जनवरी 2015

इतिहास दिवाकर
आयतन 7, मुद्दा 4
जनवरी
01 जन 2014
काल गणना ठाकुर रामसिंह भारतीय इतिहास राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संस्कृति हिंदू दर्शन
जनवरी 2015
इतिहास दिवाकर का यह जनवरी 2015 का विशेषांक, वीरव्रती इतिहास पुरुष ठाकुर रामसिंह के जन्म शताब्दी के अवसर पर प्रकाशित हुआ है। इसमें ठाकुर रामसिंह के जीवन और कार्यों पर प्रकाश डाला गया है, विशेषकर भारतीय इतिहास संकलन योजना में उनके योगदान पर। पत्रिका में भारतीय दृष्टिकोण से 'काल की अवधारणा', 'कालक्रम', और 'भारतीय इतिहास शास्त्र' जैसे विषयों पर गहन लेख शामिल हैं। यह अंक भारत के इतिहास के कथित विनाश और विकृतिकरण के मुद्दों को संबोधित करता है और उसके निराकरण के उपाय प्रस्तुत करता है।
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मुख्य विशेषताएं

यह विशेषांक ठाकुर रामसिंह के जन्म शताब्दी के अवसर पर उनके जीवन और भारतीय इतिहास संकलन में उनके योगदान को समर्पित है।

पत्रिका में भारतीय दृष्टिकोण से 'काल' की दार्शनिक अवधारणा और वैज्ञानिक काल गणना पर गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।

यह अंक भारतीय इतिहास के कथित विकृतिकरण को सुधारने और एक राष्ट्रवादी दृष्टिकोण से इतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता पर बल देता है।

मोहन भागवत और अन्य गणमान्य व्यक्तियों के संदेश शामिल हैं, जो ठाकुर रामसिंह के कार्यों और पत्रिका के उद्देश्य की सराहना करते हैं।

योगदानकर्ताओं

डव
डॉ. विद्या चन्द ठाकुर
सम्पादक (Editor)
चग
चेतराम गर्ग
सह सम्पादक
डओ
डॉ. ओम प्रकाश शर्मा
सम्पादक मण्डल
डर
डॉ. रमेश शर्मा
सम्पादक मण्डल
बप
बालमुकुन्द पाण्डेय
संदेश लेखक
अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना
डस
डॉ. सतीश चन्द्र मित्तल
संदेश लेखक
भज
भैया जोशी
संदेश लेखक
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
मभ
मोहन भागवत
संदेश लेखक
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

प्रकाशन सारांश

सम्पादकीय: ठाकुर रामसिंह जी की कर्मशक्ति का ज्योति पथ

ईश्वर के विधान में जिसने जन्म लिया, उसकी मृत्यु निश्चित है। इस विधान का प्रतिपादन में भगवान श्रीकृष्ण गीता में करते हैं कि जन्म-मरण के प्रवाह को कदापि रोका नहीं जा सकता जिसने जन्म लिया, उसकी मृत्यु होगी ही और जिनकी मृत्यु होती है, वे अवश्य पुनः जन्म लेते हैं। इस आवागमन के चक्र में विशेष बात यह है कि कुछ लोग अपने जीवन में कुछ ऐसे कीर्तिमान स्थापित करते हैं कि वे मर कर भी अमर हो जाते हैं। ऐसी ही अमर विभूति हैं राष्ट्रचिन्तक इतिहासवेत्ता स्वर्गीय ठाकुर रामसिंह जी जिनकी कर्मशक्ति का ज्योति पथ मानव समाज और राष्ट्र पथ को सदा आलोकित करता रहेगा।

वीरव्रती यशस्वी इतिहास पुरुष ठाकुर राम सिंह जी का जन्म आज से एक सौ वर्ष पहले विक्रमी संवत् १९७१ के फाल्गुन मास की ४ प्रविष्टे तदनुसार माघ शुक्ल तृतीया, कलियुगाब्द ४०१५ एवं ईस्वी सन् 16 फरवरी, 1915 को वर्तमान हिमाचल प्रदेश के जिला हमीरपुर के झंडवी गांव में माता श्रीमती नियातु की कोख से पिता श्री भाग सिंह के घर में हुआ था।

भारतवर्ष का गौरवशाली इतिहास सत्य तथ्यों के साथ प्रकाश में लाना ठाकुर रामसिंह जी का परम लक्ष्य रहा है। इसके लिए वे देश भर में निरन्तर प्रवास करते रहे। लक्ष्य पूर्ति के ध्येय से वे आजीवन अपनी ९५ वर्ष की आयु पर्यन्त पूर्ण आत्मविश्वास के साथ 'चरैवेति! चरैवेति!' के ऋषि संदेश को चरितार्थ करते हुए कभी यहां तो कभी वहां चलते रहे! कभी थके नहीं! लेकिन असंख्य विद्वानों को लक्ष्य पूर्ति की अदम्य प्रेरणा देकर अपने यशस्वी संकल्प का विस्तार करके कलियुगाब्द ५११२, विक्रमी संवत २०६७, भाद्रप्रद, सौर मास की प्रविष्टे २२, कृष्ण त्रयोदशी तदनुसार ६ सितम्बर, २०१० को इस लोक से चले गए तथा पंचतत्व में विलीन हो कर ब्रह्मलीन हो गए।

बाल्यकाल से ही श्रद्धेय ठाकुर राम सिंह जी की प्रतिभा कुशाग्रता सम्पन्न थी। सन् १९४१ में वे लाहौर में एफ. सी. महाविद्यालय में एम.ए. (इतिहास) के छात्र थे। उसी बीच वे सितम्बर, १९४१ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बने। सन् १९४२ में एम. ए. की अन्तिम परीक्षा में इन्होंने एफ.सी. कॉलेज में प्रथम स्थान अर्जित किया। महाविद्यालय के प्राचार्य ने इन्हें महाविद्यालय में इतिहास के प्रवक्ता के पद पर कार्य करने को कहा। आप ने इस पद को स्वीकार नहीं किया और राष्ट्रभक्ति के पोषणार्थ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बन गए।

काल की अवधारणा

भारतीय साहित्य में काल एक प्रत्यय है क्योंकि इसके बारे में विचार-विमर्श किया जा सकता है। व्याकरण के अनुसार यह शब्द गणनार्थक है अथवा प्रेरणार्थक है। यह कल धातु के भाव अर्थ में 'धञ्' प्रत्यय लगाने से बनता है।

वैदिक विद्वान निरुक्तकार यास्क इसे गत्यर्थक धातु से बना मानते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि काल का संबंध गति से है। काल स्वयं चलता है और सभी को चलने की प्रेरणा देता है। काल और जगत एक साथ चलते हैं और इतिहास का आरंभ भी यहीं से होता है।

व्याकरण के महाभाष्यकार महर्षि पतंजलि के अनुसार काल वह है जो वस्तुओं का उपचय अथवा अपचय करता है अर्थात् जिससे वस्तुओं की वृद्धि अथवा संहार होता है। वह काल है। 'वाक्यपदीय' में भर्तृहरि ने इसे 'विषु' बताया है। विषु का अर्थ है सर्वव्यापक। 'विश्व की काल यात्रा' नामक पुस्तक में लिखा है कि हिरण्यगर्भ के विस्फोटित विश्वरूप से जब सृष्टि का चक्र शुरू हुआ तो सर्वप्रथम कालरूप (काल) की स्थापना हुई और लाखों वर्षों के बाद जब जब मनुष्य जीवनयापन करने की सभी साधनभूत आवश्यकताएँ पूर्ण हो गईं तो मानवोत्पत्ति हुई और प्रकृति का विकास बंद हो गया।

सृष्टि के पालक और संहारी काल जिस काल के द्वारा कलयित किये जाते हैं वही महाकाल है। यह काल परमेश्वर रूप होने के कारण अनादि और अनन्त है। काल सर्वव्यापक है। काल का अनुभव सभी प्राणियों को है। काल की सत्ता सब चराचर भूतों पर प्रभावी है। काल सर्वोपरि है। सभी काल की सत्ता के अधीन हैं। काल की कृपा का नाम आयु है और कोप मृत्यु है। काल अथ और इति से परे है। अग्नि, वायु और प्रकृति सभी दूसरी शक्तियां काल के अधीन हैं।