे व्यावहारिक जीवन में मुख्यतः विक्रमी सम्वत् का प्रयोग होता है, उसी प्रकार पश्चिमी भारत में शक सम्वत् का अधिक प्रचलन है। इस आधार पर समर्थ गुरु रामदास के जन्म के उल्लेख में इनका जन्म शक सम्वत् १५३० की रामनवमी को महाराष्ट्र के जाब गांव में हुआ था।



