अक्टूबर 2015

इतिहास दिवाकर
आयतन 8, मुद्दा 3
अक्टूबर
01 अक्ट 2015
अशोक सिंघल इतिहास लेखन कृष्णद्वैपायन व्यास तीर्थयात्रा पर्वोत्सव राम जन्मभूमि लोक गाथा विश्व हिन्दू परिषद् हिन्दू धर्म
अक्टूबर 2015
इतिहास दिवाकर का यह अक्टूबर 2015 का अंक सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विषयों पर केंद्रित है। इसमें श्री अशोक सिंघल जी के जीवन और कार्यों पर विशेष लेख हैं, जो उन्हें 'सांस्कृतिक चेतना के महानायक' और 'करोड़ों के प्रेरणास्रोत' के रूप में प्रस्तुत करते हैं। अन्य प्रमुख विषयों में हिंदू धर्म के तीर्थों और पर्वोत्सवों का गहन विश्लेषण, महर्षि कृष्णद्वैपायन व्यास की महानता, पन्ना धाय के बलिदान की गाथा, और ठाकुर रामसिंह जी के असम में किए गए कार्यों का वर्णन शामिल है। पत्रिका में इतिहास लेखन में लोक गाथाओं के योगदान पर एक राष्ट्रीय परिसंवाद की विस्तृत रिपोर्ट भी है।
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मुख्य विशेषताएं

श्री अशोक सिंघल जी को एक सांस्कृतिक महानायक के रूप में चित्रित किया गया है, जिन्होंने राम जन्मभूमि आंदोलन को महत्वपूर्ण परिणति तक पहुंचाया और जीवन पर्यन्त हिन्दू समाज के गौरव जागरण के लिए संघर्ष किया।

हिंदू धर्म में तीर्थ और पर्वों का गहरा महत्व है, जो केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति, समाज और राष्ट्र के साथ व्यक्ति के जुड़ाव का माध्यम हैं।

महर्षि कृष्णद्वैपायन व्यास को विश्व के महानतम यायावर के रूप में वर्णित किया गया है, जिन्होंने महाभारत और पुराणों के माध्यम से सम्पूर्ण चराचर जगत के ज्ञान को संकलित किया।

लोक गाथाएं भारतीय इतिहास के महत्वपूर्ण स्रोत हैं, जो जनमानस में जीवित रहती हैं और ऐतिहासिक घटनाओं, देव-पराक्रमों और वीर-चरितों का अक्षुण्ण विवरण प्रस्तुत करती हैं।

योगदानकर्ताओं

डश
डॉ० शिवाजी सिंह
मार्गदर्शक (Mentor)
चेतराम
मार्गदर्शक (Mentor)
इख
इरविन खन्ना
मार्गदर्शक
डव
डॉ० विद्या चन्द ठाकुर
सम्पादक (Editor)
चग
चेतराम गर्ग
सह सम्पादक
डर
डॉ० रमेश शर्मा
सम्पादक मण्डल
डओ
डॉ० ओम प्रकाश शर्मा
सम्पादक मण्डल
अक
अश्वनी कालिया
टंकण एवं सज्जा
डप
डॉ. प्रवीण तोगड़िया
लेखक (Author)
चर
चंपत राय
लेखक (Author)
डव
डॉ. विद्या निवास मिश्र
लेखक (Author)
डक
डॉ. कृष्ण मोहन पाण्डेय
लेखक (Author)
कग
के.एस. गुप्ता
लेखक (Author)
पल
प्रो. लक्ष्मीश्वर झा
लेखक (Author)
डओ
डॉ. ओम प्रकाश शर्मा
लेखक (Author)

प्रकाशन सारांश

सम्पादकीय

सांस्कृतिक चेतना के महानायक

भारत राष्ट्र के आदर्श सनातन जीवन मूल्यों से सांस्कारित सांस्कृतिक चेतना के महानायक श्री अशोक सिंघल जी कार्तिक मास, शुक्ल पक्ष, षष्ठी तिथि, कलियुगाब्द ५११७, तदनुसार १७ नवम्बर, २०१५को अपने नश्वर शरीर का परित्याग कर ब्रह्मलीन हो गए। श्री सिंघल जी का जन्म कलियुगाब्द ५०२८ के आश्विन मास, कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि, २७ सितम्बर १६२६ को पिता श्री महावीर सिंघल के घर उत्तर प्रदेश के आगरा शहर में हुआ था।

श्री सिंघल जी जीवन पर्यन्त भारतवर्ष के सनातन प्रवाह तथा जगत् कल्याण के पोषक हिन्दू समाज के गौरव जागरण के कार्य में अदम्य साहस एवं धीरता और गम्भीरता के साथ कटिबद्ध रहे। इन्होंने विश्व हिन्दू परिषद् को अनूठी प्रतिष्ठा और विस्तार प्रदान किया। राम जन्मभूमि आन्दोलन को सिंघल जी ने महत्त्वपूर्ण परिणति तक पहुंचाया और भव्य राम मन्दिर निर्माण के लिए वे 'राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहां विश्राम' के हनुमत् संकल्प को शिरोधार्य कर आजीवन संघर्षरत रहे।

शोध संस्थान नेरी में वैशाख शुक्ल ५,७,८ कलियुगाब्द ५११० तदनुसार १०,११,१२ मई २००८ को लोक परम्परा में सृष्टि रचना विचार विषय पर त्रिदिवसीय राष्ट्रीय परिसंवाद का आयोजन हुआ। इस परिसंवाद के उद्घाटन समारोह में श्रद्धेय सिंघल जी का मुख्य अतिथि के रूप में यहां पावन पदार्पण हुआ। इस अवसर पर शोध संस्थान परिसर का भव्य प्रवेश द्वार उनके कर कमलों द्वारा लोकार्पित हुआ। तत्पश्चात् कार्यक्रम मंच पर उनके कर कमलों द्वारा इतिहास दिवाकर पत्रिका के प्रवेशांक का लोकार्पण किया गया और परिसंवाद के उपलक्ष्य में अपने सम्बोधन में उन्होंने कहा कि दुनिया के बड़े-बड़े वैज्ञानिक शोधकर्त्ता जैसे-जैसे अपने शोध कार्यों में आगे बढ़ते जा रहे हैं, वैसे-वैसे वे भारतीय चिन्तन के निकट पहुंच रहे हैं। इसी को सुदढ़ करने की आवश्यकता है। जिस प्रकार का शोध संस्थान यहां खुला है, ऐसे शोध संस्थानों के प्रयासों से ही हम अपने इतिहास को समझ पाने में सक्षम होंगे। हमारे इतिहास की महत्वपूर्ण कड़िया लोकश्रुतियों में जन-सामान्य के पास सुरक्षित हैं। लोक जीवन से जुड़ी सामग्री जुटाने में लगे लोग इतिहास का महत्त्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। समाज इन कार्यों से प्रेरणा लेगा और भारतवर्ष एक सशक्त शक्ति के रूप में उभरेगा।

सांस्कृतिक चेतना के महानायक श्रद्धेय सिंघल जी का पराक्रमी पुरुषार्थ और श्रेष्ठ मार्गदर्शन, सन्मार्ग पर आगे बढ़ने की अमूल्य प्रेरणा है।

करोड़ों के प्रेरणास्रोत : अशोक सिंघल जी

डॉ. प्रवीण तोगड़िया

जब अशोक सिंघल जी ने मेरे कंधे पर हाथ रखकर कहा, 'हम सब मिलकर भव्य राम मन्दिर बनाएंगे, हम सब मिलकर हिन्दू राष्ट्र का पुनरुत्थान करेंगे', तब मैं ३६ वर्ष का था। १९९२ में अयोध्या, गुजरात से विश्व हिन्दू परिषद् के युवाओं के साथ गया था। अशोक जी के हाथ में ताकत थी, आत्मविश्वास उनकी आंखों में झलक रहा था। तब वे ६६ वर्ष के थे। इसके कई वर्ष पहले से १० वर्ष की आयु में ही मैं रा.स्व.संघ से जुड़ गया था। मैं ही नहीं, लाखों युवाओं को प्रेरणा देकर अशोक जी ने मां भारती की, हिन्दुओं की सेवा में तत्पर किया।

भगवान श्रीराम का भव्य मन्दिर अयोध्या में राम जी के जन्म स्थान पर ही बने, यह उनका केवल स्वप्न नहीं था, यह उनका अदम्य विश्वास था, उनके जीवन की अटूट प्रतिबद्धता थी। दिन-रात उसी पर अशोक जी कार्य करते रहते थे। संघ के प्रचारक, स्वयंसेवक संगठनात्मक कुशलता सीखते हैं और कार्य, आन्दोलन, सेवा, इन सभी में नियोजन और अनुशासन, ये सभी ऐसे व्यक्तित्व का अविभाज्य अंग होते हैं। अशोक जी भी ऐसे ही थे। आजकल ही नहीं, तब भी, जब टीवी, इंटरनेट, सोशल मीडिया का चलन नहीं था, यही होता था कि किसी बड़े कार्य करने वाले व्यक्तियों के विषय में संकुचित, अधूरी जानकारी के आधार पर या सरकारी दबाव में सकारात्मक कम और उलटी-पुल्टी खबरें चलाकर उनकी छवि मलिन करने का काम चलता ही रहता था। अशोक जी इस सबसे कभी प्रभावित नहीं हुए। राम मन्दिर के अतिरिक्त अशोक जी ने कई महान कार्य इस देश के लिए किये।

'धर्म संसद' की अनोखी संकल्पना अशोक जी ने विकसित की। देश-विदेश के साधु-सन्तों को राष्ट्र कल्याण और हिन्दू राष्ट्र के एक समर्थ सूत्र में एक करना कोई आसान काम नहीं था। अशोक जी ने धर्म संसद खड़ी की। आगे उसकी व्याप्ति और महत्व ऐसा बढ़ता गया कि अनेक विषयों पर धर्म संसद का एक शब्द, एक प्रस्ताव आदेशयुक्त दिशा का स्वरुप लेने लगा। अशोक जी ने एक बार मुझे कहा, 'इंग्लैंड में प्रधानमन्त्री, अमरीका में राष्ट्राध्यक्ष जब शपथ लेते हैं तब ‘गॉड' के नाम पर लेते हैं और उस समय उनके पेरिस के फादर मंच पर या उनके साथ पोडियम के निकट उपस्थित होते हैं। फिर भी विश्व में ये देश 'सेकुलर' कहलाते हैं। कभी हमारे देश में ऐसा होगा कि हमारा धर्म इस देश की राजनीति की दिशा तय करेगा और जब देश के प्रमुख शपथ लेंगे तब हमारे धर्म के प्रमुख उसी सम्मान से उनके साथ आशीर्वाद देते हुए होंगे? ऐसा होगा ही।' उनकी यही अदम्य आशा उनके लिए और इस देश के हिन्दुओं के लिए प्रेरणास्रोत थी। सरकार ने जब रामेश्वरम में रामसेतु तोड़ने का प्रकल्प घोषित किया, तब अशोक जी को धक्का लगा था कि ऐसी दुष्टतापूर्ण योजना कोई बना ही कैसे सकता है! संघ के मार्गदर्शन में जब विश्व हिन्दू परिषद् ने रामेश्वरम में रामसेतु बचाने को देशव्यापी आन्दोलन चलाया।

कर्मयोगी महामानव

चंपत राय

स्वामी सत्यमित्रानंद जी ने कहा कि ६० वर्ष की उम्र में ही अशोक जी को महात्मा कह देना चाहिए था। भारत में तमाम प्रकार की उपासनाएं हैं, दार्शनिक मार्ग हैं, लेकिन सब मार्गों के सन्त, महात्माओं, धर्माचार्यों को किसी एक मंच पर देश की, समाज की समस्याओं का हल करने के लिए जोड़ देने वाले व्यक्ति थे अशोक सिंहल जी। सभी जानते हैं कि वे जो ठान लेते थे वही करते थे। इसका अर्थ ये नहीं कि वे जिद्दी थे। वे संकल्प के धनी थे, वे आज्ञाकरी भी थे और धैर्यवान बहुत थे। अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रतीक्षा करते रहना, लक्ष्य कभी भूलना नहीं-ये उनकी विशेषता थी। साथ ही साथ दया और करुणा का भाव उनमें बहुत अधिक था, छोटे बड़े का विचार नहीं था। उनकी सिक्योरिटी का पीएसओ, गाड़ी चलाने वाला चालक, उनकी सेवा करने वाला सेवक अगर उसके घर में कोई सुख-दुःख है तो बिना किसी से कहे कार्यक्रम अपने आप बनाते थे और चल देते थे। उनको किसी ने निमन्त्रण दिया, नहीं दिया इसका विचार दिमाग में नहीं रखते थे। उनको जानकारी मिलनी चाहिए - ये कार्यक्रम हो रहा है, बहुत महत्त्व का कार्यक्रम है तो बिना बुलाये पहुंच जाते थे। मान अपमान का विचार उनको छू तक नहीं सकता था। मुझे ऐसा लगता है कि वे अपने कमरे के सामने अपने देवता रखते थे। अपने गुरु और परमपूज्य श्री गुरुजी का चित्र रखते थे। कहते थे ये दो ही मेरे गुरु हैं। शायद वह सीधी प्रेरणा वहां से प्राप्त करते थे। इसीलिए उनके निर्णय हृदय से, आत्मा से लिए गए निर्णय होते थे। प्रथम दृष्ट्या तो यह लगता था कि यह कैसे होगा, ये क्या कह रहे हैं लेकिन उनका कहा हुआ हो ही जाता था। अन्ततः सब कहते थे ये सही निकला। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भी जब उनके पास केवल शाखा का ही काम था तो भी वे देश की तमाम समस्याओं पर बोलते और सोचते थे। विश्व हिन्दू परिषद् में रहकर तो हमें स्पष्ट अनुभव हुआ कि उनकी सोच वैश्विक थी। हर समस्या के बारे में सुनते रहना, अध्ययन करते रहना, चर्चा करना और समाधान खोजते रहने की उनमें विलक्षण प्रतिभा थी, शायद भगवान ने ही उन्हें यह जन्मना दी थी। कम लोगों को ही पता होगा कि कानपुर में पता लग गया कि रेलगाड़ी से गाय ले जायी जा रही हैं, उन्होंने कार्यकर्ताओं को लेकर ताले तोड़ दिए, गायों को मुक्त कर दिया और वहां से आगे की यात्रा पर निकले तो किसी की पकड़ में नहीं आए। दिल्ली का झंडेवालान मन्दिर अराजक तत्वों के हाथ में था, श्रद्धालुओं की भावना का सम्मान करते हुए मार-मारकर उन्हें वहां से भगा दिया। आज वह मन्दिर शुद्ध और प्रतिष्ठित है, सबके सामने है लेकिन उनकी व्यक्तिगत लिप्सा कभी उस मन्दिर ने नहीं रही। वेदों का पुनरुद्धार होना चाहिए, उत्तर भारत में वेदपाठ का कंठस्थ करने की परम्परा का बीज उन्होंने धरती पर डाला और आज वह जम गया। देश के माथे से गुलामी के कलंक हटने चाहिए, बच्चे-बच्चे के मन में एक ललक जगा दी। १५२६ में हमारा अपमान हुआ था उसका परिमार्जन करने की प्रबल भावना जन-जन में जगा दी।