इतिहास दिवाकर
त्रैमासिक अनुसंधान पत्रिका, वर्ष १० अंक २, आषाढ़ मास, कलियुगाब्द ५११६, जुलाई २०१७
अनुक्रमणिका
- सम्पादकीय
- शताब्दी स्मरण
भारतीय चिन्तनधारा के मनीषी : पंडित दीनदयाल उपाध्याय - चेतराम गर्ग - संवीक्षण
औपनिवेशिक काल में हिन्दी साहित्यकारों का इतिहास के लोकप्रियकरण में योगदान - डॉ. राकेश कुमार दूबे - जम्मू कश्मीर और महाराजा हरिसिंह की अवहेलना - डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
- ऋषि परम्परा
महर्षि वसिष्ठ की महान् मानवता - श्री मुकुन्दराय वि. पाराशर्य - स्थान वृत्त
पांगी घाटी की शासन व्यवस्था - हीरा लाल ठाकुर - लोकाख्यान
हिमाचल लोक गाथा में चानो-बानो - कृष्ण चन्द महादेविया - ध्येय पथ
इतिहास लेखन विमर्श संवाद - प्रो. राकेश कुमार शर्मा
सम्पादकीय: उपाध्याय जी का एकात्म मानववाद
मानव कल्याण और राष्ट्र निर्माण के लिए एकात्म मानववाद के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने आज से सौ वर्ष पहले कलियुगाब्द ५०१८ एवं विक्रमी संवत् १६७३ के आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि, २५ सितम्बर १६१६ को जन्म लिया और ५२ वर्ष की आयु में कलियुगाब्द ५०६६, विक्रमी संवत् २०२४, माघ शुक्ल १२ (११ फरवरी १६६८) को उनका देहावसान हुआ। पिछले आश्विन मास से आगामी आश्विन मास तक का वर्ष दीनदयाल उपाध्याय जी का जन्म शताब्दी वर्ष है। अनेक विकट परिस्थितियों से तपा हुआ उनका जीवन असाधारण सूझ-बूझ वाला आदर्श जीवन था। ईस्वी सन् १६३७ में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक के सम्पर्क में आए और उसके बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन राष्ट्र सेवा में समर्पित कर दिया। वर्ष १६५१ में तत्कालीन परम पूज्य सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गुरु गोलवलकर जी के परामर्श पर वे भारतीय जनसंघ में गए और २३ जून, १६५३ को डॉ. श्याम प्रसाद मुखर्जी के शहीद होने के पश्चात् जनसंघ की रीति नीति निर्धारित करने का प्रमुख दायित्व इन्होंने निभाया। ईस्वी सन् १६६४ के ग्वालियर अधिवेशन में इन्होंने एकात्म मानववाद का विचार प्रस्तुत किया जिसे जनसंघ ने अपने मौलिक सिद्धान्त के रूप में स्वीकार किया। राष्ट्रीय सम्पन्नता की आकांक्षा हेतु श्रम साधना, समर्पित भावना, कर्मक्षेत्र में शुचिता और आध्यात्मिक मूल्यों के प्रति आस्था इनका सुस्थिर आदर्श था। सर्वं खल्विदं ब्रह्म अर्थात् जो कुछ भी दृश्यमान है, ये नित्य सत्ता ब्रह्म के ही भिन्न-भिन्न रूप हैं तथा जैसे हम, वैसे सब- आत्मवत् सर्वभूतानि इत्यादि ऋषि चिन्तन को ही पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने नये सामाजिक संदर्भों में एकात्म मानववाद का नाम दिया है। उपाध्याय जी का कहना है – अपने प्राचीन के प्रति गौरव का भाव लेकर वर्तमान का यथार्थवादी आकलन कर और भविष्य की महत्त्वांकांक्षा लेकर हम कार्य में जुट जाएं। इसी कार्य में एकात्म मानववाद है और यह कार्य सृष्टि के साथ एकात्मवाद का साक्षात्कार 'नर से नारायण' बनाने में समर्थ हो सकेगा। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का एकात्म मानववाद भारत की चित्ति अर्थात् भारत के चैतन्य का प्रकाश है जिसमें भारत ही नहीं, वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना के साथ विश्व का कल्याण अन्तर्निहित है।
शताब्दी स्मरण: भारतीय चिन्तनधारा के मनीषी : पंडित दीनदयाल उपाध्याय
चेतराम गर्ग
भारतीय सनातन चिन्तन धारा के मनीषी पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का जन्म आश्विन त्रयोदशी विक्रमी संवत् १६७३ (२५ सितम्बर, १६१६) को पिता भगवती प्रसाद के घर माता रामप्यारी की कोख से मथुरा जिले से २५ किलोमीटर दूर नगला चन्द्रभान गांव में हुआ जो वर्तमान में दीनदयाल धाम नाम से प्रसिद्ध है। पर दीनदयाल जी का बचपन पूरा राजस्थान में अपने ननिहाल में ही बीता। परिवार में तीन वर्ष की अल्पायु में उनके सर से पिता जी का साया छिन गया। छः वर्ष तक की आयु में माता जी भी साथ छोड़ गई। नाना-नानी बाल्यावस्था में जो उनके आश्रय बने थे, दस वर्ष पूरा करते वे भी विदा हो गए। मामा-मामी अब जो उनके पालक थे वे भी सोलहवें वर्ष तक ईश्वर को प्यारे हो गए। छोटा भाई शिव दयाल जिससे वे बहुत प्यार करते थे वह भी अपने बड़े भाई को अकेला छोड़ परिवार के अन्य सदस्यों का अनुगामी बना। दीनदयाल जी ने अभी तक जीवन के १८ बसंत भी पार न किए थे। ऐसे दुःखों की भीषण ज्वाला में सेवा कर्म की साधना पण्डित जी के स्वभाव में गहराई तक समा गई थी।...
अपने बौद्धिक वर्गों में पण्डित जी अपनी राष्ट्रीय पहचान पर विशेष जोर दिया करते थे और यह आवश्यक है कि हम हमारी राष्ट्रीय पहचान के विषय में गंभीरता से विचार करें। वे मानते थे कि राष्ट्रीय अभिमान के बिना 'स्वतन्त्रता' का कोई अर्थ नहीं है। भारत जिन समस्याओं का सामना आज कर रहा है उस का मूल कारण इसके द्वारा की जाने वाली राष्ट्रीय पहचान की उपेक्षा करना ही है। राष्ट्र की प्रकृति को शास्त्रीय ढंग से चिति शब्द से सम्बोधित किया गया है। राष्ट्र एक जीवमान इकाई है। उसके कुछ तत्व तो दृश्यमान होते हैं जैसे भूमिखण्ड और मानव समुदाय। पर कुछ तत्व अदृश्य रहते हैं जैसे शरीर में आत्मा होती है पर दिखाई नहीं देती। आत्मा के न रहने से शरीर मृत हो जाता है। उसी प्रकार राष्ट्र की आत्मा उसकी अस्मिता है। राष्ट्र की अस्मिता रहने से वह जीवित रहता है और न रहने से मृत शरीर जैसा हो जाता है। भारत शब्द में ही वह अभिव्यक्ति है जो हमारे अन्दर स्वाभिमान जगाता है। हमारी राष्ट्रीयता का आधार भारत माता है। अतः राष्ट्र का स्वरूप इस एक-जन समुदाय की सामूहिक मूलप्रकृति द्वारा निर्धारित होता है। यही चिति है। इसी से राष्ट में चैतन्य बना रहता है।
संवीक्षण: औपनिवेशिक काल में हिन्दी साहित्यकारों का इतिहास के लोकप्रियकरण में योगदान
डॉ. राकेश कुमार दूबे
राष्ट्र-निर्माण में इतिहास का अप्रतिम योगदान होता है। औपनिवेशिक काल में इतिहास साहित्य का प्रधान अंग समझा जाता था और साहित्य सामाजिक सजीवता एवं निर्जिवता, सामाजिक सभ्यता तथा असभ्यता का एक मात्र निर्णायक होता है। जातियों की क्षमता और सजीवता यदि कहीं प्रत्यक्ष दिखलायी पड़ती है तो उसके साहित्य में। हिंदी साहित्यकारों ने साहित्य के इस प्रमुख अंग इतिहास के लोकप्रियकरण एवं उसके महत्व को प्रचारित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया क्योंकि साहित्य में जो शक्ति छिपी रहती है वह तोप, तलवार और बम के गोलों में भी नहीं पाई जाती। राष्ट्रोन्नति के लिए साहित्य की उन्नति अत्यावश्यक होती है जिसे राय देवीप्रसाद 'पूर्ण' ने रेखांकित किया है कि- अन्धकार है वहाँ, जहां आदित्य नहीं है। मुर्दा है वह देश, जहां साहित्य नहीं है। जब साहित्य इतना महत्वपूर्ण होता है तो उसका प्रधान अंग इतिहास निश्चय ही काफी महत्व का होगा क्योंकि जनता-जनार्दन में जनजागृति लाने में इतिहास का बड़ा हाथ होता है।
जम्मू कश्मीर और महाराजा हरि सिंह की अवहेलना
प्रो. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
जम्मू कश्मीर का व्यावहारिक रूप में विभाजन हो चुका था। सामरिक एवं सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण क्षेत्र पाकिस्तानी सेना के कब्जे में थे। भारतीय सेना युद्धरत थी। लन्दन अच्छी तरह जानता था कि भारतीय सेना का अंग्रेज मुखिया ज्यादा देर तक उस पद पर बना नहीं रहेगा और न ही नया संविधान लागू हो जाने के बाद लार्ड माऊंटबेटन भारत के गवर्नर जनरल रह सकेंगे। ध्यान रहे १५ अगस्त १६४७ से लेकर ३१ दिसम्बर १६४७ तक भारतीय सेना के सेनापति जनरल सर मैकग्रेगर मैकडोनालड लोखार्ट थे और १ जनवरी १६४८ से लेकर १५ जनवरी १६४६ तक सेनापति जनरल सर फ्रांसिस राबर्ट राय बुचर थे। ये दोनों अंग्रेज स्वाभाविक ही ब्रिटेन के हितों की रक्षा कर रहे थे। इन तीनों के चले जाने के बाद भी यदि भारत और पाकिस्तान की लड़ाई चलती रही तो यह भी संभावना थी कि भारत पाकिस्तान के कब्जे में गए जम्मू कश्मीर के इलाके छुड़वा ले। इस संभावना को किसी भी तरह रोकना ब्रिटिश नीति की सबसे बड़ी प्राथमिकता थी। इसलिए लार्ड माऊंटबेटन की सारी रणनीति यह थी कि भारत जम्मू कश्मीर के पाकिस्तानी आक्रमण के प्रश्न को शिकायत के रूप में संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् में ले जाया जाए।



