इतिहास दिवाकर - जनवरी-अप्रैल 2018
संपादकीय
प्रत्यक्षदर्शी लोकानां सर्वदर्शी भवेन्नरः
जो व्यक्ति लोकतत्व का प्रत्यक्ष दर्शन करता है, वही दर्शन की सर्वज्ञता प्राप्त कर सकता है। डॉ. विद्याचन्द ठाकुर जी का चिन्तन व मनन इस ध्येय वाक्य के अन्तर्गत ही दृष्टिगत होता है। ठाकुर जी जिस परिवेश में पले-बढ़े और बड़े हुए जीवनपर्यन्त उसी का अनुगमन किया। वे 'शब्दब्रह्म' के साधक थे। लोक परम्परा, लोकभाषा, लोककला, लोकसंस्कृति, लोकसाहित्य, इतिहास एवं शास्त्र के मर्मज्ञ विद्वान तो थे ही इससे भी आगे वे राष्ट्रीय चेतना के अग्रदूत व चिन्तक थे। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि वे लोक संस्कृति के संरक्षक, संवर्धक व विकास के महान पुरोधा थे।
डॉ. विद्याचन्द जी का जन्म १९ जनवरी, १९५३ ई. को गांव खोड़ा आगे जिला कुल्लू में स्वर्गीय श्री उच्छबु राम व श्रीमती लोतमी देवी के घर हुआ। बचपन से ही वे पढ़ाई में होशियार थे। प्रारम्भिक शिक्षा गांव के स्कूल से पूरी करने के बाद स्नातक तक की शिक्षा राजकीय महाविद्यालय कुल्लू से ग्रहण की। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से संस्कृत में स्नातकोत्तर के बाद यहीं से ही "कुल्लुवी के संस्कृत मूलक शब्द: एक भाषा वैज्ञानिक अध्ययन" शोध प्रबन्ध पर पी.एच.डी की उपाधि प्राप्त की। पी.एच.डी के दौरान ही इन्हें भाषा एवं संस्कृति विभाग हिमाचल प्रदेश के जिला चम्बा में जिला भाषा अधिकारी के रूप में नियुक्ति मिली। इसके बाद इन्होंने भाषा अधिकारी के रूप में मण्डी, सिरमौर, सोलन, बिलासपुर व जिला हमीरपुर में अपनी सेवाएं दीं।
इतिहास ऐसा होना चाहिए जो राष्ट्र मानस के लिए प्रेरणा स्रोत हो। वे भारतीय कालगणना को वैज्ञानिक व राष्ट्रीय स्वाभिमान का विषय मानते थे। उनकी धर्म परायणता इतनी व्यापक थी कि वे धर्म को भारत का मेरुदण्ड मानते थे। वे कहते थे धर्म हमारी पहचान है। धर्म व अध्यात्म हमारा सर्वस्व है।
डॉ. विद्याचन्द ठाकुर, ठाकुर जगदेव चन्द स्मृति शोध संस्थान नेरी के वैचारिक पक्ष के निदेशक एवं इतिहास दिवाकर पत्रिका के सम्पादक रहे। उनके मार्गदर्शन में अनेक राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय परिसंवादों का आयोजन हुआ। शोध संस्थान की निर्माण गाथा, शोध संस्थान का दिशा निर्देश, विवेकानन्द साहित्य के कथा प्रसंग, भारतीय संस्कृति, लोक परम्परा में सृष्टि आख्यान, लोक गाथा दिग्दर्शिका आदि महत्वपूर्ण पुस्तकों का प्रकाशन आपके मार्गदर्शन में हुआ।
इस विशेषांक में उन विद्वानों के संस्मरण दिए जा रहे हैं जिनका ठाकुर जी के साथ अति निकट का सम्बन्ध रहा है। उन्होंने अपने संस्मरणों के माध्यम से ठाकुर जी के जीवन को अपने-अपने ढंग से उभारा है।
संस्मरण: लोक जीवन साधक : विद्याचन्द ठाकुर
चेतराम गर्ग
डॉ. विद्याचन्द ठाकुर लोक जीवन साधक थे। लोक जीवन ही राष्ट्र की संस्कृति और विचार को व्यक्त करता है। भारतवर्ष पर नानाविध झंझावात को सहन करने का जो सामर्थ्य बना रहा वह लोकशक्ति का ही परिणाम था। ठाकुर जी कहा करते थे कि लोक व शास्त्र दोनों में से यदि किसी को हमें चुनना पड़े तो लोक को ही प्रथम वरीयता मिलती है। लोक ज्ञान का भण्डार है। यही उनका अन्तिम सांस तक साधना पथ रहा। कितने ही विद्वानों को उन्होंने अपने हाथों से गढ़ा और शब्द साधना में लगा दिया। उसी श्रृंखला में आते हैं – डॉ. सूरत ठाकुर, दीपक शर्मा, ठाकुर सीता राम, डॉ. राकेश शर्मा, डॉ. ओम प्रकाश शर्मा, श्री रमेश जसरोटिया, डॉ. विवेक शर्मा आदि विद्वान्। यह एक बड़ी श्रृंखला है। देश विदेश के साहित्यकारों, लेखकों, विचारकों के साथ विचार विनिमय का अवसर प्राप्त हुआ। फ्रांस, रूस, जर्मनी आदि अनेक विदेशी विद्वानों तथा भारत के तत्त्वचिन्तक प्रो. श्रीनिवास मिश्र का सानिध्य प्राप्त हुआ। बस एक बार ठाकुर जी से परिचय होने की बात रहती थी फिर तो विद्वान उनके चेहते बन जाते थे। कई-कई दिनों तक विदेशी विद्वान उनके घर पर रहते थे।
ठाकुर विद्याचन्द जी का जन्म कलियुगाब्द ४०५४, विक्रमी संवत् २०९० (१३ जनवरी, सन् १९५३) को पूज्य माता श्रीमती लोतमी देवी की कोख से पिता श्री उच्छबु राम के घर ‘खोड़ा आगे’ जिला कुल्लू हिमाचल प्रदेश में एक किसान घर में हुआ था। उच्छबु राम के कुल दो संतानें हुईं। पुत्री कली देवी और पुत्र ठाकुर विद्याचन्द। विद्या चन्द अभी कोई ८ वर्ष की आयु के रहे होंगे कि उसी समय पूज्य पिता का साया उनके सिर से उठ गया था। ठाकुर विद्याचन्द पर माता लोतमी देवी का विशेष स्नेह रहा। पढ़ाई में विद्या चन्द प्रारम्भ से ही कुशाग्र बुद्धि थे। अपनी कक्षा में प्रथम आना बताया जाता था। शिक्षा पूरी होने पर भाषा कला संस्कृति विभाग हिमाचल प्रदेश में जिला भाषा अधिकारी के पद पर नियुक्त हुए।



