इतिहास दिवाकर - जुलाई २०१०
अनुक्रमणिका
सम्पादकीय
संवीक्षण
- हमारे साधु-संत एवं समाज - ठाकुर राम सिंह
- राष्ट्र रक्षक महाराज सुहेल देव - डॉ. परशुराम गुप्त
- त्रिगर्त का कटोच वंश - डॉ. एस.के. बंसल
जगत शक्ति
- भगवती सती - कृष्णानन्द सागर
जगत विभूति
- शिल्प शास्त्र के आदि आचार्य विश्वकर्मा - रामशरण युयुत्सु
सर्वेक्षण
- हिमाचल प्रदेश में नाग देवता - डॉ. सूरत ठाकुर
लोक धारा
- विष्णु की देव समाज को शिक्षा - दीपक शर्मा
गतिविधियाँ
सम्पादकीय: सत्यं परं धीमहि
महर्षि वेदव्यास ने भागवत पुराण का समारम्भ करते हुए प्रथम स्कन्ध के प्रथम अध्याय के प्रथम श्लोक में यह वचन कहा है – सत्यं परं धीमहि अर्थात् हम परम सत्य का ध्यान करें। भागवत की यही मंगल कामना इतिहास में अपेक्षित है। ध्यानपूर्वक परम सत्य की गवेषणा कर के लिखे गए तथ्यपूर्ण वृत्तान्त से ही भारतीय ऋषि मुनियों की इतिहास की संकल्पना साकार होती है जिस संकल्पना में कहा गया है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के उपदेश सहित कथायुक्त प्राचीन चरितों एवं घटनाओं के वृत्तान्त को इतिहास कहा जाता है। पुराण शास्त्रों में लोक मंगल की इसी उदात्त दृष्टि से इतिहास का प्रतिपादन हुआ है। अतएव भागवत पुराण की कथा को पूर्ण करते हुए महामुनि शुकदेव परम भागवत राजा परीक्षित् से कहते हैं – कथा इमास्ते कथिता महीयसां विताय लोकेषु यशः परेयुषाम्। विज्ञानवैराग्यविवक्षया विभो वचोविभूतिर्न तु पारमार्थ्यम्॥ अर्थात् इस संसार में बड़े-बड़े प्रतापी और महान् पुरुष हो चुके हैं जो इस लोक में अपने यश का विस्तार करके चले गए। उनकी यह इतिहास कथा विज्ञान और वैराग्य की प्राप्ति के लिए सुनायी गई है। ये केवल वाणी का वैभव और विलास नहीं है। इन में जीवन का परम अर्थ और तत्त्व समाहित है। वाणी के विलास मात्र में नहीं, जीवन में परम अर्थ के विवेचन से ही इतिहास में सत्यं पर धीमहि का आलोक प्रज्ज्वलित है।
हमारे साधु संत एवं समाज
हमारी पुण्य भूमि भारत में सनातन धर्म की परम्परा के अनुसार समय-समय पर अनेक आचार्यों और साधु-सन्तों ने जन्म लिया है, परन्तु समाज में उनके बारे में यह मूल धारणा प्रचलित है कि वे साधु-संत प्रभु भक्ति में लीन रहते थे और उनका एकमात्र उद्देश्य रहा है आत्म कल्याण तथा समाज से उन्हें कोई लेना-देना नहीं था। परंतु यह विचार पूर्णतः असत्य है। समाज पर जब भी विदेशी या आंतरिक संकट आया है तो संतों ने समाज को जागृत करने और एकता के सूत्र में बान्ध कर समाज को जगाने के भरसक प्रयत्न किये हैं। समाज में आई कुरीतियों और विकृतियों को दूर कर धर्म के वास्तविक स्वरूप को जन भाषा में प्रचारित कर जन-जन तक पहुंचाया है।
गैर क्षात्र दल का निर्माण
महाभारत के युद्ध में बहुत बड़ा नरसंहार हुआ और ज्ञान-विज्ञान की अपूरणीय क्षति हुई। अतः युद्ध के बाद देश में शान्ति के आन्दोलन जैन समाज और बुद्ध धर्म के रूप में प्रकट हुए। युद्ध से घृणा पैदा की गई। अतः दोनों आन्दोलन क्षात्र धर्म के विपक्ष में अहिंसा को परम धर्म मानते थे। इनके अहिंसा के प्रचार के कारण क्षात्र धर्म का ह्रास होना शुरू हुआ।
अरब में इस्लाम का उदय
कलियुगाब्द ३७०२ तदानुसार ईस्वी की छठी शताब्दी में अरब में इस्लाम का उदय हुआ। उसने सैनिक शक्ति के आधार पर सारे मध्यपूर्व को जो शिव उपासक था, पादाक्रांत कर वहां की सभ्यता, संस्कृति, मान्यताओं और परम्पराओं को समाप्त कर इस्लामिक जीवन में परिवर्तित कर दिया।
नये क्षात्रिय वर्ग का निर्माण
समाज की सुरक्षा का दायित्व क्षत्रियों पर था, परंतु उनमें से बहुतों ने अपना दायित्व छोड़कर अन्य काम अपना लिए। क्षत्रियों के ह्रास होने से देश की सुरक्षा के लिए संकट उत्पन्न हो गया। उस समय के साधु-सन्तों ने राष्ट्र चिन्तकों के साथ विचार-विमर्श कर नये क्षत्रिय वर्ग के निर्माण की योजना बनाई। अतः सारे देश का सर्वेक्षण करने से ज्ञात हुआ कि केवल ३६ क्षत्रिय कुल ऐसे हैं जिन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार नहीं किया है। अतः सन्तों ने एक नये क्षत्रिय वर्ग के निर्माण करने के लिए पवित्र आबू पर्वत पर एक राष्ट्रीय चिंतन वर्ग का आयोजन किया और उन ३६ राजकुमारों के प्रतिनिधियों को आबू पर्वत के चिंतन वर्ग में आमन्त्रित किया।
राष्ट्र रक्षक महाराजा सुहेल देव
कलियुगाब्द ४१०३ से ४१२७ (१००१ ई० से लेकर १०२५ ई०) तक महमूद गजनवी ने भारत वर्ष को लूटने की दृष्टि से १७ बार आक्रमण किये तथा अन्त में मथुरा, थानेसर, कन्नौज व सोमनाथ के अति समृद्ध मंदिरों को लूटने में सफल रहा। सोमनाथ की लड़ाई में उसके साथ उसके भानजे सैयद सालार मसूद गाजी ने भी भाग लिया था। कलियुगाब्द ४१३२ (१०३० ई०) में महमूद गजनवी की मृत्यु के बाद उत्तर भारत में इस्लाम का विस्तार करने की जिम्मेदारी मसूद ने अपने कन्धों पर ली, लेकिन कलियुगाब्द ४१३६ (१० जून, १०३४ ई०) को बहराईच की लड़ाई में वहां के शासक महाराजा सुहेल देव के हाथों वह डेढ़ लाख जेहादी सेना के साथ मारा गया। इस्लामी सेना की इस पराजय के बाद भारतीय शूरवीरों का ऐसा आतंक विश्व में व्याप्त हो गया कि उसके बाद आने वाले १५० वर्षों तक किसी भी आक्रमणकारी को भारत वर्ष पर आक्रमण करने का साहस ही नहीं हुआ। महाराजा सुहेलदेव का साम्राज्य पूर्व में गोरखपुर तथा पश्चिम में सीतापुर तक फैला हुआ था।
त्रिगर्त का कटोच वंश
त्रिगर्त का कटोच वंश इतिहास के पन्नों पर प्राचीन काल से अंकित है। इस वंश के उद्भव के सन्दर्भ में विद्वानों के कई पक्ष समक्ष आते हैं। इनमें एक पक्ष यह भी सामने आया है कि इस वंश का उद्भव मंगोल जाति से हुआ है। उत्तर भारत में हिमाचल प्रदेश अपनी भौगोलिक स्थिति, प्राचीन सांस्कृतिक परम्पराओं, कला, सभ्यता एवं ऐतिहासिक दृष्टि से गौरव-पूर्ण स्थान रखता है। त्रिगर्त एक प्रमुख गणराज्य था। इस गणराज्य में राजपूतों का ही बाहुल्य था। हिमालय और विशेषकर त्रिगर्त कांगड़ा में कटोच्च राज परिवार सर्व प्रमुख था जो अपनी गौरवपूर्ण विशेषताओं और मौलिकता से सम्पन्न रहा होगा।
भगवती सती
शिव-पत्नी सती कैलाश पर्वत पर विचरण कर रही थी। उसने देखा कि आकाश मार्ग से विभिन्न देवी-देवता अपने-अपने वाहनों पर सवार होकर कहीं जा रहे हैं। उनसे पूछने पर पता चला लगा कि प्रजापति दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया है, उसी यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए वे सभी जा रहे हैं। दक्ष प्रजापति सती के पिता थे। एक बार वे ब्रह्माजी की सभा में पधारे तो वहाँ उपस्थित अन्य सभी लोग उनके सम्मान में खड़े हो गए, किन्तु शिवजी अपने स्थान पर ही बैठे रहे। दक्ष ने इसे अपने दामाद की धृष्टता माना और भरी सभा में उन्हें काफी भला-बुरा कहा। यही कारण था कि दक्ष ने अपने यहाँ यज्ञ रचाया तो यज्ञ हेतु सभी देवों को तो निमन्त्रण भेजा, किन्तु अपने ही दामाद शिवजी को नहीं बुलाया। शिव के बारे में इस प्रकार की कटु बातें सुन सती की आँखों से तो मानो अंगार बरसने लगे। यह कह सती दोनों हाथ जोड़कर और शिवजी को स्मरण कर यज्ञ कुण्ड में कूद गई। उसका शरीर सारा जलने लगा।
शिल्प शास्त्र के आदि आचार्य विश्वकर्मा
विश्व की प्राचीन शिल्प कला के क्षेत्र में भारत का अत्यन्त गौरवपूर्ण स्थान है, जिस पर हम गर्व कर सकते हैं। विश्वकर्मा को शिल्पकला का प्रथम प्रवर्तक एवं आचार्य माना जाता है। विश्वकर्मा देवताओं के वास्तु एवं शिल्पकार थे; जो बाद में भूवासियों के लिए प्रथम वास्तु प्रवर्तक बनें। अति प्राचीन वैदिक काल में लोहा, कांसा और पाषाण आदि पदार्थों की एक साथ उन्नति कर विज्ञान के उच्चतम शिखर पर पहुंच चुका था। आज भी कुछ लोग उसी प्राचीन वैदिक काल के विज्ञान की झलक वापिस लाने का प्रयत्न कर रहे हैं। ईश्वर निर्मित पदार्थों के गुणों की खोज करना ही विज्ञान है और फिर जिस प्रयोजन के लिए जो पदार्थ उपयुक्त हो सकता है उस पदार्थ को उस प्रयोजन के लिए उपयुक्त बना देना ही शिल्प है। यही विश्वकर्मा का विज्ञान और शिल्प विद्या है।
हिमाचल प्रदेश में नाग देवता
हिन्दू मान्यता के अनुसार नाग देवता भगवान विष्णु की शेष-शय्या के रूप में, शिवजी के गले के हार के रूप में, समुद्र मंथन के समय रस्सी के रूप में शोभा बढ़ाते रहे हैं। पश्चिमी हिमालय विशेषकर हिमाचल प्रदेश में ये नाग देवता अनेकों नामों से पूजे जाते हैं। इनके यहां असंख्य स्थान व मन्दिर हैं। ये लोगों के सुख-दुख में बराबर के भागीदार बनते हैं। इनका सम्बन्ध ठण्डे जल के स्वच्छ स्रोतों से इतना अधिक जोड़ा जाता है कि यहां के लोग स्रोतों का प्रस्फुटन प्रायः नाग देवताओं के कारण ही मानते हैं। लगभग समस्त हिमाचल में नाग देवताओं के असंख्य स्थान व मन्दिर हैं। ये मन्दिर प्रायः देवदार के कुंजों के मध्य या निर्जन पर्वतीय भागों में या जलस्रोतों के समीप पाये जाते हैं।
विष्णु की देव समाज को शिक्षा
कुल्लू जिला के निरमण्ड तहसील के प्राचीन ऐतिहासिक गांव निरमण्ड में यह लोक गाथा प्रचलित है कि मोघी मृत्युलोक में विष्णु भगवान की परम् भक्तिनी थी। समाज द्वारा निम्न श्रेणी में समझी जाने वाली भक्त मोघी चनाड़ी को विष्णु भगवान ने सबसे पहले दर्शन दिये थे। मोघी की श्रद्धा और भावना को देखकर विष्णु भगवान उसकी बात को नहीं काटते थे। परन्तु गलतफहमी का शिकार देव समाज जातिवाद के घेरे में आकर कथा को इस मोड़ पर खड़ी कर देता है कि विष्णु भगवान देव समाज की बिरादरी से बाहर हो जाते हैं। परन्तु पालनहार विष्णु भगवान देव समाज की इस जातिवादी मनोवृति पर ऐसा कुठाराघात करके ऐसा सबक सिखाते हैं कि सारा देव समाज विष्णु के चरणों में नतमस्तक हो जाता है।



