इतिहास दिवाकर - जनवरी २०१०
सम्पादकीय: स्वस्ति भवते सगवे सवत्साय
महर्षि पाणिनि के व्याकरणशास्त्र अष्टाध्यायी के व्याख्याता आचार्य कात्यायन के काशिकावृत्ति ग्रन्थ के अनुसार उस काल के लोक व्यवहार में आशीर्वाद रूप में यह वचन कहा जाता था— स्वस्ति भवते सगवे सवत्साय अर्थात् गाय और गोवत्स के साथ आप का जीवन मंगलमय हो। गोवत्स शब्द यहां बछड़ी, बछड़ा, बैल आदि सम्पूर्ण गोधन के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। पाणिनि कालीन भारतवर्ष पुस्तक में गाय, बैल आदि गोधन का विवेचन करते हुए भारतीय संस्कृति के मूर्धन्य विद्वान् डॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल द्वारा यह प्रसंग उद्धृत किया गया है। एतद् सम्बन्धी लेख इतिहास दिवाकर के प्रस्तुत अंक में सम्मिलित है। इस वर्ष आयोजित विश्व मंगल गो–ग्राम यात्रा के अनुपम प्रयास की दृष्टि से इस संदर्भ की विशिष्ट प्रासंगिकता है।
गाय की महिमा विश्वव्यापी है। इसीलिए गाय को विश्वमाता कहा गया है – गावो विश्वस्य मातरः। भारतीय शास्त्रों में गाय के अनन्त श्रेष्ठ गुणों का वर्णन हुआ है। भारतीय लोकमानस में भी गाय और गोवंश के प्रति गूढ़ आस्थाएं हैं। आज पाश्चात्य अन्धानुकरण और माया मोह के मकड़जाल में हमारी ये आस्थाएं क्षीण हुई हैं। गोहत्या पर प्रतिबन्ध तो दूर, इसके पक्ष में अलज्जित तर्क दिए जाते हैं। गाय और गोवंश के बहुविध महत्त्व के सम्बन्ध में समाज की ज्ञानहीनता से गोवंश अनाथ भटक रहा है। ऐसी स्थिति में प्रकृति और मानव के समक्ष अनेक चुनौनियां पैदा हुई हैं। इन चुनौतियों का सामना करने के लिए विश्व मंगल गो-ग्राम यात्रा एक सार्थक जन-जागरण अभियान है।
भारत विभाजन का ऐतिहासिक मूल कारण
लेखक: ठा. राम सिंह
ईस्वी सन् की ८वीं शताब्दी में इस्लाम ने आक्रामक के नाते हिन्दुस्थान में प्रवेश किया और सारे देश का इस्लामीकरण करने के लिये हिन्दू समाज के विरुद्ध जिहाद की घोषणा कर दी। उस समय हिन्दुस्थान में राजनीतिक दृष्टि से कोई सम्राट हिन्दू समाज को एकजुट रखने वाला नहीं था। देश उस समय छोटे-छोटे ५०० हिन्दू राज्यों में बंटा हुआ था। परिणामतः १००० वर्षीय हिन्द-मुस्लिम महायुद्ध शुरू हुआ। यह संघर्ष हिन्दुस्थान की पश्चिमी सीमा हिन्दुकुश-ताशकन्द और यारकन्द से आरम्भ हुआ। हर ग्राम, हर नगर में दिन-रात लड़ाई चल रही है। हिन्दू हर मोर्चे पर हार रहा है और मुसलमान हर मोर्चे पर जीत रहा है।
उपरोक्त स्थिति १६वीं शताब्दी तक चलती रही, परंतु १७वीं शताब्दी में हिन्दुस्थान के इतिहास में एक चमत्कारिक परिवर्तन हुआ - हिन्दू हर मोर्चे पर जीत रहा है और मुसलमान हर मोर्चे पर हार रहा है। इस का यह कारण था कि १४वीं शताब्दी से लेकर १६ वीं शताब्दी तक भक्ति आन्दोलन के द्वारा एक महान हिन्दू शक्ति का जागरण सारे देश में हुआ।
दक्षिण भारत में शिवाजी महाराज ने विदेशी मुगलों के विरुद्ध २५५ युद्ध लड़कर उनकी छाती के ऊपर पांव रखकर ३५० मील लम्बे और १५० मील चौड़े हिन्दू साम्राज्य का निर्माण किया। सन् १६७५ में शिवाजी का राज्याभिषेक हुआ। उसमें हिन्दू साम्राज्य के श्रीगणेश की घोषणा की गयी। शिवाजी की पूर्व की यह भी घोषणा थी कि हिन्दुस्थान की सीमा उत्तर में मानसरोवर से दक्षिण में कन्याकुमारी तक है। मैं इसे स्वतंत्र करके रहूंगा।
“त्रिसूत्री योजना” हिन्दू, हिन्दुस्तान और हिन्दू राष्ट्र
सन् १८५७ के संग्राम तक हिन्दू शब्द का सम्मान सारी दुनिया भर में था और हमारी पहचान हिन्दू थी। विदेशी मुस्लिम आक्रान्तों के विपक्ष में १०००-वर्षीय महायुद्ध हिन्दू के नाम से लड़कर उनके विदेशी मुस्लिम मुगल साम्राज्य को जड़ से उखाड़ फेंका। अंग्रेजों ने हमारी इस राष्ट्रीय पहचान को समाप्त करने के लिये सन् १८५७ के बाद एक त्रिसूत्री योजना बनाई। इसका पहला सूत्र था— De-Hindulisation of The Hindus अर्थात हिन्दुओं का अहिन्दूकरण करना। उनको साम्प्रदायिक बनाना। दूसरा सूत्र था De-nationalisation of The Hindus अर्थात हिन्दुओं का अराष्ट्रीयकरण करना। तीसरा और अंतिम सूत्र था De-socialisation of The Hindu अर्थात हिन्दू समाज को विघटित करना।
दक्षिण पूर्व एशिया में भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार
लेखक: डॉ० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
दक्षिण पूर्व एशिया का क्षेत्र भारत और चीन के मध्य में स्थित है। ब्रह्मदेश से लेकर थाईलैंड, मलेशिया, सिंगापुर, लाओस, वियतनाम, कंबोडिया व इनसे जुड़े अन्य देशों को इस क्षेत्र में सम्मिलित किया जाता है। भारत और चीन के बीच स्थित होने के कारण इन देशों में भारतीय और चीनी संस्कृति का प्रचार, प्रसार और प्रभाव सर्वत्र परिलक्षित होता है। इसलिए इतिहास में इस क्षेत्र को हिन्द चीन के नाम से भी जाना जाता है। इस पूरे क्षेत्र में वैसे भी बहुत बड़ी संख्या में भारतीय और चीनी बसे हुए हैं।
दक्षिण पूर्व एशिया में ही विश्व का सबसे बड़ा मंदिर अंगकोरवाट है जो लगभग पांच सौ एकड़ में फैला हुआ है। महात्मा बुद्ध के इतने बड़े-बड़े और भव्य मंदिर स्यामदेश, लाओस और वियतनाम में खड़े हैं कि उनका सौंदर्य अभिभूत करता है। इंडोनेशिया के कुछ द्वीपों में तो हिन्दू जीवन पद्धति परंपरागत तरीके से प्रचलित है और वहां के मंदिरों की शोभा देखते ही बनती है।



