इतिहास दिवाकर - जुलाई २००९
अनुक्रमणिका
- सम्पादकीय: 100 वर्ष पहले का उत्तरपाड़ा भाषण
- उद्बोधन: इतिहास घटित होता – निर्देशित नहीं (लेखक: मा० मोहन राव भागवत)
- काल तत्त्व: श्वेत वाराह कल्प (लेखक: वासुदेव पोद्दार)
- अवबोधन:
- तुफाने नूह की वास्तविकता (लेखक: ठा. नगीना राम परमार)
- इतिहास के परिप्रेक्ष्य में हिन्दू और बौद्ध (लेखक: डॉ० शारदा सिन्हा)
- रणथम्भौर का हम्मीर चौहान (लेखक: गोकुल चन्द गोयल)
- पर्व त्यौहार: श्रावणी पूर्णिमा (लेखक: चेतराम गर्ग)
- ध्येय पथ: हिमालय की गोद में... (लेखक: नरेन्द्र सहगल)
- कार्यशाला
सम्पादकीय
100 वर्ष पहले का उत्तरपाड़ा भाषण
उत्तरपाड़ा पश्चिमी बंगाल प्रान्त में हुगली नदी के तट पर एक कस्बा है। इस स्थान पर महर्षि अरविन्द घोष ने कलियुगाब्द के 5011 वें वर्ष में 30 मई, 1909 को एक ऐतिहासिक भाषण दिया जिसमें भारतवर्ष का वास्तविक मौलिक चित्र उज्ज्वल होता है। इस वर्ष उत्तरपाड़ा भाषण के 100 वर्ष पूर्ण हुए हैं। अतः यह वर्ष इस भाषण का शताब्दी वर्ष है। अरविन्द घोष भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अग्रणी नेता थे। बाद में इन्होंने राजनीति से विरक्त हो कर अध्यात्म साधना का मार्ग अपनाया और तब महर्षि अरविन्द के नाम से जगत् प्रसिद्ध हुए। भारत के स्वाधीनता संग्राम में उनका राजनीति से हट कर भी सक्रिय योगदान रहा। राजनीतिक जीवन काल से ही इन्होंने भारत को एक सशक्त सनातन शक्ति के रूप में देखा। ...कारागार के एकान्तवास में मुझे भगवान् ने अपने चमत्कार दिखाए और मुझे हिन्दू धर्म के वास्तविक सत्य का साक्षात्कार करवाया। हम प्रायः हिन्दू धर्म और सनातन धर्म की बातें करते हैं, किन्तु हम में से कम लोग जानते हैं कि यह धर्म क्या है? दूसरे धर्म मुख्य रूप से व्रत, दीक्षा और मान्यता को महत्त्व देते हैं, लेकिन हिन्दू सनातन धर्म तो स्वयं जीवन है। यही धर्म देने के लिए भारत उठ रहा है। ...यह पूरे विश्व में सनातन ज्योति फैलाने के लिए उठ रहा है। भारत का जीवन सदा ही मानव जाति के लिए रहा है। इसे अपने लिए नहीं, मानव जाति के लिए महान होना है। इसलिए जब यह कहा जाता है कि भारत का उदय होगा तो उसका अर्थ होता है, सनातन धर्म का उदय होगा। धर्म के लिए और धर्म द्वारा भारत का अस्तित्व है।
उद्बोधन: इतिहास घटित होता – निर्देशित नहीं
मोहन राव भागवत द्वारा
अपने इतिहास के प्रति आस्था होना, मानव समाज का श्रेष्ठ गुण है, परन्तु आज हमारे में इतिहास के प्रति अनास्था का दुर्गण बढ़ गया है। हाल ही में जो व्यापारीकरण का दौर चला है, उसने हमारी इस सोच को ओर गहरा किया है। विश्व को बाजार बनाने वाली शक्तियों ने मनुष्य जीवन के बारे में जो कुछ बोला और लिखा है, उस में इतिहास जैसे विषय को अनावश्यक बताया गया है। उनकी मान्यता है कि इतिहास को पढ़ने और पढ़ाने की कोई आवश्यकता नहीं है। ...आज जो हम इतिहास पढ़ रहे हैं वह निर्देशित इतिहास है। क्योंकि घटनाओं को निर्देशित ढंग से ठूंसने की इच्छा रखने वाली शक्तियों का आज बोलबाला है और हमारा संघर्ष इन के खिलाफ है। हमारा अर्थात् भारत वर्ष, हिन्दुओं और संघ के स्वयंसेवकों का संघर्ष इनके विरुद्ध है। ...यह देवी प्रवृत्ति का संघर्ष दानवी प्रवृत्ति के साथ है। यह लगातार चलने वाला संघर्ष है। ...हम घटित इतिहास बताएंगे न कि निर्देशित। इतना बड़ा महाभारत का युद्ध हुआ, व्यास जी का अपना एक भी शब्द नहीं जबकि महाभारत में उन्होंने अहम् भूमिका निभाई। ...कितना निर्विकार ढंग से उन्होंने लिखा है। जहां जैसा घटित हुआ वैसा वर्णन किया। कहीं निर्देशित नहीं, जो जैसा हुआ वैसा बता दो। लोग खुद तय करेंगे कि सत्य क्या है।
काल तत्त्व: श्वेतवाराह कल्प - इतिहास और विज्ञान
वासुदेव पोद्दार द्वारा
पृथ्वी के व्यवस्थित जैवपर्यावरण का प्रारम्भ १ अरब ९७ करोड़ वर्ष पूर्व हुआ था, जो भारतीय पौराणिक इतिहास में श्वेतवाराह-कल्प के नाम से प्रसिद्ध है। इसके व्यापक विज्ञान को वाराह अवतार की कथा के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। ...पुराणों की प्राचीनतम ऐतिहासिक परम्परा में-इतिहास का प्रारम्भ यहीं से होता है, जो श्वेतवाराह कल्प के नाम से प्रसिद्ध है, जिसका आधार है – ग्रह नक्षत्रों की स्थिति एवं गति। वराह शब्द का अर्थ है – वायु। ...भारतीय इतिहास का विषय – प्रवर्तन तो पाँच सहस्र वर्षों के काल प्रवाह से नहीं, 'हिरण्यगर्भ' – आदिअण्ड की संरचना के काल-बिन्दु से होता है। ऋषि-मनीषा ने इतिहास और विज्ञान दोनों को समान धरातल पर देखा और समझा है, वहां इन दोनों का प्रवर्तक बिन्दु एक है। अतः इतिहास वहां स्वयं एक विज्ञान है। ...इतिहास पद अंग्रेजी के 'History' शब्द का अनुवाद नहीं, न इनका अर्थ बोध की सीमाओं में परस्पर सम्बन्ध ही स्थापित हो पाता है। ...'Hitory' शब्द का अर्थ है Inquiry वहां सम्भावनामूलक अर्थ की प्रधानता है अतः हिस्ट्री सर्वत्र अपने अर्थ बोध की सीमा में एक सम्भावनामूलक इन्क्वारी मात्र है। इसके विपरीत इतिहास पद का अर्थ विनिश्चयार्थक है। इस पद में तीन पदों के शक्तिग्रह उसके अर्थ को स्पष्ट करते हैं – 'इति-ह-आस'। इति पद का अर्थ है- ऐसा व इस प्रकार, ह-निश्चित, आस-था, अतः सम्पूर्ण पद का अर्थ- ' ऐसा निश्चित था' या 'ऐसा निश्चित हुआ था'
अवबोधन: तूफान-ए-नूह की वास्तविकता
यहूदियों मुसलमानों और ईसाईयों की मज़हबी पुस्तकों में तूफान-ए-नूह का बड़े शक्तिशाली शब्दों में उल्लेख किया गया है। परंतु विश्व के अन्य कई देशों के साहित्य में इसका उल्लेख नहीं है। ...वास्तविकता यह है कि हज़रत नूह का तूफान वैश्विक नहीं था। अपितु स्थानीय था। और यह केवल अरब रोम और यूनान में ही आया था जो यहूदियों, ईसाईयों और मुसलमानों के मतों की जन्मभूमियां हैं। ...पुराणों के अध्ययन से न केवल तूफान-ए-नूह की वास्तविकता पुष्ट हो जाती है अपितु, इसका शास्त्र पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है। साथ ही यह भी मालूम हो जाता है कि उस तूफान से किस किस देश में कितनी हानि हुई ओर इसका सही समय का भी पता लग जाता है। विष्णु पुराण के पांचवें अंश के ३७ वें अध्याय में लिखा है कि जब श्रीकृष्ण जी की आयु १२५वर्ष की हुई तो वह उस समय पृथ्वी और अंतरिक्ष में होने वाले बहुत से उत्पातों का अध्ययन करके इस निर्णय पर पहुँचे कि अब वह समय आ गया है जब द्वारिकापुरी जैसा सुन्दरनगर नष्ट हो जायेगा और यदुवंश का नाश होगा।
अवबोधन: इतिहास के परिप्रेक्ष्य में हिन्दू और बौद्ध
डॉ० शारदा सिन्हा द्वारा
इतिहास की पुस्तकों में मुख्यतः भगवान बुद्ध को एक धर्म-सुधारक, समाज सुधारक तथा वेद या ब्राह्मण धर्म के विरोधी के रूप में प्रस्तुत किया गया है जो इतिहास की दृष्टि से तथ्यात्मक नहीं कहा जा सकता। ...सनातन हिन्दू और बौद्ध में मूल भिन्नता यह रही कि सनातन परम्परा में वेद प्रमाण रहे लेकिन बौद्ध इसे नहीं स्वीकार करते और संस्कृत भाषा के स्थान पर बौद्ध ने पाली भाषा को महत्त्व दिया। इसे लेखकों ने हिन्दू और बौद्धों के बीच अन्तर्कलह के रूप में निरूपित किया। वास्तव में यह कोई मत-मतान्तरों की अस्वाभाविक स्थिति नहीं थी। ...बौद्ध धर्म को मौर्य सम्राट अशोक का संरक्षण मिला और वह तब लगभग राजधर्म बन गया। उस समय हिन्दुओं के सभी संप्रदायों की संख्या मिलाकर बौद्धों से तो अधिक ही थी फिर भी राजकीय संरक्षण बौद्धों को मिलने से वह राजधर्म बना। किन्तु इसके दो सौ वर्षों के बाद शुंगवंश की स्थापना हो गई। शुंगवंश निर्माता सेनापति पुष्यमित्र ने अपने राजा वृहद्रथ का बध कर दिया। कतिपय इतिहासकार इसे हिन्दू और बौद्धों के अन्तर्कलह का परिणाम मानते हैं।
अवबोधन: रणथम्भौर का हम्मीर चौहान
गोकुल चन्द गोयल द्वारा
सिंह सुवन, सत्पुरुष वचन, कदली फलै इक बार। त्रिया तेल, हम्मीर हठ, चढ़े न दूजी बार।
भट्ट वंशों के अनुसार चौहानों की वंश परम्परा में हम्मीर से सात पीढ़ी पहले ‘कदम्बशाखा' के राजा जयन्त ने ‘तपपत्रापि’ से वरदान प्राप्त कर वर्तमान राजस्थान प्रान्त के रणथम्भौर नामक अभेद्य दुर्ग का निर्माण करवाया। यह दुर्ग शक्ति एवं प्रतिष्ठा का प्रतीक था। ...हम्मीर रणथम्भौर का अन्तिम शक्तिशाली और महत्त्वाकांक्षी नरेश था। 'हम्मीर रासो' व 'हम्मीर महाकाव्य' के अनुसार गद्दी पर बैठते ही उसने दिग्विजय की नीति अपनाई और दूर-दूर तक के क्षेत्रों को विजित करना प्रारम्भ कर दिया। ...राव हम्मीर का १७ वां एवं अन्तिम युद्ध उसके विजय अभियान का अंग नहीं था अपितु अलाउद्दीन खिलजी के राज्य के एक भगौडे मुहम्मदशाह को शरण देकर रक्षा के कारण खिलजी के आक्रमण का प्रतिरोधी रक्षात्मक युद्ध था। हम्मीर ने मुहम्मदशाह को शरण देकर अभय दान दिया था तथा उसके कारण ही खिलजी से युद्ध का खतरा मोल लिया था।



