जुलाई 2015

इतिहास दिवाकर
आयतन 8, मुद्दा 2
जुलाई
01 जुल 2015
इतिहास कृषि दर्शन धर्म वेद संस्कृत संस्कृति
जुलाई 2015
यह 'इतिहास दिवाकर' का जुलाई 2015 का अंक है, जो एक त्रैमासिक अनुसंधान पत्रिका है। इसमें संस्कृत भाषा के महत्व पर एक संपादकीय शामिल है। मुख्य लेखों में संजीवनी विद्या का विश्लेषण, भारतीय संस्कृति में अवतारवाद की अवधारणा, अथर्ववेद के भूमि सूक्त के वैज्ञानिक पहलू, गोस्वामी तुलसीदास की महिमा, प्राचीन भारतीय कृषि तंत्र और एक महान कर्मयोगी को श्रद्धांजलि जैसे विविध विषय शामिल हैं। पत्रिका में ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, और दार्शनिक विषयों पर गहन शोध प्रस्तुत किया गया है।
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मुख्य विशेषताएं

संपादकीय में संस्कृत भाषा को भारतवर्ष की ऋषि परम्परा और ज्ञान-विज्ञान की अक्षय निधि के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो संस्कृति का आधार है।

संजीवनी विद्या का विश्लेषण इसे मृत शरीर को जीवित करने की विद्या के बजाय, एक हतोत्साहित समाज को उसके गौरवशाली अतीत का स्मरण कराकर पुनः स्वाभिमानी और तेजस्वी बनाने की प्रक्रिया के रूप में करता है।

भारतीय संस्कृति में 'अवतारवाद' की अवधारणा पर विस्तृत चर्चा की गई है, जिसमें ऋग्वेद से लेकर पुराणों तक विष्णु के विभिन्न अवतारों के उद्देश्य और यथार्थ का वर्णन है।

वैदिक ग्रंथों के आधार पर यह दर्शाया गया है कि प्राचीन आर्यजन केवल पशुपालक नहीं, बल्कि कृषि-तंत्र के गहन ज्ञाता थे और खेती उनका मुख्य व्यवसाय था।

योगदानकर्ताओं

डश
डॉ० शिवाजी सिंह
मार्गदर्शक (Mentor)
चेतराम
मार्गदर्शक (Mentor)
इख
इरविन खन्ना
मार्गदर्शक (Mentor)
डव
डॉ० विद्या चन्द ठाकुर
सम्पादक (Editor)
चग
चेतराम गर्ग
सह सम्पादक (Co-Editor)
डर
डॉ० रमेश शर्मा
सम्पादक मण्डल
डओ
डॉ० ओम प्रकाश शर्मा
सम्पादक मण्डल
बस
बाबा साहेब आपटे
लेखक (Author)
डप
डॉ. प्रशान्त गौरव
लेखक (Author)
BC
Bhag Chand Chauhan
लेखक (Author)
डप
डॉ. परितोष बैलगो
लेखक (Author)
डर
डॉ. रामविलास शर्मा
लेखक (Author)
शभ
श्रीगुरुपद भौमिक
लेखक (Author)

प्रकाशन सारांश

इतिहास दिवाकर - जुलाई २०१५

सम्पादकीय

संस्कृत भाषा में प्रशस्त आलोक

संस्कृत भाषा विश्व की समृद्धतम भाषा है जिसमें भारतवर्ष की ऋषि परम्परा का प्रशस्त आलोक, विश्व समाज के कल्याण पथ की अक्षय ज्ञाननिधि के रूप में विद्यमान है। संस्कृत भाषा में रचित साहित्य में जहां अध्यात्म के उच्चतम शिखर का स्पर्श है, वहां इसके विपुल साहित्य में ज्ञान–विज्ञान का सर्वांगीण विवेचन सुलभ है। भारतवर्ष की इस गौरवशाली भाषायी धरोहर के सम्मान में प्रतिवर्ष श्रावणी पूर्णिमा को रक्षा बन्धन के पावन दिवस के अवसर पर संस्कृत दिवस का राष्ट्रीय स्तर पर आयोजन होता है। इस वर्ष संस्कृत दिवस कलियुगाब्द ५११७ की श्रावणी पूर्णिमा के अनुसार भाद्रपद सौर मास की प्रविष्टे १३, विक्रमी संवत् २०७२ एवं २६ अगस्त, २०१५ को है। सर्वांगीण ज्ञानपूर्ण संस्कृत भाषा की महिमा का न केवल भारत के महापुरुषों ने गुणगान किया है, बल्कि अनेक विदेशी विद्वानों ने भी संस्कृत भाषा के वैश्विक महत्त्व को स्वीकार किया है। भारतीय मनीषा ने संस्कृत को ही संस्कृति का अधिष्ठान मानते हुए कहा है– संस्कृतिः संस्कृताश्रिता। जब लार्ड मैकाले ने भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के मूलोच्छेदन के प्रयास में संस्कृत महाविद्यालय कोलकाता को बन्द करने का निर्णय लिया तो इस महाविद्यालय के प्रधानाचार्य संस्कृतवेत्ता विदेशी विद्वान् एच.एच.विल्सन ने इस निर्णय से असहमति व्यक्त करते हुए एक श्लोक के द्वारा संस्कृत के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए कहा कि जब तक भारतवर्ष है, जब तक हिमाचल और विंध्य पर्वत हैं, जब तक गंगा और गोदावरी नदियां है, तब तक यहां संस्कृत रहेगी – यावत् भारतवर्षं स्यात् यावत् विन्ध्याहिमाचलौ। यावत् गंगा च गोदा च तावत् एव हि संस्कृतम्।। अनेक पाश्चात्य विद्वान् और उनके रंग में रंगे भारतीय विद्वान् संस्कृत की महिमा के छिद्रान्वेषण में अधिक रुचि रखते हैं। सामान्यतः साम्यवादी (कम्युनिस्ट) विचारक इस कोटि में रखे जाते हैं, परन्तु ऐसा मानना पूर्ण सत्य नहीं है। जिन विद्वानो ने संस्कृत साहित्य का पूर्वाग्रह मुक्त हो कर गहन अध्ययन किया है, वे किसी भी विचारधारा के हों, उन्होंने संस्कृत साहित्य मनीषियों की उपलब्धियों का गुणग्राह्य भाव से प्रतिपादन किया है। ऐसे ही साम्यवादी विचारधारा के एक विशिष्ट विद्वान् हैं – डॉ. रामविलास शर्मा। उन्होंने संस्कृत साहित्य के भीतर साम्यवाद के दर्शन पाए और संस्कृत साहित्य की उपलब्धियों को लेखनीबद्ध करके राष्ट्रीय स्वाभिमान को गर्वोन्नत किया। डॉ. रामविलास शर्मा के गूढ़ भारतीय चिन्तन को नमन करते हुए इस अंक में कृषि दर्शन के अन्तर्गत उनका गवेषणापूर्ण लेख भारतीय जन और कृषि तन्त्र सम्मिलित है।

संवीक्षण

संजीवनी विद्या

बाबा साहेब आपटे

पौराणिक ग्रन्थों में संजीवनी विद्या का उल्लेख बार-बार किया गया है। राक्षसों के गुरु शुक्राचार्य को यह विद्या प्राप्त थी। देवों एवं राक्षसों के युद्ध में जब-जब राक्षस मारे जाते, तब-तब उनके ये गुरु अपनी संजीवनी विद्या की सामर्थ्य से उन्हें फिर जीवित कर देते थे। यह संजीवनी विद्या देवपक्ष की ओर से किसी को भी ज्ञात नहीं थी। अतः उसे हस्तगत करने के लिए देवगुरु बृहस्पति का पुत्र कच, शुक्राचार्य के पास किस प्रकार गया और वहां रहकर भी शुक्रकन्या देवयानी के प्रेमपाश में न फंसते हुए उसने अपना हेतु किस प्रकार सिद्ध किया, यह वृत्तान्त महाभारत में अत्यन्त सुन्दर एवं विस्तृत ढंग से वर्णित है। परन्तु जिस विद्या को सम्पादित करने के लिए कच को इतनी लोकोत्तर कीर्ति प्राप्त हुई, उस संजीवनी विद्या के समग्र विस्तृत वर्णन की तो बात ही क्या, उसके अंशमात्र का किंचित् वर्णन भी पुराणों में या अन्य किसी ग्रन्थ में उपलब्ध नहीं है। तो क्या अन्य अनेक विद्याओं के समान ही यह संजीवनी विद्या भी सदा सर्वदा के लिए विनष्ट हो गई?

संजीवनी का स्वरूप

इस संजीवनी विद्या के स्वरूप के सम्बन्ध में इन दिनों कई विचित्र कल्पनाएं प्रकट की गई हैं। कुछ लोग कहते हैं कि यह जड़ी-बूटी जैसी ही कोई वस्तु होगी। कई लोग कहते हैं कि यह एक मन्त्र है। यह स्पष्ट है कि उनका यह मत महाभारत के वर्णन पर आधारित है। तो कुछ लोगों का तर्क है कि औषधि, मन्त्र एवं विद्युत प्रयोग के सम्मिश्रण से बनी एक प्रक्रिया ही संजीवनी है। परन्तु संजीवनी कोई जड़-मूल या किसी पेड़-पत्ती की औषधि होगी, यह असम्भव ही लगता है। क्योंकि प्रथम बार तो कच के शरीर के टुकड़े-टुकड़े करके लकड़बग्घों को खिला दिए गए थे, दूसरी बार उसकी मृत देह जलाकर उसकी राख समुद्र में फेंक दी गई थी और तीसरी बार तो उस राख को मद्य में मिलाकर उसे स्वयं शुक्राचार्य को ही प्राशन करने को दे दिया गया था।

जीवन और मृत्यु

संजीवनी विद्या का स्वरूप ठीक से ध्यान में आने के लिए प्रथम एक बात अच्छी तरह से समझ लेना आवश्यक है कि जीवन या मृत्यु के सम्बन्ध में तत्कालीन लोगों की धारणा क्या थी? 'मात्र अन्नक्षय करते हुए पालित पोषित शरीर अर्थात् जीवन या जीवितावस्था' एवं 'शरीर नष्ट होने पर वह मृत्यु है' - यह कल्पना उन दिनों प्रचलित नहीं थी। उन दिनों पूज्य व्यक्तियों का अपमान करना उन व्यक्तियों के वध के समान ही माना जाता था।

भारतीय संस्कृति में अवतारवाद का यथार्थ

डॉ. प्रशान्त गौरव

अवतार शब्द की व्युत्पत्ति 'अव' उपसर्ग पूर्वक 'तृ' धातु में घञ् प्रत्यय से सिद्ध होती है। पाणिनि के विशिष्ट सूत्र के अनुसार, 'अवतार' शब्द का अर्थ है, किसी ऊँचे स्थान से नीचे उतरने की क्रिया अथवा उतरने का स्थान। इस सामान्य अर्थ के अतिरिक्त इसका एक विशिष्ट अर्थ भी है- किसी शक्तिसम्पन्न भगवान् या देवता का मानव या अमानव रूप को धारण कर ऊपर के लोक से नीचे के लोक में उतरना। इसी अर्थ में पुराणों में 'आविर्भाव' शब्द का भी प्रयोग पाया जाता है। 'अवतार' की सिद्धि दो दशाओं में मानी जाती है- एक तो नवीन रूप का ग्रहण करना तथा दूसरा नवीन जन्म ग्रहण करना। अवतार-संबंधी भावना का मूल ऋग्वेद में मिलता है। जिसके पांचवें मंडल में अग्नि की एकता वरूण, मित्र तथा अर्यमन् से स्थापित की गई है। आगे चलकर देवता का तादात्म्य देवेतर योनि से स्थापित किया गया। यह प्रवृत्ति ब्राह्मण ग्रंथों के काल तक आविर्भूत हो चुकी थी जिनमें; मत्स्य, कूर्म, वराह तथा नृसिंह प्रजापित के तथा वामन विष्णु के रूपान्तर बताये गये हैं। यही कारण है कि पुराणों ने ब्राह्मण ग्रंथों में वर्णित प्रजापित के उक्त रूपान्तरों के समाहार के साथ-साथ अन्य अवतारों की चर्चा की है। महाभारत में कूर्म, मत्स्य, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण तथा कल्कि विष्णु के अवतार माने गये हैं।

दिव्य विभूति

तुलसी जय तुम्हारी

डॉ. परितोष बैलगो

भारतवर्ष की पुण्य धरा पर प्रयाग के समीप चित्रकूट मण्डल के अन्तर्गत राजपुरा नामक गांव में भक्त शिरोमणि गोस्वामी तुसलीदास का जन्म विक्रमी संवत् १५५४ को श्रावण मास, शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि के दिन हुआ। उनका जीवन श्रीराम के चरणों में समर्पित रहा और उन्होंने एक अभूतपूर्व ग्रन्थ रत्न रामचरितमानस हिन्दू समाज को प्रदान किया जो हिन्दू समाज तक ही सीमित न रह कर विश्व समाज की निधि बन गया है। भारतीय साहित्य में जो ख्याति रामचरितमानस को प्राप्त हुई है, किसी अन्य को नहीं मिली है। साहित्य मनीषी विष्णु कान्त शास्त्री ने गोस्वामी तुलसीदास के प्रति अपने भावोद्गार व्यक्त करते कहा है - विनय के आगार मर्यादा पुजारी। भक्ति के आधार, तुलसी जय तुम्हारी। तुलसीदास भक्तमाल के सुमेरु माने गए हैं। उनका रामचरितमानस हिन्दी काव्यमाला का सुमेरु है। यह एक अनूठा महाकाव्य है जिसमें भक्ति की भूमि पर इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र, कथाकाव्य, चरितकाव्य और लोककाव्य का अद्भुत समन्वय किया गया है।

कृषि दर्शन

प्राचीन जन और कृषि तन्त्र

डॉ. रामविलास शर्मा

बहुत से विद्वानों के मन में यह बात मजबूती से जमी हुई है कि ऋग्वेदकालीन आर्य घुमन्तु जीवन बिताते थे। जहां-तहां वे गांव में रहने लगे थे पर उनका मुख्य धन्धा पशुपालन था। जो लोग यह मानते हैं कि आर्यों ने बाहर से आकर यहां की एक विकसित सभ्यता का नाश किया, उनके लिए यह सोचना स्वाभाविक है कि आक्रमणकारी आर्य बर्बर जीवन बिता रहे थे। ऋग्वेदिक आर्य पुस्तक में राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है : “मोएञ्जोदड़ो और हड़प्पा तथा ऐसे कितने नगरों के संहार के बाद सप्तसिंधु की विजित भूमि को पशुपालक आर्य-जनों ने आपस में बांटकर उसे गोचर भूमि में परिणत कर दिया।” ऋग्वेद में एक जुआरी है - जुआ खेलता है, पछताता है, फिर भी खेलता है। कवि उससे कहता है- कृषि कृषस्व। वह उससे गाय चराने के लिए नहीं कहता, लूटमार के लिए नहीं कहता, खेती करने के लिए कहता है। मानना चाहिए कि खेती आम लोगों का धंधा होगी, तभी उसने जुआरी से ऐसा कहा।

शेष-अशेष

एक महान कर्मयोगी

श्रीगुरुपद भौमिक

माननीय ठाकुर रामसिंह जी एक महान कर्मयोगी, कुशल संगठक, दृढ़ चेता, जितेन्द्रिय एवं प्रचण्ड आत्मशक्ति-सम्पन्न व्यक्ति थे। ये सभी विशेषण उनके लिए केवल अलंकार न होकर, अक्षरशः सत्य थे। असम में संघकार्य सन् १६४८ में संघ पर प्रतिबन्ध लगने के कुछ दिन पूर्व आरम्भ हुआ। प्रतिबन्ध उठ जाने के पश्चात मा. रामसिंह जी को प्रान्त प्रचारक का दायित्व देकर असम में भेजा गया। तत्कालीन असम में संघ-कार्य की दृष्टि से उत्तर-पूर्वांचल के सातों राज्यों के क्षेत्र सम्मिलित थे। तत्कालीन अत्यन्त प्रतिकूल परिस्थिति में ठा. रामसिंह जी की विजिगीषु मनोवृत्ति एवं कठोर परिश्रम के कारण ही, उस समय उत्तर पूर्वांचल में संघकार्य की प्रतिष्ठा सम्भव हो पाई थी। स्वयं के आकर्षक व्यक्तित्व एवं विद्वत्ता की सहायता से मा. ठा. रामसिंह जी इस क्षेत्र के अनेक शिक्षाविदों, भाषाविदों, इतिहासज्ञों एवं गुणवान व्यक्तियों से सम्पर्क स्थापित करने में सफल हुए एवं उन लोगों को संघकार्य तथा विविध-क्षेत्रों में क्रियाशील कर पाये।