इतिहास दिवाकर: जुलाई २०११
संपादकीय: संस्कृत दिवस और हिन्दी दिवस
भारतवर्ष में प्रतिवर्ष श्रावणी पूर्णिमा रक्षा बन्धन के दिन संस्कृत दिवस का आयोजन होता है। यह आयोजन राष्ट्रमानस को राष्ट्र की निरन्तर प्रवाहमान संस्कृत भाषा की गौरवशाली परम्परा का स्मरण करवाता है। भारतवर्ष के भूतपूर्व महामहिम राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जब ग्रीस की यात्रा पर गए थे तो वहां एथेंस के राष्ट्रपति भवन में आयोजित स्वागत समारोह में ग्रीस के महामहिम राष्ट्रपति कारलोस पापोलियस ने उनके स्वागत का समारम्भ संस्कृत भाषा में यह कहकर किया – राष्ट्रपतिः महाभागाः स्वागतम् यवनदेशे। संस्कृत भाषा में अभिव्यक्त यह स्वागत वाक्य इस सत्य का प्रमाण है कि संस्कृत भाषा भारत की पहचान है। इसमें सृष्टि का कल्पादि से 197 करोड़ वर्षों से भी अधिक कालावधि का इतिहास समाहित है। इसमें अध्यात्म, दर्शन, लोक जीवन तथा समस्त ज्ञान-विज्ञान का अक्षय भण्डार संग्रहित है जिससे सम्पूर्ण विश्व के कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।
14 सितम्बर का दिन भारतवर्ष में प्रतिवर्ष हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिवस का आयोजन रस्म-अदायगी मात्र होता जा रहा है। शासन राष्ट्र भाषा हिन्दी के प्रति संवेदनशील नहीं है। अंग्रेजी भाषा का ज्ञान अर्जित करना अनुचित नहीं है, परन्तु राष्ट्र भाषा हिन्दी पर अंग्रेजी का वर्चस्व स्थापित करना, अत्यन्त अशोभनीय है। यहां तक कि हिन्दी भाषी प्रान्तों में भी अंग्रेजी भाषा के सामने हिन्दी भाषा बौनी बनी हुई है। प्रथमतः हिन्दी भाषी प्रान्तों की सरकारों को राष्ट्र धर्म का निर्वाह करते हुए शासकीय कार्यों में हिन्दी का प्रयोग प्रतिबद्ध भाव से सुनिश्चित करवाना चाहिए, तभी इसके लिए राष्ट्रव्यापी अनुकूल वातावरण सृजित हो सकेगा। पौष कृष्ण अष्टमी, कलियुगाब्द 4963, विक्रमी संवत् 1918 तदनुसार ईस्वी सन् 25 दिसम्बर, 1861 को जन्म प्राप्त भारत राष्ट्र की महान् राष्ट्रभक्त विभूति महामना मदनमोहन मालवीय जी का वर्तमान प्रचलित वर्ष 150 वां जन्म जयन्ती वर्ष है। इसी के दृष्टिगत महामना मालवीय जी से सम्बन्धित लेख भी इस अंक में सम्मिलित हैं।
हिमालय क्षेत्र-आंतरिक एकता के सूत्र
ठाकुर राम सिंह
हिमालय विश्व में अपने सर्वाधिक विशाल और उच्चतम शिखरों की भव्यता, दिव्यता और सुन्दरता से युक्त अपने सजीव और वर्धमान अस्तित्व के साथ गौरव से जम्बूद्वीप के मध्य विराजमान है। यह भारतीय जीवन की संरचना में अपृथक्-करणीय भाव से जुड़ा है। यह आज भी हमारे देश भारत के कवियों, लेखकों, गायकों, नर्तकों, शिल्पियों और रंगचित्रकों को उत्साहित और प्रेरित करता है। महाकवि कालीदास ने इसे नागाधिराज अर्थात् पर्वतों का राजा कहा है।
हिमालय का उल्लेख विश्व के प्रथम ग्रंथ ऋग्वेद के हिरण्यगर्भ सूक्त में आता है। इसमें कहा गया है – ज्योतिर्मय अंड से जिस सृष्टिकर्त्ता ब्रह्माजी का उदय हुआ वही हिमवंत पर्वत का भी स्वामी है। अथर्ववेद के पृथ्वीसूक्त में भी हिमालय की प्रशंसा की गयी है।
आधुनिक पाश्चात्य भूगर्भ शास्त्र के अनुसार हिमालय का जन्म ‘तेथाइस' सागर के तल से आज से पाँच करोड़ वर्ष पूर्व हुआ था। इतने विशाल हिमालयी क्षेत्र के जनजीवन के आंतरिक सूत्रों को जानने के लिये इस विस्तृत भूखण्ड के देशों के प्राचीन इतिहास और वर्तमान स्थिति का सिंहावलोकन करना आवश्यक है। जापान, फिलिपाइन और आस्ट्रेलिया को छोड़कर हिमालय दक्षिण-पूर्व एशिया के प्रायः सभी देशों में अपनी विभिन्न पर्वत श्रृंखलाओं के रूप में फैला हुआ है। इसमें वर्तमान इण्डोनेशिया (हिन्दू एशिया), मलाया, वर्मा, थाईलैण्ड, कम्बोडिया, लाओस, अन्नाम, चम्पा (वियतनाम), टोकिन, कोचीन आदि सभी देश पूर्व में भारत के अंग रहे हैं। इन सब देशों की सभ्यता और संस्कृति का मूल स्रोत भारत ही है। इन सब देशों में बड़े-बड़े हिन्दू मंदिर हैं, जिनमें हिन्दू देवी-देवताओं की ७०-७० व ८०-८० फुट ऊँची प्रतिमायें हैं।
संविधान की मूल भावना है अखण्ड भारत
कृष्णानन्द सागर
भारतवर्ष के लाखों-करोड़ों वर्षों के इतिहास में सन् १९४० से पहले कभी भी 'अखण्ड भारत' शब्द का प्रयोग नहीं हुआ। न तो आदिकालीन वेदों में, न त्रेताकालीन रामायण में, न द्वापरकालीन महाभारत में, न पुराणों में। जहाँ भी प्रयोग हुआ है, वह भारत शब्द है, 'अखण्ड भारत' नहीं। आखिर १९४० में ऐसा क्या हो गया कि परम्परा से चले आ रहे 'भारत' शब्द के साथ उस समय के कुछ लोगों को 'अखण्ड' शब्द भी जोड़ना आवश्यक लगने लगा और अनेक नेताओं ने 'अखण्ड भारत' शब्द का प्रयोग अपने भाषणों में करना आरम्भ कर दिया। वास्तव में 'भारत' कहते ही आसेतु हिमाचल एक विशाल पावन भूखण्ड की परिकल्पना हमारे मस्तिष्क में उभर आती है। इस भूखण्ड को तीन ओर से समुद्र ने घेर रखा है और चौथी ओर से हिमालय अपनी दोनों लम्बी भुजाओं को फैलाकर पूर्व और पश्चिम दोनों दिशाओं से हिन्दमहासागर को स्पर्श कर रहा है।
यह बात देशभक्तों के लिए अत्यन्त पीड़ादायक थी। इस पीड़ा में से ही भारत को अखण्ड रखने का संकल्प लोगों के हृदयों में उद्भूत हुआ और 'अखण्ड भारत' शब्द प्रचलित हुआ। कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने तो भारत की अखण्डता को बचाने के लिए १९४०-४१ में कांग्रेस से अलग एक विधिवत् 'अखण्ड भारत मोर्चा', ही गठन कर डाला। अखण्ड भारत की अनिवार्यता को समझने के लिए हमें पहले 'राष्ट्र और 'राज्य' के प्रति भारतीय दृष्टि को समझने की आवश्यकता है। राष्ट्र के मुकाबले राज्य अत्यन्त ही सामान्य इकाई है। राष्ट्र एक महती इकाई है। राष्ट्र कोई दृश्यमान वस्तु नहीं, तो भी वह एक जीवमान इकाई है।
राष्ट्र-विभूति: महामना मदनमोहन मालवीय
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
जिन महापुरुषों ने भारतवर्ष को सब प्रकार की पराधीनता से मुक्ति दिलाकर उसे स्वतन्त्र और सम्मानित राष्ट्र बनाने के प्रयत्न किए हैं उनमें महामना मालवीय जी का नाम अग्रगण्य है। इनके बारे में महात्मा गांधी जी ने लिखा था कि “उनका भीतरी जीवन बहुत-बहुत विशुद्ध था। वे दया के भण्डार थे। सन् १८६१ का साल भारतवर्ष के लिए बड़ा शुभ था। इसी साल कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्म हुआ। इसी साल पं. मोतीलाल नेहरू पैदा हुए और इसी साल पं. मदनमोहन मालवीय जी भी उत्पन्न हुए। तीनों ने ही भारतमाता का नाम उजागर किया।
मालवीय जी का जन्म सन् १८६१ में २५ दिसम्बर को इलाहाबाद के प्रतिष्ठित किन्तु निर्धन ब्राह्मण परिवार में हुआ। इनके पूर्वज कभी मालवा से आकर इलाहाबाद में बस गए थे। इसी लिए वे लोग मालवीय कहलाए। मालवीय जी के हृदय में भारतीय संस्कृति और सभ्यता का बड़ा मान था। वे यह देखकर बहुत कष्ट अनुभव करते थे कि देश के नवयुवक विदेशी प्रभाव में पड़कर गलत ढंग का आचार सीख रहे हैं। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय मालवीय जी का सब से बड़ा काम माना जाता है। इसको बनाने के लिए सन् १९०४ से ही उन्होंने प्रयत्न शुरू कर दिया था। एक करोड़ रुपया इकट्ठा करने के बाद ४ फरवरी, १९१८ के दिन शुभ मुहूर्त में शास्त्र-रीति के अनुसार लार्ड हार्डिंग के हाथों से हिन्दू विश्वविद्यालय का शिलान्यास करवाया गया।
हिन्दी दिवस विशेष: हिन्दी क्यों नहीं बनी राष्ट्रभाषा
श्रीप्रकाश
सन् १९६५ के आसपास सम्पूर्ण दक्षिण भारत में हिन्दी का विरोध हो रहा था। तमिलनाडु में तो यह विरोध सारी सीमाएं पार कर गया था। 'डाउन-डाउन विद हिन्दी' के नारों के साथ सम्पूर्ण तमिलनाडु में हिन्दी का विरोध चरमोत्कर्ष पर था। उसी समय चेन्नै विश्वविद्यालय द्वारा भौतिक शास्त्र से संबंधित एक व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ सरसंघचालक पूज्य रज्जू भैया, जो उस समय उत्तर प्रदेश के प्रान्त प्रचारक थे, को भी भाषण हेतु आमंत्रित किया गया था। रज्जू भैया ने अपना भाषण हिन्दी में प्रारंभ किया ही था कि सभागार में चारों ओर विरोध का स्वर गूंज उठा।
भारतीय संविधान की धारा ३४३ (१) के अनुसार—संघ की राजभाषा हिन्दी एवं लिपि देवनागरी होगी। कहा जाता है कि तकनीकी शिक्षा के लिए, विज्ञान की शिक्षा के लिए अंग्रेजी आवश्यक है। यह सर्वथा असत्य एवं मिथ्या है। यह दुष्प्रचार है। इसके पीछे कुछ लोगों द्वारा अपने निहित, गर्हित स्वार्थों के लिए बहुमत के साथ किया जाने वाला षड्यंत्र है। आज रूस, चीन, जापान, जर्मनी, फ्रांस, सबकी अपनी भाषा है, अपनी संस्कृति है। इन देशों ने ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में काफी प्रगति की है। अपनी राष्ट्रभाषा के नाते हिन्दी ही चलनी चाहिए, अंग्रेजी नहीं।



