जनवरी 2009

इतिहास दिवाकर
आयतन 1, मुद्दा 4
जनवरी
01 जन 2008
इतिहास दर्शन धर्म प्राचीन भारत बौद्ध धर्म भूगोल लोककथा
जनवरी 2009
यह प्रकाशन 'इतिहास दिवाकर' का जनवरी २००६ का अंक है, जो एक त्रैमासिक अनुसंधान पत्रिका है। इसमें विभिन्न ऐतिहासिक, भौगोलिक, और दार्शनिक विषयों पर लेख शामिल हैं। मुख्य विषयों में महात्मा बुद्ध के युग का काल-निर्धारण, पाणिनिकालीन भारत का भूगोल, विदुषी गार्गी की कथा, समर्थ गुरु रामदास के 'दास बोध' का विश्लेषण, और एक लोककथा शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, इसमें मुसलमानों के आर्य पूर्वजों और विभिन्न धर्मों में शिव तत्व की अवधारणा पर भी लेख हैं। संपादकीय में धर्म के महत्व पर प्रकाश डाला गया है।
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मुख्य विशेषताएं

यह पत्रिका महात्मा बुद्ध के युग के कालक्रम की गंभीर रूप से जांच करती है, पारंपरिक पश्चिमी-स्थापित तिथियों को चुनौती देती है और हिंदू कालगणना पर आधारित एक वैकल्पिक कालक्रम प्रस्तुत करती है।

पाणिनि की 'अष्टाध्यायी' में प्रलेखित प्राचीन भारत के विस्तृत भौगोलिक ज्ञान का अन्वेषण, जो उपमहाद्वीप की विशाल और परस्पर जुड़ी प्रकृति को प्रदर्शित करता है।

दार्शनिक ब्रह्मवादिनी गार्गी पर एक लेख के माध्यम से प्राचीन भारत में महिला विद्वानों के योगदान पर प्रकाश डाला गया है, जिसमें याज्ञवल्क्य के साथ उनके प्रसिद्ध संवाद का वर्णन है।

एक विचारोत्तेजक लेख मुसलमानों के आर्य वंश का तर्क देता है, जो फारस और अरब जैसे क्षेत्रों में प्राचीन आर्य जनजातियों से उनकी उत्पत्ति का पता लगाता है।

योगदानकर्ताओं

ठर
ठाकुर राम सिंह
मार्गदर्शक (Patron)
डश
डॉ० शिवाजी सिंह
मार्गदर्शक (Patron)
डव
डॉ० विद्या चन्द ठाकुर
सम्पादक (Editor)
चग
चेतराम गर्ग
सह सम्पादक (Co-Editor)
डर
डॉ० रमेश शर्मा
सम्पादक मण्डल
डओ
डॉ० ओम प्रकाश शर्मा
लेखक (Author)
पस
प्रो० सतीश चन्द्र
सम्पादक मण्डल
सच
सुश्री चारु मित्तल
सम्पादक मण्डल
डव
डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल
लेखक (Author)
मह
मास्टर हुकुम चन्द
लेखक (Author)
दश
दीपक शर्मा
लेखक (Author)
बल
बनवारी लाल ऊमरवैश्य
लेखक (Author)
रय
रामशरण युयुत्सु
लेखक (Author)

प्रकाशन सारांश

इतिहास दिवाकर

सम्पादकीय: धर्मो रक्षति रक्षितः

मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष चतुर्दशी, कलियुगाब्द 5110 तदनुसार ईस्वी सन् 26 नवम्बर, 2008 को मुम्बई में जो आतंकवाद की विनाश लीला का ताण्डव हुआ, उसकी मार्मिक अनुभूति में ऋषि–महर्षियों का यह संदेश मानव चेतना को झंकृत कर रहा है- धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः। अर्थात् धर्म का परित्याग नाश कर देता है और धर्म का पालन रक्षा करता है। मानव और जगत कल्याण के निमित्त विज्ञान की व्यापक प्रगति अत्यन्त महान उपलब्धि है, लेकिन धर्म के अभाव में यही उपलब्धियां महाविनाश का कारण बन जाती हैं। विश्व समाज के मन-मस्तिष्क पर आज भी हिरोशिमा और नागासाकी की महाविभीषिका धर्म संस्कारों से हीन विकास का उपहास उड़ा रही है। संसार में पाप का कर्म अधर्म है और पुण्य का आचरण धर्म है। मानव धर्म की यह सर्वोच्च व्याख्या बड़े सरल शब्दों में महर्षि वेदव्यास जी ने दी है कि दूसरों का उपकार करना पुण्य है और दूसरों को पीड़ा पहुंचाना पाप है– परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्। धर्म का यह संस्कार जब जन-जन में व्याप्त होगा तो विश्व परिवार 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का ध्येय तभी साकार होगा।

काल तत्त्व: महात्मा बुद्ध का युग

ठा० राम सिंह

इतिहास का लेखन कालक्रम के बिना कठिन ही नहीं अपितु असंभव है। भारत के इतिहास का विषय प्रवर्तन कोई दो चार हजार वर्षों के कालप्रवाह से नहीं, वह हिरण्यगर्भ की संरचना के कालबिंदु से होता है। भारतीय चिंतन दर्शन में काल और इतिहास दो नहीं, इनमें बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव है। यदि काल बिम्ब है तो इतिहास उस का प्रतिबिम्ब है। अतः काल के तत्व की अवधारणा के अनुसार भारत का १९७ करोड़ वर्षों का दीर्घतम इतिहास युगों की वैज्ञानिक हिंदू कालगणना के आधार पर १४ मन्वंतरों में विभक्त है। इनमें से ६ मन्वन्तर पार हो चुके हैं और सातवें वैवस्वत मन्वंतर का १२ करोड़ ५ लाख ३३ हज़ार ३ सौ दसवां वर्ष चल रहा है।

कालतत्त्व और पश्चिम का इतिहास बोध

पाश्चात्य जगत में काल के तत्त्व की अवधारणा पहले से ही अस्पष्ट रही है और अब भी स्पष्ट नहीं है। १४ वीं शताब्दी तक यूरोप को गिनती करनी नहीं आती थी। जब हिन्दू गणित ने यूरोप की यात्रा की तब हिन्दुओं ने यूरोप को गिनती करनी सिखाई। १७ वीं शताब्दी तक वर्तमान क्या है, उसका भूतकाल और भविष्य से क्या संबंध है, इसकी भी जानकारी यूरोप को नहीं थी। भारतीय इतिहास का तत्त्वदर्शन काल के तत्त्व पर आधारित होने के कारण यहां का १९७ करोड़ वर्षों का इतिहास काल तत्त्व की, महायुग, मन्वतंर, कल्प और महाकल्प की वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के अनुसार लिखा गया है।

भूगोल परिचय: पाणिनिकालीन भूगोल

डॉ० वासुदेव शरण अग्रवाल

अष्टाध्यायी की भौगोलिक सामग्री प्राचीन भारतीय इतिहास के लिये अत्यंत उपयोगी है। पाणिनि ने जिस शब्द-सामग्री का संचय किया उसमें देश, पर्वत, समुद्र, वन, नदी, प्रदेश, नगर, ग्राम-इनसे संबन्धित अनेक नाम और शब्द थे। इस विस्तृत सामग्री का संग्रह सूत्रकार की मौलिक सूझ थी। मध्य एशिया से लेकर कलिंग तक एवं सौवीर (आज काल का सिंध) से लेकर पूर्व में असम (आसाम) प्रांत के सूरमस (वर्तमान सूरमा नदी) प्रदेश तक विस्तृत भौगोलिक क्षेत्रों के स्थान-नाम अष्टाध्यायी में पाए जाते हैं। इससे सिद्ध होता है कि जीवन के व्यवहार में देश के चारों कोनों का आपस में घना सम्बन्ध था। सिंधु नद के समीप शलातुर ग्राम में जन्म लेनेवाले सूत्रकार को सूरमस, कलिंग, अश्मक, कच्छ, सौवीर–पूर्व से पश्चिम तक बिखरे हुए इन प्रदेशों के विषय में अच्छी जानकारी थी।

भौगोलिक सीमा का विस्तार

सूत्रों में पठित निश्चित स्थान-नामों की सहायता से पाणिनि-कालीन भौगोलिक दिग्विस्तार का परिचय मिलता है। उत्तर पश्चिम में कापिशी (४/२/९९) का उल्लेख है, यह नगरी प्राचीन काल में अति प्रसिद्ध राजधानी थी। काबुल से लगभग ५० मील उत्तर में इसके प्राचीन अवशेष मिले हैं। आजकल इसका नाम बेग्राम है। कापिशी से भी और उत्तर में कंबोज (४/१/१७५) जनपद था जहां इस समय मध्य एशिया का पामीर पठार है। पाणिनि ने देश के उदीच्य और प्राच्य इन दो भागों का उल्लेख किया है। इन दोनों के बीच में भरत जनपद था जहाँ इस समय कुरुक्षेत्र है।

जगत विभूति: ब्रह्मवादिनी गार्गी

डॉ० ओम प्रकाश शर्मा

ऋषियों ने भारतीय सभ्यता के विकास में कई व्यवस्थाएँ प्रदान की हैं। वस्तुतः आर्य ऋषियों की संतान हैं। सभ्यता के पथ पर आगे बढ़ते हुए ऋषियों ने मूलभूत सिद्धान्त स्थापित किए। इस प्रकार ऋषि परम्पराएँ विकसित होती गईं। वैदिक काल से लेकर पौराणिक युग तक विभिन्न ऋषियों के नाम हमारे समक्ष आते हैं। वाचक्नवी गार्गी उन ऋषिकाओं में से एक हैं। विदुषी गार्गी का नाम समक्ष आते ही हमें वैदिक युग का आदि काल याद आता है। गार्गी के पिता का नाम वचक्नु था। इसी कारण गार्गी का नाम वाचक्नवी भी उपलब्ध होता है। वचक्नु गर्ग गोत्र में उत्पन्न हुए थे। अतः गार्गी नाम उपनिषद् काल तक प्रख्यात हुआ। बृहदारण्यकोपनिषद् में उल्लेख आया है कि एक बार राजा जनक ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया। इस यज्ञ में कुरु, पांचाल आदि देशों के विद्वान उपस्थित थे। वहां पर याज्ञवल्क्य के साथ सभी विद्वानों का शास्त्रार्थ हुआ। याज्ञवल्क्य ने सभी विद्वानों को शास्त्रार्थ में परास्त कर डाला। इसी अवसर पर वहां ब्रह्मवादिनी गार्गी अथवा वाचक्नवी गार्गी भी विद्यमान थी।

विविधा: मुसलमानों के पुरखे थे आर्य

बनवारी लाल ऊमर वैश्य

इस देश को जम्बूद्वीप भरतखण्ड आर्यावर्त के नाम से जाना जाता है। आज भी हिन्दू पूजा-अनुष्ठान के समय संकल्प लेते हैं-जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्ते। रामायण और महाभारत में आर्येतर जातियों का उल्लेख है। पुराणों में आर्य धर्म से अलग कुछ ऐसी जातियों का उल्लेख है जो देश के पश्चिमी भूभागों में जा बसी थीं। शक बर्बर जाति थी जो बल्ख में रहती थी। यह शक जाति, पादर और पहलव जाति से युद्ध कर ईरान में जा बसी थी। पारद, पहलव और पार्शियन, फारस की आर्य जातियां रही हैं। ईरान आर्याण था। एरियाना आर्य प्रदेश था। वहां के लोग देश, काल, वातावरण के कारण इस्लाम के प्रभाव में आकर मुसलमान हो गए थे, किन्तु उनके पुरखे आर्य थे।