इतिहास दिवाकर
सम्पादकीय: ॐ की महिमा
ॐ की महिमा अपरम्पार है। ॐ शब्द परब्रह्म एवं नाद ब्रह्म है। यह सदा-सर्वदा, सर्वव्यापी अविनाशी तत्त्व है। इन्हीं की कामना एवं विधान के अन्तर्गत सृष्टि का लय और सृजन का व्यवस्थाक्रम सुनिश्चित रूप में क्रियामाण रहता है। शास्त्रों में इस शब्द ब्रह्म की व्याख्या अनेक रूपों में की गई है जिससे इसकी असीम शब्दातीत महिमा का बोध होता है।
ॐ (ओम्) तीन ध्वनियों अ, उ, म् के मेल से बना है। ॐ का उच्चारण करते ही प्राण तत्त्व तत्काल सहजतापूर्वक गतिशील होता है। इसीलिए यह शब्द ब्रह्म 'प्रणव' कहलाता है। प्रणव ईश्वर का वाचक है — तस्य वाचकः प्रणवः। महर्षि पतञ्जलि के इस योगसूत्र का विवेचन करते हुए स्वामी विवेकानन्द ने ॐ को स्वाभाविक वाचक ध्वनि कहा है। स्वामी जी कहते हैं – ॐ (अ उ म्) वह ध्वनि है जो सारी ध्वनियों का भीत्तिस्वरूप है। इसका प्रथम अक्षर 'अ' सभी ध्वनियों का मूल है — यह सारी ध्वनियों की कुञ्जी के समान है। वह जिह्वा या तालु के किसी अंश को स्पर्श किए बिना ही उच्चारित होता है। 'म्' ध्वनि श्रृंखला की अन्तिम ध्वनि है, उसका उच्चारण करने में दोनों ओठों को बन्द करना पड़ता है और 'उ' जिह्वा के मूल से लेकर मुख के मध्यवर्ती ध्वनि के आधार की अन्तिम सीमा तक मानो ढुलकता आता है। इस प्रकार ॐ शब्द के द्वारा ध्वनि-उत्पादन की सम्पूर्ण क्रिया प्रकट हो जाती है। अतएव यह स्वाभाविक वाचक ध्वनि है, यही विभिन्न ध्वनियों की जननीस्वरूप है। जितने प्रकार के शब्द उच्चारित हो सकते हैं – हमारी ताकत में जितने प्रकार के शब्द के उच्चारण की सम्भावना है, ॐ उन सभी का सूचक है। भारतवर्ष में जितने सारे विभिन्न धर्मभाव है, यह ॐकार उन सबका केन्द्रस्वरूप है। वेद के सब विभिन्न धर्मभाव इस ॐकार का ही अवलम्बन किए हुए हैं।
विवेकानन्दामृतम्: प्रणव ही ईश्वर का प्रकाशक है
लेखक: स्वामी विवेकानन्द
यह सत्य है कि समस्त ज्ञान हमारे भीतर ही निहित है, पर उसे एक दूसरे ज्ञान के द्वारा जाग्रत करना पड़ता है। यद्यपि जानने की शक्ति हमारे अन्दर ही विद्यमान है, फिर भी हमें उसे जगाना पड़ता है और योगियों के मतानुसार, ज्ञान को इस प्रकार जगाना अर्थात् ज्ञान का उन्मेष एक दूसरे ज्ञान के सहारे ही हो सकता है। अचेतन जड़ पदार्थ ज्ञान का विकास कभी नहीं करा सकता--केवल ज्ञान की शक्ति से ही ज्ञान का विकास होता है। हमारे अन्दर जो ज्ञान है, उसको जगाने के लिए ज्ञानी पुरुषों का हमारे पास रहना सदैव आवश्यक है। यही कारण है कि इन गुरुओं की आवश्यकता सदा ही बनी रही है। जगत् कभी भी इन आचार्यों से रहित नहीं हुआ। उनकी सहायता बिना कोई भी ज्ञान नहीं आ सकता। ईश्वर सारे गुरुओं का भी गुरु है, क्योंकि ये सब गुरु कितने ही उन्नत क्यों न रहे हों, वे देवता या स्वर्गदूत ही क्यों न रहे हों, पर वे सबके सब बद्ध थे और काल से सीमित थे; किन्तु ईश्वर काल से आबद्ध नहीं है।
संवीक्षण: कालजयी समृद्धशाली भारतीय इतिहास
इतिहास जीवाश्म नहीं जीवंत होता है। इतिहास के साथ वर्तमान का गहरा सम्बन्ध है। किसी भी राष्ट्र एवं उसकी संस्कृति की समृद्धि उसके अतीत के इतिहास पर निर्भर करती है। सांस्कृतिक सौंदर्य की अपूर्व झलक इतिहास के सार्थक बोध के बगैर असंभव है। भारतवर्ष की ऐतिहासिक धरोहर यहां की सांस्कृतिक सम्पदा ही है। ऐसे इतिहास के बारे में पूर्वी एवं पश्चिमी दृष्टिकोण में पर्याप्त भिन्नता है। इसे क्रमशः एकांगी एवं समग्र कहा जा सकता है। कुछ भी हो, इतिहास को समझने एवं जानने के लिए इतिहास बोध का होना अनिवार्य रूप से आवश्यक है। प्राचीनकाल में इतिहास और पुराण दोनों शब्दों से इतिहास का बोध होता था। इसका अर्थ इस प्रकार है, इति-ह-आस यानि कि ठीक ऐसा हुआ था। इतिहास शब्द की व्याख्या वेदों में भी की गई है।
वेद और वेदान्त
लेखक: डॉ. हरिशचन्द्र वर्मा
वेदान्त के स्वरूप को समझने के लिए वेदों और वैदिक साहित्य की जानकारी आवश्यक है। इस तथ्य को विश्व के सभी इतिहासकार स्वीकार करते हैं कि वेद ही विश्व के प्राचीनतम ग्रन्थ है। पाश्चात्य विद्वानों में जैकोबी ने ऋग्वेद का रचना-काल अन्य विद्वानों की अपेक्षा प्राचीनतम माना है। वे मानते हैं कि ऋग्वेद की रचना लगभग ३००० वर्ष ई०पू० हुई। किन्तु अब अनेक साक्ष्यों के आधार पर वेदों की रचना और वैदिक संस्कृति के समारम्भ का काल दस हजार वर्ष ई०पू० तक जा पहुँचा है। ज्ञान की गहनता को ध्यान में रखते हुए वेदों को किसी अदृश्य सत्ता या परमात्मा द्वारा रचा हुआ माना गया है। मनुष्यों द्वारा न रचे जाने के कारण, इन्हें 'अपौरुषेय' कहा गया है।
पुरा-वृत्त: जालन्धर दैत्य की तपःस्थली - जालन्धर पीठ
लेखक: डॉ. वेद प्रकाश अग्नि
त्रिगर्त क्षेत्र का इतिहास निश्चय ही समग्र जीवन-दृष्टि का इतिहास रहा है, इसलिये यह प्रतीकों, आध्यात्मिक और आधिदैविक उपादानों से पूरी तरह ओत प्रोत है। उन पर से रहस्य का कुहासा हटाए या समझाए बिना उनका मर्म पा जाना सरल नहीं है। यह डगर यद्यपि पुरानी है, पर काल की ढेरी में दबी हुई पुरातत्त्व की परतों को स्तर-स्तर पर खोलने वाली जोखिम और परिश्रम से भरी डगर है। यहां इसके एकाध पहलुओं पर ही विचार किया जाएगा। त्रिगर्त क्षेत्र वैदिक साहित्य एवं आस्था का महत्त्वपूर्ण क्षेत्र रहा है। इसमें विद्यमान जालन्धर महापीठ का भारतीय संस्कृति के इतिहास में गौरवपूर्ण स्थान रहा है।
क्रान्तिवीर: मां भारती के वीर सपूत नाना साहब पेशवा
लेखक: विनोद कुमार लखनपाल
सन् १८५७ में भारतवर्ष के जनसाधारण ने अपने प्राणप्रिय धर्म एवं स्वदेश को पूर्णरूपेण स्वतन्त्र एवं भयमुक्त करने के महान उद्देश्य से विधर्मी अंगरेजों के विरुद्ध प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम लड़ा था। इस स्वतन्त्रता संग्राम को न केवल अंगरेज इतिहासकार वरन् उनके दृष्टिकोण से ही उसे परखने वाले भारतीय चाटुकारों ने भी इसे 'गदर' अथवा 'सिपाही विद्रोह' का नाम दिया है। यह सत्य है कि प्रथम स्वाधीनता संग्राम अन्तिम मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फर के नाम से लड़ा जा रहा था। परन्तु यथार्थ में इसके वास्तविक एवं अग्रगण्य नेताओं में नाना साहब पेशवा, महारानी लक्ष्मी बाई, तांत्यटोपे और अज़ीमुल्ला खां थे।
सृष्टि आख्यान: गुरु ग्रन्थ साहिब में वर्णित सृष्टि रचना
लेखक: प्रो. गणेशदत्त भारद्वाज
गुरु ग्रन्थ साहिब सिख गुरुओं, भक्तों और भट्टों की वाणियों का पवित्र ऐतिहासिक संग्रह है। सृष्टि रचना की चर्चा करते हुए गुरु नानक देव जी ने पदार्थों के सृष्टि पूर्व की स्थिति पर भी विशेष प्रकाश डाला है। उन्हीं के शब्दों में — जब सृष्टि का नामो निशान भी न था। .... अगणित युगों पर्यन्त महान् अन्धकार था। न तो पृथ्वी थी और न आकाश था। प्रभु का अपार हुक्म मात्र था। न दिन था, न रात थी। न तो चन्द्रता था, न सूर्य। केवल शून्य मात्र था। वेद पुराण कुछ भी न थे।
सृष्टि रचना - वैदिक एवं लौकिक संदर्भ
लेखक: डॉ. ओम दत्त सरोच
यह दृश्यमान जगत जितना सुन्दर एवं अद्भुत है, इसकी रचना प्रक्रिया का इतिहास उतना ही रहस्यमय है। मानव के ज्ञान-चक्षु जब से उन्मीलित हुये, तभी से वह इस अद्भुत लोक-रचना के रहस्यों को जानने व खोजने के लिये प्रयत्नशील रहा है। मानवीय-चिन्तन का प्रारम्भ एवं आधार यह सृष्टि एवं सृष्टि-रचयिता परमेश्वर रहा है। इसी संदर्भ में भारतीय चिन्तन की एक सुदीर्घ परम्परा है, जो कि वेद संहिताओं, ब्राह्मण ग्रन्थों, आरण्यकों, उपनिषदों, पुराणों, स्मृतियों से होती हुई लोकगाथाओं, लोकगीतों व लोक संस्कृति में व्याप्त है।



