इतिहास दिवाकर - जनवरी २०१३
सम्पादकीय
पवित्र अभिव्यक्ति में चमत्कारी शक्ति
भारतवर्ष के ज्ञान से परिपूर्ण तथा आध्यात्मिक शक्ति से परिपुष्ट स्वामी विवेकानन्द ने 11 सितम्बर, 1893 को विश्व धर्म महासभा, शिकागो में पहले दिन के अपने व्याख्यान में अमेरिका निवासी बहनों और भाइयों शब्दों के साथ सम्बोधन किया तो महासभा में विद्युत वेग सदृश एकाएक अभूतपूर्व वातावरण व्याप्त हो गया। ये शब्द कानों में पड़ते ही श्रोतागण हर्षोल्लास से उछल पड़े और कुछ समय तक सभा सदन हजारों करतल ध्वनियों से गुंजायमान रहा। यह प्रभाव सम्बोधन के शब्दों का तो था ही, लेकिन इससे कहीं अधिक प्रभाव स्वामी जी की वेदान्त सिद्ध वेद वाणी के अन्तर्मन की पवित्र अभिव्यक्ति का था। इसी पवित्र अभिव्यक्ति में चमत्कारी शक्ति की प्रचण्ड ज्वाला का अलौकिक आलोक विश्व धर्म महासभा में साक्षात् प्रकट हुआ था।
स्वामी विवेकानन्द भारतीय इतिहास की गौरवशाली परम्परा के एक युगान्तरकारी महान् विभूति हैं। इन्होंने भारत के अध्यात्म ज्ञान, इतिहास एवं परम्परा का दिव्य प्रकाश सारे संसार में फैलाया और मानवीय गुणों से समवेष्टित विश्व बन्धुत्व की भावना को सशक्त आधार प्रदान किया। भारत भूमि पर स्वामी जी का जन्म 150 वर्ष पूर्व माघ कृष्ण पक्ष सप्तमी के दिन कलियुगाब्द 4964, विक्रमी संवत् 1919 शक सम्वत् 1784, तदनुसार 12 जनवरी, 1863 को हुआ है। अतः इस वर्ष 12 जनवरी, 2013 से 12 जनवरी, 2014 तक स्वामी जी का सार्ध शताब्दी जयन्ती वर्ष व्यापक स्तर पर मनाने का निश्चय हुआ है। इसी उपलक्ष्य में इतिहास दिवाकर का प्रस्तुत स्वामी विवेकानन्द सार्धशताब्दी जयन्ती विशेषांक स्वामी जी के श्रीचरणों में समर्पित करते हुए, हम यथाशक्य अपने दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं। राष्ट्रमानस स्वामी जी के आदर्शों का अनुगामी बने, यही हमारी विनम्र आकांक्षा है।
स्वामी जी का वेदान्त वाणी में अभिव्यक्त यह आह्वान कर्मपथ पर लक्ष्य प्राप्ति का प्रशस्त मार्ग है – उतिष्ठत ! जाग्रत !! प्राप्यवरान्निबोधत!!! उठो, जागो और तब तक मत रुको, जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।
भारत का इतिहास एवं संस्कृति
स्वामी विवेकानन्द
भारत का प्राचीन इतिहास एक देवतुल्य जाति के अलौकिक उद्यम, अद्भुत चेष्टा, असीम उत्साह, अप्रतिहत शक्तिसमूह और सर्वोपरि अत्यन्त गम्भीर विचारों से परिपूर्ण है। 'इतिहास' शब्द का अर्थ यदि केवल राजे-रजवाड़ों की कथाएं, उनके काम-क्रोध-व्यसनादि के द्वारा समय-समय पर डाँवाडोल और उनकी सुचेष्टा या कुचेष्टा से रंग बदलते हुए समाज का चित्र माना जाए, तो कहना होगा कि इस प्रकार का इतिहास भारत का है ही नहीं। किन्तु भारत के समस्त धर्मग्रन्थ, काव्य-सिन्धु दर्शन शास्त्र और विविध वैज्ञानिक पुस्तकें अपने प्रत्येक पद और पंक्ति से, राजादि पुरुषविशेषों का वर्णन करने वाली पुस्तकों की अपेक्षा सहस्रों गुना अधिक स्पष्ट रूप से, भूख-प्यास-काम-क्रोधादि से परिचालित, सौन्दर्य-तृष्णा से आकृष्ट, महान अप्रतिहत बुद्धिसम्पन्न उस बृहत् जन-समाज के अभ्युदय के क्रमविकास का गुणगान कर रही हैं, जिस जन-समाज ने सभ्यता के प्रत्यूष के पहले ही नाना प्रकार के भावों का आश्रय ले, नानाविध पथों का अवलम्बन कर इस गौरव की अवस्था को प्राप्त किया था।
हमारा पवित्र भारतवर्ष धर्म एवं दर्शन की पुण्य-भूमि है। यहीं बड़े-बड़े महात्माओं तथा ऋषियों का जन्म हुआ है, यहीं संन्यास एवं त्याग की भूमि है तथा यहीं, केवल यहीं, आदि काल से लेकर आज तक मनुष्य के लिए जीवन के सर्वोच्च आदर्श का द्वार खुला हुआ है।
मैंने पाश्चात्य देश में भ्रमण किया है और मैं भिन्न-भिन्न देशों में बहुत सी जातियों से मिला-जुला हूँ और मुझे यह लगा है कि प्रत्येक राष्ट्र और प्रत्येक जाति का एक न एक विशिष्ट आदर्श अवश्य होता है – राष्ट्र के समस्त जीवन में संचार करने वाला एक महत्त्वपूर्ण आदर्श; कह सकते हैं कि वह आदर्श राष्ट्रीय जीवन की रीढ़ होती है। परन्तु भारत का मेरुदण्ड राजनीति नहीं है, सैन्य शक्ति भी नहीं है, व्यावसायिक आधिपत्य भी नहीं है और न यांत्रिक शक्ति ही है वरन् है धर्म – केवल धर्म ही हमारा सर्वस्व है और उसी को हमें रखना भी है। आध्यात्मिकता ही सदैव से भारत की निधि रही है।



