सम्पादकीय
डॉ. भीमराव अम्बेडकर की इतिहास दृष्टि
०२ अप्रैल २०१८ को कुछ राजनीतिक लोगों द्वारा भारत बन्द का आवाहन किया गया था। उस दौरान १० लोगों की जाने गई और सैंकड़ों लोग घायल हो गए, करोड़ों रुपये की सम्पति का नुकसान हुआ और आम आदमी को जो परेशानियों का सामना करना पड़ा वह अलग। कुछ लोग बाबा साहब आम्बेडकर के नाम पर अपनी विभाजनकारी नीति के तहत देश में विषमता फैलाने का काम अपनी ओछी राजनीति चमकाने के लिए कर रहे हैं। उन्हें सर्वप्रथम बाबा साहब के चिन्तन को समझने की आवश्यकता है।
बाबा साहब आम्बेडकर का जीवन भारतीय समाज को एक सूत्र में बांधने के लिए किए गए प्रयासों का अद्वितीय उदाहरण रहा है। उन्होंने कहा कि भारत की एकात्मता, यहां की सांस्कृतिक विरासत के कारण ही अक्षुण रही है, ऐसा विश्व के अन्य राष्ट्रों में दिखाई नहीं देता है। साथ ही भारतीय समाज में व्याप्त अस्पृश्यता जैसी सामाजिक बुराई के लिए उन्होंने समाज के उच्च वर्ग को दोषी माना। उन्होंने समाज का गहरा मंथन किया और भारतीय नेतृत्व को सोचने पर विवश कर दिया कि इस जातीय विषमता के खातमे से ही हिन्दू समाज का भला होने वाला है।
बाबा साहब महान इतिहासविद् थे। बाबा साहब ने कहा कि आर्य भारत के मूल निवासी हैं तथा वे कहीं बाहर से नहीं आए हैं। भारत पर अपना स्थाई आधिपत्य स्थापित करने की दृष्टि से ही यूरोप के भाषा विज्ञानियों तथा इतिहासकारों ने मिथ्या सिद्धान्त गढ़ा कि आर्य भारत में बाहर से आए हैं। यह उनकी सोची समझी चाल थी जिसका अनुसरण भारत के तथाकथित इतिहासकारों ने आंख मूद कर किया। इसका परिणाम यह हुआ कि स्वतन्त्र भारत का विद्यार्थी भी अपने सही इतिहास को पढ़ने से विंचित रहा। इस अंक में डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री का लेख उन सब षड्यन्त्रों को उजागर करता है।
पश्चिम का आर्य सिद्धान्त और आम्बेडकर का अभिमत
डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
पश्चिम के आर्य सिद्धान्त की चर्चा कर लेने से पूर्व यह जान लेना बेहतर होगा कि यह सिद्धान्त क्या है। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में विश्वभर के विद्वानों में यह विषय सर्वाधिक चर्चित था। मोटे तौर पर पश्चिम में जन्मे इस सिद्धान्त का निष्कर्ष था कि यूरोप और भारत के लोग मूल रूप से आर्य हैं और एक ही नस्ल के हैं। इसका कारण भाषा विज्ञान के अनुसंधान में मिले प्रमाण थे कि यूरोपीय भाषाओं और भारत की भाषाओं का मूल एक ही है। १७६७ में एक फ्रांसीसी जूसिएट पादरी Gaston-laurent Coeurdoux, जिसने अपना काफी जीवन हिन्दुस्तान में ही बिताया था, ने संस्कृत और यूरोपियन भाषाओं के बीच की समानता को पकड़ा था। उसके कुछ साल बाद ही १७८६ में सर विलियम जोन्स (१७४६-१७६४) ने भी भारत व यूरोप की भाषाओं की समानता के आधार पर प्रोटो भाषा तैयार की थी। विलियम ज़ोन्स पहले शख्स थे जिन्होंने आर्यों को एक नस्ल माना। भाषा के समान उद्गम के प्रमाण से उन्होंने कयास लगाया कि भारत में आर्य लोग सहस्राब्दियों पहले यूरोप से ही चलकर आए थे। इस सिद्धान्त के अनुसार अंग्रेजों ने यह स्थापित करने का प्रयास किया कि भारत में आर्य बाहर से आक्रमणकारी के रूप में आए थे, उन्होंने यहां के मूल निवासियों को पराजित कर इस देश पर कब्जा कर लिया। मूल निवासियों को दास बना लिया और उन्हें शूद्र का दर्जा दिया। द्रविड़ों को मार कर दक्षिण में धकेल दिया। सिन्धु घाटी की सभ्यता के जो अवशेष मोहनजोदड़ो व हड़प्पा इत्यादि अनेक स्थानों पर मिलते हैं, उसको भी यूरोपीय विद्वानों ने आर्यों के आक्रमण से नष्ट हुई सभ्यता के शेष बचे अवशेष बताया।
गुरु परम्परा के प्रवर्तक महर्षि वेदव्यास
डॉ. ओम दत्त सरोच
वैदिक व पौराणिक ज्ञान परम्परा का विकास व प्रसार करने तथा गुरु-शिष्य परम्परा को समृद्ध करने में महर्षि वेद व्यास का महत्वपूर्ण योगदान है। वेद की चार संहिताओं का संकलन करके अठारह पुराणों की रचना तथा महाभारत जैसे महाकाव्य की रचना करके महर्षि व्यास ने ज्ञान के अक्षुण्ण स्रोत मानव मात्र के कल्याण के लिए प्रस्तुत किए हैं।
व्यास का प्रादुर्भाव : पौराणिक मान्यता के अनुसार प्रत्येक मनवन्तर के प्रत्येक चतुर्युग के प्रत्येक द्वापर के अन्त में वेदों के उद्धार के लिए भगवान विष्णु का व्यास के रूप में प्रादुर्भाव होता है। इस परम्परा के अनुसार वर्तमान वैवस्वत मन्वन्तर के अठाईसवें चतुर्युग के द्वापर युग में पराशर-पुत्र वादरायण व्यास विष्णु के अवतार के रूप में प्रकट हुए हैं। व्यास शब्द नाम का बाचक नहीं है, अपितु परम्परा का वाचक है। संस्कृत में व्यास का अर्थ विस्तार करना होता है। वेदों का चार संहिताओं के रूप में तथा शाखाओं के रूप में विस्तार करने व पुराणों आदि के रूप में ज्ञान का प्रसार व विस्तार करने के कारण ही इन का व्यास नाम प्रचलित हुआ है।



