सम्पादकीय: भारत माता की सन्तान
अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त में कहा गया है कि माताभूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः अर्थात् यह भूमि हमारी माता है और मैं इस धरती मां का पुत्र हूँ। ऋषि-मुनियों का सम्पूर्ण वसुन्धरा के लिए अभिव्यक्त यह वैदिक ज्ञान राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में हमें पुण्यभूमि भारत के साथ माता के श्रेष्ठतम रिश्ते से जोड़ता है, लेकिन आधुनिक भोगवादी प्रवाह में इस रिश्ते से राष्ट्रमानस का एक वर्ग भटक गया है। ऐसा वर्ग भारत भूमि को केवल भूमि मात्र मानता है और उनकी राष्ट्र के साथ मातृभूमि की आस्था मिट सी गई है। यही आस्था का अभाव राष्ट्र के भीतर आतंकवाद, नक्सलवाद आदि के रूप में आसुरी प्रवृत्ति को जन्म दे रहा है। भारतभूमि हमारी माता है और हम सब भारत माता की सन्तान हैं। राष्ट्रमानस में यह अवधारणा सुदृढ़ता से स्थापित हो तो राष्ट्र विरोधी शक्तियां निर्मूल हो जाएंगी और राष्ट्र की शक्ति सशक्त और समर्थ होगी। राष्ट्रनिष्ठा के इसी भाव संस्कार से सम्पन्न होकर हम मन, वचन और कर्म से स्वामी विवेकानन्द जी का यह संदेश फलीभूत करें – पूर्वजों के नाम से हम अपने को लज्जित नहीं, गौरवान्वित समझें। मनुष्य जब पूर्वजों को मानने में लज्जित होता है तो समझ लो उसका विनाश निकट है। भारत की अवनति इसलिए नहीं हुई कि हमारे पूर्व पुरुषों के नियम एवं आचार व्यवहार खराब थे, अपितु इसकी अवनति का कारण यह था कि उन नियमों और आचार-व्यवहारों को उनकी न्यायसंगत परिणति तक नहीं ले जाने दिया गया। हम लोग अतीत का जितना अध्ययन करेंगे, भारत का भविष्य उतना ही उज्जवल होगा।
विवेकानन्दामृतम्: शिकागो विश्वधर्म महासभा और स्वामी विवेकानंद
शिकागो के 'कोलम्बस हॉल' में आयोजित सन् १८९३ के विश्वधर्म महासभा में स्वामी विवेकानंद की भूमिका और उसके विश्वव्यापी प्रभाव को समझने के लिए, उनके संकल्प, व्यक्तित्व और विचारों के प्रभाव को जानना आवश्यक है। स्वामी विवेकानंद की सफलता का आधार उनका यह विश्वास था कि “धर्म महासभा का संगठन इसके लिए हो रहा है।” उन्होंने विदेश जाकर भारतीय अध्यात्म और हिन्दू जीवन दृष्टि को विश्व के सम्मुख रखने का विचार किया। महासभा का आयोजन ईसाई अभिमान से प्रेरित था, जिसका उद्देश्य ईसाई धर्म की श्रेष्ठता स्थापित करना था। स्वामी विवेकानंद ने इसे भांप लिया था। वे किसी राजा या साहूकार के सहयोग से नहीं, बल्कि अपने शिष्यों द्वारा जमा किए गए चंदे से वहां गए थे। वे समूचे हिन्दू समाज के प्रतिनिधि बनकर गए और मां शारदा से आशीर्वाद लेकर यात्रा पर निकले। ११ सितम्बर १८९३ को उन्होंने महासभा में अपना प्रसिद्ध भाषण दिया जिसने इतिहास रच दिया। उनके 'अमरीकीवासी बहनों और भाईयो' सम्बोधन ने श्रोताओं पर जादुई प्रभाव डाला। उन्होंने अपने व्याख्यानों में वैचारिक उदारता, धार्मिक सहिष्णुता, और व्यापक हिन्दू जीवन दृष्टि को व्यक्त किया, और यह संदेश दिया कि सभी धर्म एक ही ईश्वर तक पहुँचते हैं, जैसे नदियाँ समुद्र में मिलती हैं। उन्होंने कहा कि सहयोग, समन्वय और शांति ही मार्ग है, न कि विरोध और कलह। आज भी विश्व उनके विचारों में विश्वशांति का मार्ग देखता है।
देव वृत्त: मण्डी जनपद में देवता महासू
भारतीय देव संस्कृति में हिमाचल प्रदेश का स्थान महत्त्वपूर्ण है। यहाँ के मंडी जिले की निहरी तहसील में देव महासू का प्रसिद्ध मंदिर है, यद्यपि यह देवता मुख्य रूप से शिमला और सिरमौर में पूजे जाते हैं। इनका मूल स्थान हनोल (उत्तराखण्ड) माना जाता है। मंडी में महासू के तीन मंदिर और रथ हैं। एक सामान्य मान्यता के अनुसार, देवता सर्वप्रथम सरेच गाँव के महासूधार जंगल में प्रकट हुए थे। कथा के अनुसार, एक गाय प्रतिदिन एक पत्थर पर अपना दूध चढ़ा देती थी। जब एक ग्वाले ने क्रोध में पत्थर पर कुल्हाड़ी से वार किया, तो आकाशवाणी हुई कि मैं देव महासू हूँ। इसके बाद वे सिरमौर क्षेत्र में प्रमुख देवता के रूप में स्थापित हुए। इस लेख में देवता की पत्नियों, पुत्रों और उनके विभिन्न रूपों का भी वर्णन है। महासू की पूजा-पद्धति, उनसे जुड़े मेले, और 'गूर' (माध्यम) की भूमिका का भी विस्तृत वर्णन किया गया है।
क्रान्तिवीर: भारत के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के महान शहीद राजकुमार प्रताप सिंह
भारत के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम में कुल्लू के राजकुमार प्रताप सिंह भी एक शहीद थे, जिन्हें ३ अगस्त, १८५७ को धर्मशाला में फांसी दी गई थी। कुल्लू के राजा प्रीतम सिंह के पुत्र विक्रम सिंह की निःसंतान मृत्यु के बाद उनके भाई किशन सिंह राजा बने। किशन सिंह की मृत्यु के बाद, उनकी पत्नी अपने छोटे पुत्र प्रताप सिंह के साथ कांगड़ा चली गईं। प्रताप सिंह महाराजा रणजीत सिंह के संरक्षण में बड़े हुए और १८४६ में सिखों की ओर से अंग्रेजों के विरुद्ध लड़े। कुल्लू की राजगद्दी पर अंग्रेजों ने एक अवैध वंशज को बिठा दिया था, जिसका प्रताप सिंह ने विरोध किया। उन्होंने 1857 की क्रांति के समय साधु के भेष में कुल्लू का भ्रमण किया और सशस्त्र विद्रोह की योजना बनाई। उन्होंने स्थानीय नेगियों और कारदारों को अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए पत्र लिखे। यह योजना उजागर हो गई और उन्हें उनके साथियों के साथ पकड़ लिया गया। धर्मशाला में उन पर मुकदमा चला और उन्हें फांसी दे दी गई।
राष्ट्रभाषा: महर्षि दयानन्द का राष्ट्रभाषा उन्नयन
उन्नीसवीं शताब्दी के भारतीय पुनर्जागरण में महर्षि दयानन्द सरस्वती का नाम अग्रगण्य है। वे एक महान समाज सुधारक, वेद भाष्यकार और राष्ट्र भाषा हिन्दी के प्रबल उन्नायक थे। उनकी मातृभाषा गुजराती थी और वे संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित थे, परन्तु उन्होंने अपने वैदिक सिद्धान्तों के प्रचार-प्रसार के लिए हिन्दी को अपनाया। केशवचन्द्र सेन और ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के आग्रह पर उन्होंने १८७३ के बाद अपने प्रवचन और लेखन का माध्यम हिन्दी को बनाया। उन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'सत्यार्थप्रकाश' की रचना भी हिन्दी में की। महर्षि दयानन्द हिन्दी को 'आर्यभाषा' कहते थे और सभी देशवासियों के लिए इसे सीखना अनिवार्य मानते थे। उनका सपना था कि हिमालय से लेकर सागर तक देवनागरी लिपि में आर्यभाषा हिन्दी का ही प्रयोग हो। उनके प्रयासों से हिन्दी को राष्ट्रभाषा का पद प्राप्त करने में बहुत बल मिला।
सृष्टि आख्यान: गुजरात के भील समाज में सृष्टि रचना की पुराकथा
गुजरात के अरावली पहाड़ी क्षेत्रों में भील आदिवासी बसते हैं, जिनकी एक समृद्ध सांस्कृतिक परम्परा है। यह लेख उनके समाज में प्रचलित सृष्टि रचना की एक पुराकथा का वर्णन करता है। इस कथा के अनुसार, प्रारम्भ में न धरती थी, न आकाश, केवल सर्वत्र जल था। भगवान जल में कीड़े के अवतार में थे। जल में एक अंडा बना, जिससे 'जलुकार' भगवान प्रकट हुए। उनके रहने के लिए कोई स्थान नहीं था, तब मनसा देवी मछली के रूप में प्रकट हुईं और उनकी नाभि से कमल का फूल खिला, जिस पर भगवान बसने लगे। भगवान ने धरती की रचना का विचार किया, जिसके बीज वासुकी नाग के मुख में थे। भगवान के मुख से निकले अमृत से उमिया देवी प्रकट हुईं। भगवान के आदेश पर उमिया देवी कछुए का रूप धारण कर पाताल से धरती के बीज लाईं। उन बीजों से रोटी बनाकर जल पर फैलाई गई, जिससे पृथ्वी का निर्माण हुआ। इस कथा में शिव, कैलाशपुरी और मानव जाति की उत्पत्ति का भी वर्णन है। यह पुराकथा भीलों की मौखिक परम्परा का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है और उनके धार्मिक अनुष्ठानों में सुनाई जाती है।



