इतिहास दिवाकर - अक्टूबर २०१४
अनुक्रमणिका
संवीक्षण
- आधुनिक भारतीय इतिहास लेखन की प्रवृत्तियां (भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के सन्दर्भ में) - डॉ० सतीश चन्द्र मित्तल
- कांग्रेस और संघ: स्वराज से पूर्ण स्वातन्त्र्य तक की यात्रा - कृष्णानन्द सागर
- वीर पराक्रमी महान योद्धा : जनरल जोरावर सिंह - राकेश कुमार शर्मा
कृषि दर्शन
- कुलुई की कृषि व्यावसायिक शब्दावली - २ - मौलू राम ठाकुर
सृष्टि आख्यान
- हरियाणा की लोक परम्परा में सृष्टि रचना विचार - राम शरण युयुत्सु
- ईश्वर गीत में सृष्टि रचना - विद्या सागर नेगी
- लाहौल के घुरे में सृष्टि रचना - डॉ. सूरत ठाकुर
सम्पादकीय
तेरा वैभव अमर रहे माँ
भारत की सेना में राष्ट्र भक्ति का समुद्र सा गहरा सुदृढ़ संस्कार है और संकटों का सामना करने में आकाश को छूता हुआ उन्नत उत्साह है। भारत के सैनिक जवानों और खेतों में अनथक परिश्रम से अन्न उपजा कर प्राण रक्षक किसानों से देश कभी उऋण नहीं हो सकता। इनके प्रति कृतज्ञ अनुभूति से ईस्वी सन् 1965 (कलियुगाब्द 5067) में स्वतन्त्र भारत के दूसरे प्रधानमन्त्री स्वर्गीय श्री लालबहादुर शास्त्री ने राष्ट्रीय उद्घोष किया – जय जवान! जय किसान! पूर्व प्रधानमन्त्री श्री अटल विहारी वाजपयी ने मानव समाज और राष्ट्र जीवन में विज्ञान की अनूठी भूमिका के दृष्टिगत उक्त राष्ट्रीय उद्घोष को विस्तार दिया और कहा – जय जवान ! जय किसान !! जय विज्ञान !!!
किसी देश की सुरक्षा की सुनिश्चितता उस देश के सेना के जवान होते हैं। इस दृष्टि से भारतीय सेना के जवानों की शूरवीरता और विश्वसनीयता सर्वोत्कृष्ट है। अभी पिछले दिनों सितम्बर मास में जम्मू-कश्मीर में आई भीषण बाढ़ के संकट के समय जिस साहस और सुनियोजित ढंग से भारतीय सेना ने लाखों बाढ़ पीड़ित लोगों को सुरक्षा प्रदान की, उससे सब के मन में इनके शौर्य को नमन करते हुए भाव जागृत हुए – जय जवान !
ईस्वी सन् 1841 (कलियुगाब्द 4943) में भारत की शौर्य विभूति जम्मू रियासत के राजा गुलाब सिंह के सेनानायक जोरावर सिंह के नेतृत्व में डोगरा सेना के जवानों ने लद्दाख में अपनी विजय पताका फहरा कर लद्दाख को महाराजा गुलाब सिंह के राज्य का हिस्सा बनाया और इसी कारण आज यह भारत का भूभाग है।
लद्दाख विजय के उपरान्त वे कैलाश मानसरोवर की ओर आगे बढ़े। तकलाकोट तो-यू के घमासान युद्ध में तिब्बती सेना के हाथों जनरल जोरावर सिंह वीरगति को प्राप्त हुए। बाद में तिब्बती सेना ने तो-यू में उनके शौर्य की स्मृति में एक स्तूप बनाया जिसे सिंह छोरतन के नाम से जाना जाता है। शत्रु पक्ष द्वारा इस प्रकार स्मारक बनाना विश्व इतिहास का एक अनूठा उदाहरण है जो जनरल जोरावर सिंह के अद्भुत एवं आकर्षक शौर्य का परिचायक है। जनरल जोरावर सिंह का यह ऐतिहासिक स्मारक राष्ट्र मानस के राष्ट्रभक्ति के इस भाव को सदैव प्रज्ज्वलित करता रहेगा- तेरा वैभव अमर रहे माँ। हम दिन चार रहें न रहें।।
आधुनिक भारतीय इतिहास लेखन की प्रवृत्तियां
सर्वप्रथम इतिहास के प्रति अवधारणाओं का अति संक्षेप में स्पष्टीकरण आवश्यक होगा। इतिहास क्या है? आज के सन्दर्भ में 'हिस्ट्री' किसी पुरुष अथवा नारी की कहानी (His-story या Her-story) नहीं है; जैसा कि पूर्व काल में मान्यता रही। यह नेताओं राजा-महाराजाओं या वीर पुरुषों की गाथा भी नहीं है। न ही इतिहास का अर्थ, अतीत में घटित घटना से है। बल्कि आज महत्त्वपूर्ण यह है कि यह घटना क्यों और कैसे घटित हुई। यह 'तवारीख' अथवा तिथियों का ज्ञान मात्र भी नहीं है। इतिहास में कोई निर्णीत (Finality) भी नहीं है। नवीनतम तथ्यों के आधार पर उसमें परिवर्तन आवश्यक होता है।
ब्रिटिश साम्राज्यवादी इतिहासकार
सामान्यतः यूरोप में १७ वीं शताब्दी को विद्वानों का, १८ वीं शताब्दी को प्रबुद्धता व तर्क का तथा १६ वीं शताब्दी को इतिहास का युग माना जाता है। १६ वीं शताब्दी में यूरोपीयन विद्वानों ने इतिहास की अवधारणा, इसके स्वरूप, अध्ययन विधि तथा इसके सिद्धान्तों की और ध्यान दिया तथा इसका अध्ययन किया। ब्रिटिश साम्राज्यवादी इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास की व्याख्या इस ढंग से की जिसमें यूरोपीय उच्चता का अंहकार सदैव बना रहा। जेम्स मिल (१७७३-१८३६) पहला ब्रिटिश इतिहासकार था जिसने औपनिवेशिक तथा साम्राज्यवादी प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन दिया।
मार्क्सवादी इतिहासकार
मार्क्सवादी इतिहासकारों का चिन्तन मार्क्स के इतिहास के सन्दर्भ में विचारों पर आधारित है। सामान्यतः इसे अंग्रेजों द्वारा प्रदत्त प्रशासकीय इतिहास का उत्तर माना जाता है। मार्क्स के विचार सहजता से उसके २३ लेखों के आधार पर जाने जा सकते हैं। सामान्यतः इसे अंग्रेजों द्वारा प्रदत्त प्रशासकीय इतिहास का उत्तर माना जाता है। मार्क्स के विचार जो उसने १८५३-१८५७ के दौरान लिखे थे उसने भारत में ब्रिटिश शासन का दोहरा लक्ष्य बतलाया एक ध्वंसात्मक तथा दूसरा सृजनात्मक।
राष्ट्रवादी इतिहासकार
भारतीय राष्ट्रवाद की पेचीदगी के कारण भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन भी कई धाराओं में प्रवाहित होता दिखलाई देता है। अतः इसके स्वरूप में एकात्मकता का अभाव है परन्तु अनेक तत्व सामान्य है। सामान्यतः भारत के राष्ट्रवादी लेखक साम्राज्यवाद विरोधी तथा अनेक विसंगतियों तथा भ्रांतियों को उद्घाटित करते हैं। इन्होंने सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक आधारों पर ब्रिटिश उपनिवेशवाद तथा साम्राज्यवाद की कटु आलोचना की। दादा भाई नौरोजी, आर.सी. दत्त, मैजर वसु, लोकमान्य तिलक भारतीय इतिहास शास्त्र के पूर्वगामी कहे जा सकते हैं।
कांग्रेस और संघ: स्वराज से पूर्ण स्वातन्त्र्य तक की यात्रा
यह सर्वविदित है कि कांग्रेस की स्थापना १८८५ में श्री ए.ओ. ह्यूम ने भारत में अंग्रेजी राज को निष्कंटक बनाए रखने के लिए की थी। श्री ह्यूम १८५७ की क्रान्ति के समय के उन चन्द अंग्रेज अधिकारियों में से थे जो अपने मुंह पर कालिख पोत कर अथवा स्त्री वेश धारण करके ही क्रान्तिकारियों के चंगुल से बच निकलने में सफल हो हुए थे। भारतीयों के रोष का तूफान उन्होंने प्रत्यक्ष देखा था।
स्वराज अर्थात् स्वशासी ब्रिटिश उपनिवेश
१६०६ की काशी कांग्रेस में प्रथम बार ‘स्वराज' शब्द का प्रयोग दादा भाई नौरोजी ने किया। लोकमान्य तिलक ने तो डंके की चोट पर कहा था – ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है'। भले ही १६०६ के कांग्रेस अधिवेशन में कांग्रेस का लक्ष्य स्वराज घोषित किया गया, किन्तु इस स्वराज और 'स्वराज्य' की परिभाषा उस शासन प्रणाली के रूप में की गई जो 'स्वशासी ब्रिटिश उपनिवेश में है'। जिसका अर्थ था- भारत ब्रिटिश साम्राज्य का एक अंग रहते हुए यहां का शासन भारतीयों के हाथ में रहे।
विशुद्ध स्वातन्त्र्य
डॉ. हेडगेवार तथा उनके समान विचार करने वालों को यह कतई स्वीकार नहीं था कि भारत इंग्लैंड का एक उपनिवेश बन कर रहे। वे किसी भी प्रकार की विदेशी सत्ता से मुक्त सर्वतन्त्र-स्वतन्त्र भारत की कल्पना करते थे। डॉ. हेडगेवार ने इसे नाम दिया विशुद्ध स्वातन्त्र्य।
वीर पराक्रमी महान योद्धा : जनरल जोरावर सिंह
विश्व के सैन्य इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलेगा कि शत्रु पक्ष ने पराजित हुई सेना के सेनापति की स्मृति में समाधि बनाई हो। ऐसा उदाहरण केवल भारत के सैन्य इतिहास में मिलता है कि तिब्बतियों ने महान सेनानायक जरनल जोरावर सिंह के अदम्य साहस, पराक्रम व वीरता से प्रभावित हो कर उनकी स्मृति में तो-यू नामक स्थान पर उनकी समाधि बनाई जिसे “सिंह का छोरतन” कहा जाता है। भारत की उत्तरी सीमाओं को सुरक्षित बनाने में ऐतिहासिक योगदान के लिए जरनल जोरावर सिंह सदा स्मरणीय रहेंगे। धर्म परायण व स्वामी भक्त, एक कुशल प्रशासक, वीर, पराक्रमी, महान योद्धा जनरल जोरावर सिंह बहुत दूरदर्शी थे।



