सम्पादकीय
गंग सकल मुद मंगल मूला
गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस के अयोध्या काण्ड में पुण्यसलिला गंगा मैया के प्रति ये भावोद्गार व्यक्त किए हैं-
गंग सकल मुद मंगल मूला। सब सुख करनि हरनि सब मूला।।
अर्थात् गंगा समस्त आनन्द मंगलों की मूल है। वे सब सुखों को प्रदान करने वाली और सब पीड़ाओं को हरने वाली है। महाभारत के अनुशासन पर्व में कहा गया है कि जिस प्रकार देवताओं को अमृत, पितरों को स्वधा (हवि की आहुति) तथा नागों को सुधा तृप्त करती है, उसी प्रकार गंगा जल मनुष्यों को तृप्ति प्रदान करता है।
यथा सुराणाममृतं पितृणां च यथा स्वधा। सुधा यथा च नागानां तथा गंगाजल नृणाम्।।
२१ जून, १९५४ को पंडित जवाहर लाल नेहरू जी ने अपनी वसीयत में लिखा है– गंगा भारत की प्राचीन सभ्यता की प्रतीक रही है, निशानी रही है, सदा बलवती, सदा बहती, फिर वही गंगा की गंगा।
भारतवर्ष की सांस्कृतिक मान्याताओं से अभिभूत मुस्लिम कवि अब्दुर्रहीम खानखाना अपनी दोहावली पुस्तक के मंगलाचरण में गंगा मैया की स्तुति करते हुए लिखते हैं कि हे सर्वसमर्थ गंगा माता! तुम विष्णु के चरणों में प्रवाहित हुई हो और शिवजी ने तुम्हें मालती की माला की भांति शीश पर धारण किया है। तुम मुझे विष्णु नहीं, शिव बनाना जिससे मैं तुम्हें अपने सिर पर धारण कर सकूं-
अच्युत चरण तरंगिणी शिव सिर मालति माल। हरि न बनायो सुरसरि कीजौ इन्दवभाल।।
गंगा भारत के लोक जीवन एवं राष्ट्रीय सांस्कृतिक मूल्यों का सतत पुण्य प्रवाह है। इसमें भारत के जन-जन की अखण्ड आस्था है। गंगा प्रदूषण मुक्त हो। गंगा की पावनता जनमानस की आकांक्षा है। भारत सरकार की गंगा सफाई के प्रति संकल्पबद्ध सक्रियता से सर्वमंगलदायिनी गंगा की अविरल निर्मल धारा को प्रवाहित करने में भारतीय संस्कार सम्पन्न नेतृत्त्व अवश्य सफल होगा, ऐसा पूर्ण विश्वास है।
धर्म और समाज
पं. चन्द्रधर शर्मा गुलेरी
समाज के लिए धर्म की आवश्यकता है या नहीं? इस प्रश्न पर कुछ अपने विचार प्रकट करना ही आज इस लेख का उद्देश्य है। प्राचीन और नवीन अथवा पूर्व और पश्चिम इन दोनों के संघर्ष से यह प्रश्न उत्पन्न हुआ है। पूर्वी सभ्यता सदा से धर्म की पक्षपातिनी रही है और उसने धर्म को समाज में सबसे ऊँचा स्थान दिया है। पश्चिमी सभ्यता इस समय चाहे उनकी विरोधिनी न हो, पर उससे उदासीन अवश्य है और कम-से-कम समाज की उन्नति के लिए वह उसे आवश्यक नहीं समझती। उसकी सम्मति में बिना धर्म का आश्रय लिए भी नैतिक बल के सहारे मनुष्य अपनी वैयक्तिक और सामाजिक उन्नति कर सकते हैं।
यद्यपि पहले पश्चिम भी धर्म का ऐसा अनन्य भक्त था जैसा कि इस समय भारतवर्ष। पर मध्यकाल में कई शताब्द तक वहाँ धर्म के कारण बड़ी अशांन्ति मची रही। धर्ममद से उन्मत्त होकर समाज के बड़े-बड़े विद्वानों और संशोधकों के साथ वह सलूक किया जो लुटेरे मालदारों के साथ करते हैं। ५० वर्ष तक लगातार जारी रहने वाला यूरोप का धर्म युद्ध प्रसिद्ध ही है। इस्लाम ने जो सलूक ईसाइयों के साथ किया उसको जाने दीजिए, क्योंकि वह एक भिन्न धर्म था। ईसाई धर्म की ही दो शाखाओं ने, जिनका नाम कैथलिक और प्रोटेस्टेंट है, एक-दूसरे के साथ जैसे-जैसे अत्याचार और अमानुषिक बर्ताव किए हैं, उन पर अब तक यूरोप का इतिहास रुधिर के आँसू बहा रहा है। इसलिए अब इस सभ्यता और उन्नति के युग में पश्चिम निवासियों को यदि धर्म पर श्रद्धा नहीं है जो उनके पूर्वजों की थी तो वह सकारण है। यद्यपि पूर्वापेक्षा अब उनके धर्म का भी बहुत कुछ संस्कार हो गया है और शिक्षा की उन्नति के साथ-साथ जिसमें यूरोप और अमरीका ने सबसे अधिक भाग लिया है, उनके धर्म में भी सहिष्णुता, स्वतंत्रता और उदारता की मात्रा बढ़ गई है। तथापि धर्मवाद के परिणामस्वरूप जो कड़वे फल उनको चखने पड़े हैं, उन्होंने उनको धर्म की सीमा नियत कर देने के लिए बाधित किया, तदनुसार उन्होंने धर्म की अबाध सत्ता से अपने समाज को मुक्त कर दिया। अब वहाँ यही नहीं कि समाज की शासन सत्ता में धर्म कुछ विक्षेप नहीं डाल सकता, किन्तु व्यक्ति स्वातंत्र्य और सामाजिक प्रबंध में भी कुछ हस्तक्षेप नहीं कर सकता और बहुत-सी बातों के समान धर्म भी एक व्यक्तिगत बात मानी जाती है, जिसका जी चाहे, किसी धर्म को माने, न चाहे न माने। मानने से कोई विशेष स्वत्व पैदा नहीं होते, न मानने से कोई हानि नहीं होती।
भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
आचार्य विष्णुकान्त शस्त्री
अधिकांश पश्चिमी विद्वानों के मतानुसार राष्ट्रवाद एक ऐसा राजनीतिक सिद्धान्त है जो राष्ट्र को 'राजनीतिक संगठन की मुख्य ईकाई मानता है और जिसका मुख्य लक्ष्य विशिष्ट राष्ट्रीय जनसमूह पर अवलम्बित स्वाधीन राष्ट्र-राज्य (नेशन-स्टेट) का गठन करना है। पिछली दो शताब्दियों के इतिहास से यह स्पष्ट है कि इस मतवाद को मानने वाले अपने देश में तो दूसरे देशों के शासन का विरोध करते हैं किन्तु शीघ्र ही अपनी राजनीतिक लालसा के कारण प्रायः साम्राज्यवादी का बाना धारण कर लेते हैं। क्या इस मान्यता को भारत पर आरोपित किया जा सकता है? मेरे मतानुसार ऐसा नहीं किया जा सकता, क्योंकि हमारे पारम्परिक राष्ट्रचिन्तन में राजनीति की भूमिका गौण है, उसमें प्रधानता है व्यापक अर्थ में प्रयुक्त धर्म अथवा संस्कृति की, अतः उसकी परिणति हिंसक आक्रामकता में न हो कर उदार, सहिष्णु वैश्विकता में होती है।
अंग्रेज सरकार के विरुद्ध क्रान्ति के अभियोग में एक वर्ष तक विचाराधीन कैदी के रूप में कारागार में रहने के बाद जब भी अरविन्द मुक्त हुए थे तो उन्होंने उत्तरपाड़ा के अपने विख्यात भाषण में कहा था, 'हमारा सनातन धर्म ही हमारे लिए राष्ट्रीयता है। जब सनातन धर्म की हानि होती है तब इस राष्ट्र की अवनति होती हे, और सनातन धर्म का विनाश यदि संभव होता, तो सनातन धर्म के साथ ही इस राष्ट्र का भी विनाश हो गया होता।” यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक प्रतीत होता है कि सनातन धर्म का अर्थ है– चिरपुरातन होते हुए भी नित्य नूतन धर्म, स्वरूप में अपरिवर्तित रहते हुए भी, युगीन प्रयोजनों के अनुरूप नव-नव रूप धारण करने में समर्थ धर्म।
रूप और स्वरूप का मौलिक अन्तर समझना चाहिए। रूप बाहरी होता है अत: वह बदला जा सकता है लेकिन स्वरूप आभ्यन्तर होता है वह बदला नहीं जा सकता। उसके बदलने पर वस्तु ही बदल जाती है। बहुरूपिया एक दिन में दस बार रूप बदल सकता है लेकिन वह अपना स्वरूप नहीं बदल सकता। इस बात को बहुत अच्छे ढंग से भक्ति की परिभाषा के माध्यम से नारदीय भक्ति-सूत्र में समझाया गया है। भक्ति का लक्षण देते हुए उसमें कहा गया है, सात्वस्मिन् परमप्रेमरूपा अमृतस्वरूपाच। वह भक्ति निश्चय ही परमात्मा के प्रति प्रेम रूपा है। अगर भक्ति का रूपपरक लक्षण केवल परम प्रेम ही होता तो भक्ति की पहचान पूरी नहीं होती क्योंकि परम प्रेम तो पति-पत्नी में या अन्यों में भी हो सकता है। इसीलिए भक्ति की पहचान को भ्रान्तिरहित करने के लिए ही जोड़ा गया कि वह अमृतस्वरूपा है। भक्ति अमृतत्व के प्रति निवेदित है, स्वयं अमृता है और भक्तों को भी अमृतत्व प्रदान करने में समर्थ है। भगवद्भक्ति का रूप है परम प्रेम और स्वरूप है अमृतत्व है।



