जुलाई 2008

इतिहास दिवाकर
आयतन 1, मुद्दा 2
जुलाई
01 जुल 2008
इतिहास भारतीय दर्शन लोक संस्कृति वैदिक संस्कृति संत परंपरा हिमाचल प्रदेश
जुलाई 2008
यह प्रकाशन 'इतिहास दिवाकर' का जुलाई 2008 का अंक है, जो एक त्रैमासिक अनुसंधान पत्रिका है। इसमें भारतीय इतिहास, दर्शन और संस्कृति से संबंधित गहन लेख शामिल हैं। मुख्य विषयों में 'काल' (समय) की दार्शनिक अवधारणा, महर्षि वेदव्यास का जीवन और महाभारत में उनका योगदान, समर्थ गुरु रामदास द्वारा रचित 'मनाचे श्लोक' की व्याख्या, और भारतीय 'ऋषि परम्परा' का विश्लेषण शामिल है। इसके अतिरिक्त, पत्रिका में हिमाचल प्रदेश की अनूठी देवयात्रा परंपराओं और गुरु गोविंद सिंह से जुड़े नादौन के ऐतिहासिक युद्ध पर भी प्रकाश डाला गया है।
Facebook पर साझा करें Twitter पर साझा करें LinkedIn पर साझा करें
लिंक कॉपी हो गया!

मुख्य विशेषताएं

काल (समय) की दार्शनिक विवेचना, जिसमें इसे एक अखंड और सर्वव्यापी तत्व के रूप में प्रस्तुत किया गया है जो सृष्टि के हर पहलू को नियंत्रित करता है।

महर्षि वेदव्यास को भारतीय ज्ञान गंगा का भगीरथ बताया गया है, जिन्होंने महाभारत की रचना कर ज्ञान को सामान्य जन तक पहुँचाया।

हिमाचल प्रदेश में देवयात्राओं की अनूठी परंपरा का वर्णन, जो क्षेत्र के सामाजिक और धार्मिक जीवन का एक अभिन्न अंग है।

भारतीय ऋषि परम्परा का विस्तृत विश्लेषण, जिसमें ऋषियों को केवल लेखक नहीं बल्कि 'मन्त्र द्रष्टा' अर्थात् मंत्रों के दृष्टा के रूप में चित्रित किया गया है।

योगदानकर्ताओं

मठ
मा. ठाकुर राम सिंह
मार्गदर्शक (Mentor)
डश
डॉ० शिवाजी सिंह
मार्गदर्शक (Mentor)
शच
श्री चेतराम
मार्गदर्शक (Mentor)
शइ
श्री इरविन खन्ना
मार्गदर्शक
डव
डॉ० विद्या चन्द ठाकुर
सम्पादक (Editor)
चग
चेतराम गर्ग
सह सम्पादक
डर
डॉ० रमेश शर्मा
सम्पादक मण्डल
डओ
डॉ० ओम प्रकाश शर्मा
सम्पादक मण्डल
पस
प्रो० सतीश चन्द्र
सम्पादक मण्डल
सच
सुश्री चारु मित्तल
सम्पादक मण्डल
ठर
ठाकुर रामसिंह
लेखक
सव
स्व.डॉ. वासुदेव अग्रवाल
लेखक (Author)
मस
म.ग. सहस्रबुद्धे
अनुवादक
डओ
डॉ. ओम प्रकाश शर्मा
लेखक
डस
डॉ. सूरत ठाकुर
लेखक (Author)
डच
डॉ.रमेश चन्द शर्मा
लेखक (Author)

प्रकाशन सारांश

इतिहास दिवाकर - जुलाई २००८

सम्पादकीय: अतीत कभी व्यतीत नहीं होता

अतीत के सम्बन्ध में एक बौद्धिक समुदाय ऐसी सोच रखता है कि अतीत के बारे में सोचना पिछड़ेपन को दर्शाता है। गड़े मुर्दे उखाड़ने का क्या औचित्य है? ऐसी सोच उन्हीं लोंगों की हो सकती है जो केवल सतही आधार पर बौद्धिकता का लबादा ओढ़े हुए हैं। कोई भी विवेकशील व्यक्ति इस तथ्य को अमान्य नहीं कर सकता है कि काल एक निरन्तर प्रवाह है। अतीत, वर्तमान और भविष्य काल–प्रवाह के परस्पर अविभाज्य अवयव हैं। अतीत हमारा इतिहास है। इतिहास में अनेक अच्छी उपलब्धियों का वृत्तान्त मिलता है और घटित गलतियों का भी वर्णन होता है। इतिहास की गलतियों से मानव समाज को शिक्षा मिलती है कि उन गलतियों को न दोहराया जाए। इतिहास की उपलब्धियां समाज को ऊर्जा, प्रेरणा और आत्मविश्वास प्रदान करती हैं। भारत के इतिहास का समुचित परिप्रेक्ष्य में चिन्तन करना है तो भारतीय कालगणना का ज्ञान होना अत्यावश्यक है। ठाकुर राम सिंह जी के लेख में इस विषय पर व्यापक प्रकाश डाला गया है। इस तिमाही के बीच आषाढ पूर्णिमा की तिथि 18 जुलाई को है। आषाढ़ पूर्णिमा महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास की जन्म तिथि के रूप में व्यास पूर्णिमा कहलाती है। महर्षि व्यास भारतीय ज्ञान परम्परा के शीर्षस्थ गुरु हैं। अतः यह पूर्णिमा गुरु पूर्णिमा के नाम से प्रसिद्ध है। महर्षि वेद व्यास समस्त ज्ञान निधि की शक्ति सम्पन्न जगत विभूति है। भारतीय इतिहास और संस्कृति के मूर्धन्य विद्वान् डॉ० वासुदेव शरण अग्रवाल जी का 'महर्षि व्यास' शीर्षक से लिखित लेख इस अलौकिक जगत विभूति का सारगर्भित परिचय है। राष्ट्र सन्त समर्थ गुरु रामदास जी के चतुर्थ जन्म शताब्दी के सम्मान एवं स्मरणाञ्जलि के रूप में ‘समर्थ दर्शन' नामक स्तम्भ शुरू किया गया है। इस बार हम इस स्तम्भ के अन्तर्गत समर्थ गुरु रामदास द्वारा रचित 'मनाचे श्लोक' रचना के अनुकरणीय श्लोक दे रहे हैं। अन्य महत्त्वपूर्ण रचनाएं विविधा स्तम्भ के अन्तर्गत सम्मिलित है। पत्रिका पाठकों के हाथों प्रवेशांक से भिन्न आकार में पंहुच रही है। भविष्य के लिए पत्रिका का यही आकार सुनिश्चित किया गया है। अतीत व्यतीत नहीं होता। अतीत की प्रासांगिकता राष्ट्र, समाज और मानव जीवन में निरन्तर बनी रहती है। इसी आशय से सुधी लेखकों के रचनात्मक सहयोग की सदैव आकांक्षा रहेगी।

काल ज्ञान

काल का अर्थ, उत्पत्ति एवं परिभाषा

भारतीय साहित्य में काल एक प्रत्यय है क्योंकि इसके बारे में विचार-विमर्श किया जा सकता है। व्याकरण के अनुसार यह शब्द गणनार्थक है अथवा प्रेरणार्थक है। यह कल् धातु के भाव अर्थ में “धञ्” प्रत्यय लगाने से बनता है। वैदिक विद्वान निरुक्तकार यास्क इसे गत्यार्थक धातु से बना मानते हैं। इस से स्पष्ट होता है कि काल का संबंध गति से है। काल स्वयं चलता है और सभी को चलने की प्रेरणा देता है। काल और जगत एक साथ चलते हैं और इतिहास का आरंभ भी यहीं से होता है। व्याकरण के महाभाष्यकार महर्षि पतंजलि के अनुसार काल वह है जो वस्तुओं का उपचय अथवा अपचय करता है अर्थात् जिस से वस्तुओं की वृद्धि अथवा संहार होता है। वह काल है। “वाक्यपदीय” में भर्तृहरि ने इसे “विभु” बतलाया है। विभु का अर्थ है सर्वव्यापक। “विश्व की काल यात्रा” नामक पुस्तक में लिखा है कि हिरण्यगर्भ के विस्फोटित विश्वद्रव्य से जब सृष्टि का चक्र शुरू हुआ तो सर्वप्रथम कालपुरुष (काल) की स्थापना हुई और लाखों वर्षों के बाद जब मनुष्य जीवन यापन करने की सभी साधनभूत आवश्यकताएँ पूर्ण हो गयीं तो मानवोत्पत्ति हुई और प्रकृति का विकास बंद हो गया।

महाकाल की उत्पत्ति

सृष्टि के पालक और संहारी काल जिस काल के द्वारा कलयित किये जाते हैं वही महाकाल है। यह काल परमेश्वर रूप होने के कारण अधेय, अनादि और अनन्त है।

काल की अवधारणा

काल सर्वव्यापक है। काल का अनुभव सभी प्राणियों को है। काल की सत्ता सब चराचर भूतों पर प्रभावी है। काल सर्वोपरि है। सभी काल की सत्ता के अधीन हैं। काल की कृपा का नाम आयु है और कोप मृत्यु है। काल अथ और इति से परे है। अग्नि, वायु और प्रकृति सभी दूसरी शक्तियां काल के अधीन हैं। काल की अद्भुत महिमा को देख कर इतिहास के आदि युग-देवयुग में महर्षि भृगु ने काल के संबंध में जो गीत गाया है वह निम्नलिखित है: “काल अपार है। काल की शक्ति अनन्त है। काल सब को देखता है। वह सहस्र आँखों वाला है। सभी काल के रथ पर बैठे हैं। ज्ञानी इस अश्व पर सवार होते हैं। मूर्खों पर यह स्वयं सवार होता है। ये लोक इस अद्भुत रथ के पहियों के साथ घूमते हैं। इस रथ की धुरि में अमृत है तभी तो वह कभी रुकने या थम जाने का नाम नहीं लेता है। काल लोकरूपी पहियों को आगे धकेलता है। काल पहला देव है। काल के सिर पर एक पूर्ण कुंभ रखा हुआ है। यह घड़ा अनेक रूप धरता है। इस सूर्यरूपी घट में ही केवल काल, मनमोहक यौवन और शुष्क जरा के अनेकरूप देखने में आते हैं। वह काल सब से ऊँचे लोक में है।

महर्षि व्यास

व्यास भारतीय ज्ञान गंगा के भगीरथ हैं। जिस प्रकार इस देव–निर्मित देश को किसी पुरायुग में भगीरथ ने अपने उग्र तप से गंगावतरण के द्वारा पवित्र किया था, उसी प्रकार महर्षि वेदव्यास ने भारतीय लोक–साहित्य के आदि युग में हिमालय के बदरिकाश्रम में अखंड समाधि लगाकर अध्यात्म, धर्मनीति और पुराण की त्रिपथगा गंगा का पहले अपनी आत्मा में साक्षात्कार किया और फिर साहित्यिक साधना के द्वारा देश के आर्य वाङ्मय को उससे पवित्र किया। ज्ञानरूपी हिमवान के उच्च शिखरों पर बहने वाले दिव्य जलों को मानों वेदव्यास भूतल पर ले आए। उन्होंने लोक साहित्य को वेग की प्रेरणा दी। उनके द्वारा पूर्वजों के ज्ञान और चरित्रों से गुम्फित सरस्वती लोक के कंठ में आ विराजी।

जीवन चरित्र

पुराविदों के प्रयत्न करने पर भी व्यास हमारे ऐतिहासिक तिथिक्रम के अन्तर्गत पूरी तरह नहीं बांधे जा सके। विक्रम से तीस शताब्दी पूर्व से लेकर पन्द्रह शताब्दी पूर्व तक के किसी युग में हमारे व्यास का उदय हुआ। पुराणों के अनुसार ब्रह्मा से लेकर कृष्ण द्वैपायन तक अट्ठाईस व्यासों की परम्परा मिलती हैं। ये मुख्यतः पुराणों के प्रवचन कर्ता रहे होंगे। पर जब तक सब पुराणों के सुसमीक्षित संस्करण तैयार न हो जाएँ तब तक इस अनुश्रुति का पूरा मूल्य नहीं आंका जा सकता। हाँ, जय नामक उत्तम इतिहास के रचने वाले अमितौजा महामुनि व्यास, जिनका नाम अट्ठाईस व्यासों के अन्त में आता है, अवश्य ही हमारे चिरपरिचित वे पुराण मुनि हैं जो कुरुपांडव युग में इस पृथ्वी पर बदरिकाश्रम और हस्तिनापुर के बीच आते जाते थे।

ग्रन्थ परिचय

व्यास को वेदान्तसूत्रों का कर्ता माना जाता है। वेदान्तसूत्रों का नाम भिक्षुसूत्र भी है। पाणिनि की अष्टाध्यायी से विदित होता है कि भिक्षुसूत्र के रचयिता पाराशर्य थे। पराशर के पुत्र होने के कारण व्यास का ही एक नाम पाराशर्य था। बदरी आश्रम में रहने के कारण व्यास का दूसरा नाम बादरायण मुनि भी था और इसी कारण कभी-कभी वेदान्त सूत्रों को बादरायणसूत्र भी कहते हैं। महाभारत सच्चे अर्थों में प्रचीन भारतवर्ष का विश्वकोष है। संसार के साहित्य में महाभारत एक दिग्गज ग्रंथ है। इसकी तुलना में यूनान के इलियड और ओडेसी अथवा आइसलैंड और स्कैंडिनेविया के प्राचीन एड्डा और सागा, जिनमें उत्तराखंड का अवशेष बचा गाथा शास्त्र सुरक्षित है, बहुत पीछे छूट जाते हैं।

समर्थ दर्शन: मनाचे श्लोक

गुरु समर्थ राम दास जी अध्यात्म साधना के दिव्य सिद्धि प्राप्त राष्ट्र भक्त सन्त थे। उन्होंने जन-जन में श्री राम जय राम जय जय राम का भक्ति भाव जगा कर जय जय रघुवीर समर्थ के भक्ति उद्घोष से निस्तेज समाज में राष्ट्र भक्त की शक्ति जागृत की। राष्ट्र भक्ति की इसी शक्ति से छत्रपति शिवाजी ने मुगल शासकों का सामना करके हिन्दू साम्राज्य स्थापित किया। समर्थ गुरु रामदास ने समाज प्रबोधन के लिए अनेक पुस्तकें लिखी जिनमें दास बोध और मनाचे श्लोक अर्थात् मनोबोध की बहुत अधिक मान्यता है।

मूल: गणाधीश जो ईश सर्वा गुणांचा। मुळारंभ आरंभ तो निर्गुणाचा। नमूं शारदा मूळ चत्वार वाचा। गमूं पंथ आनंत या राघवाचा।।१।।

अनुवाद: गणाधीश जो ईश है सद्गुणों का गुणी रूप प्रारंभ है निर्गुणी का।। स्मरे रूप चारों महाशारदा के। चलें पन्थ आकल्प श्रीराम जी के।।१।।

ऋषि परम्परा

ऋषि शब्द के उच्चारण से हमारे मन में ज्ञान, भक्ति, तप, ब्रह्मतेज, सत्य, परोपकार, क्षमा, अहिंसा आदि भाव जागृत हो जाते हैं। जब वैदिक मन्त्रों, आख्यानों तथा अन्य प्रसंगों पर चर्चा होती है तो वैदिक ऋषियों के नाम समक्ष आते हैं। प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि कौन है ये ऋषि तथा क्या है इन ऋषियों की परम्परा? ये कुछ ऐसे गम्भीर प्रश्न हैं जो इस ब्रह्माण्ड में मानव सृष्टि के बौद्धिक विकास के साथ सीधे-सीधे जुड़े हैं। भारतीय ऋषि परम्परा पर विचार करने से पूर्व हमें ऋषि शब्द के व्युत्पत्ति लभ्य अर्थ को जानना आवश्यक है। ऋषि शब्द ऋष् गतौ धातु से औणदिक इन् प्रत्यय के योग से निष्पन्न होता है। अतः इस शब्द का व्युत्पत्ति लभ्य अर्थ हुआ मन्त्र द्रष्टा। ऋषियों ने वेद मन्त्रों का दर्शन किया, इसीलिए 'ऋषयो मन्त्रद्रष्टारः' कहा जाता है।

विविधा

हिमाचल में देवयात्राओं की अनूठी परम्परा

हिमाचल प्रदेश में देवयात्राओं की एक अनूठी परम्परा प्रचलित है। सभी देवी-देवता कुछ अन्तराल पर अपने-अपने देवलुओं के साथ वाद्ययन्त्रों की करतल ध्वनि के साथ देवयात्रा पर निकल पड़ते हैं। कुछ देवता प्रतिवर्ष यात्रा पर जाते हैं जबकि कुछ तीन, पांच, सात, बारह या बीस वर्षों के बाद अपने-अपने लाव-लश्कर के साथ यात्रा पर निकलते हैं। कुल्लु में देवताओं के यात्रा पर निकलने को 'फेरा देणा' कहते हैं। यात्रा के समय देवता के साथ के श्रद्धालुगण विभिन्न गांवों के मंदिरों, तीर्थों आदि में रात बिताते हुए आगे को प्रस्थान करते हैं।

गुरू गोविन्द सिंह तथा नादौन का युद्ध

1690 ई० में पहाड़ी राजाओं तथा औरंगजेब की सेना के मध्य युद्ध का वर्णन मिलता है। गुरु गोविंद सिंह द्वारा रचित आत्मकथात्मक काव्य-रचना ‘विचित्र नाटक' के नवम अध्याय में इस का विस्तृत विवेचन उपलब्ध है। नादौन, जिला हमीरपुर के संबंध में इस युद्ध का विशेष महत्व है क्योंकि इस युद्ध में जहाँ एक और मुगल सेना की पराजय हुई थी वहीं दूसरी ओर गुरु गोविंदसिंह के बिताए नौ दिन व पहाड़ी राजाओं की सहायता इसका दूसरा प्रमुख बिन्दु है। युद्ध की पृष्ठभूमि में औरंगजेब दक्षिण भारत की विजय में तल्लीन था। उसी समय कोटकहलूर, नादौन, गुलेर जसवाँ सहित २२ राजाओं ने कर देना बंद कर दिया।

ध्येय पथ: शोध संस्थान की गतिविधियां

त्रिदिवसीय राष्ट्रीय परिसंवाद

ठाकुर जगदेव चन्द स्मृति शोध संस्थान, हमीरपुर, नेरी, जिला हमीरपुर (हि०प्र०) द्वारा शोध संस्थान परिसर में वैशाख शुक्ल ५,७,८ कलियुगाब्द ५११० तदनुसार १०, ११, १२ मई, २००८ को लोक परम्परा में सृष्टि रचना विचार विषय पर त्रिदिवसीय राष्ट्रीय परिसंवाद का आयोजन हुआ।