अक्टूबर 2012

इतिहास दिवाकर
आयतन 5, मुद्दा 3
अक्टूबर
01 अक्ट 2012
धर्म और दर्शन बोन धर्म ब्रिटिश इतिहासलेखन भारतीय इतिहास विज्ञान और आध्यात्मिकता संस्कृत संस्कृति
अक्टूबर 2012
यह प्रकाशन 'इतिहास दिवाकर' का अक्टूबर 2012 का अंक है। इसमें विभिन्न ऐतिहासिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक विषयों पर लेख सम्मिलित हैं। सम्पादकीय में प्राचीन भारतीय दर्शन और आधुनिक विज्ञान के बीच संबंध को उजागर किया गया है, विशेषकर 'ईश्वरीय कण' (हिग्स बोसोन) की खोज के संदर्भ में। मुख्य लेखों में स्वामी विवेकानन्द द्वारा वेदप्रणीत धार्मिक आदर्श, ब्रिटिश इतिहासकारों की भारतीय इतिहास-दृष्टि का विश्लेषण, सनातन बोन धर्म और जङ-जुङ भाषा का परिचय, तथा संस्कृत में ज्ञान-विज्ञान की परंपरा का वर्णन शामिल है।
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मुख्य विशेषताएं

सम्पादकीय में 'ईश्वरीय कण' (हिग्स बोसोन) की खोज को प्राचीन भारतीय वैदिक चिंतन 'कण-कण में ईश्वर' से जोड़ा गया है, जो विज्ञान और आध्यात्मिकता के संगम को दर्शाता है।

ब्रिटिश इतिहासकारों द्वारा भारतीय इतिहास के लेखन का विश्लेषण किया गया है, जिसमें उनकी साम्राज्यवादी दृष्टि और भारत के अतीत को विकृत करने के प्रयासों पर प्रकाश डाला गया है।

स्वामी विवेकानन्द के लेख में वेदों पर आधारित धार्मिक आदर्शों की गहन व्याख्या की गई है, जिसमें प्राचीन आर्यों की देवताओं की अवधारणा और एकेश्वरवाद की यात्रा का वर्णन है।

पत्रिका में तिब्बत के प्राचीन बोन धर्म और जङ-जुङ भाषा जैसे अल्पज्ञात विषयों पर लेख शामिल हैं, जो हिमालयी क्षेत्र की सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता को उजागर करते हैं।

योगदानकर्ताओं

डव
डॉ० विद्या चन्द ठाकुर
सम्पादक (Editor)
चग
चेतराम गर्ग
सह सम्पादक (Co-editor)
डओ
डॉ. ओमप्रकाश शर्मा
लेखक (Author)
छद
छेरिंग दोरजे
लेखक (Author)
डर
डॉ. रत्नेश कुमार त्रिपाठी
लेखक (Author)
सव
स्वामी विवेकानन्द
लेखक (Author)
डश
डॉ० शिवाजी सिंह
मार्गदर्शक (Patron)

प्रकाशन सारांश

सम्पादकीय: कण-कण में ईश्वर का वास

ईश्वर का वास कण-कण में है। जन-मन में व्याप्त इस सत्य सिद्धान्त का वेद में इस प्रकार जयघोष हुआ है - ॐ ईशा वास्यमिदं सर्वं यत् किञ्चित् जगत्यां जगत्। अर्थात् जो कुछ भी इस चलायमान जगत् में विद्यमान है, उन सब में ईश्वर का वास है। आधुनिक विज्ञान अपने क्रमिक सफलता के सोपान में भारतीय ऋषियों के अन्तर्दृष्टि से अन्वेषित सत्य के समीप होता जा रहा है। भारतीय शास्त्र प्रतिपादित ऋषि चिन्तन के अनुसार सत्त्व, रज और तम की त्रिगुणात्मक सृष्टि में तीनों गुणों के साम्यावस्था के समय सब कुछ परब्रह्म ईश्वर में विलीन होता है। जब ईश्वर इच्छा से यह साम्यावस्था भंग होती है तो सत्त्व, रज, तम, तीनों गुणों में आकर्षण-विकर्षण पैदा होता है और इससे ब्रह्माण्ड का निर्माण आरम्भ होता है। ब्रह्माण्ड निर्माण में महाविस्फोट (बिग बैंग) की अवधारणा बहुमान्यता प्राप्त है। आधुनिक विज्ञान के आविष्कार भी अधिकांशतः इसी अवधारणा को मान्यता प्रदान करते हैं। जिसके अनुसार परमाणु में तीन कणों इलेक्ट्रोन, प्रोटोन और न्यूट्रान की क्रियाशीलता से एक सघन पिण्ड के महाविस्फोट के साथ ब्रह्माण्ड का निर्माण आरम्भ हुआ है।

4 जुलाई, 2012 को जिनेवा में सेन्टर फॉर न्यूक्लियर रिसर्च (सर्न) के वैज्ञानिकों ने 14 वर्ष के अनथक प्रयास के महाप्रयोग में ईश्वरीय कण (गॉड पार्टिकल) को ज्ञात करने की सफलता प्राप्त की है। इस सफलता में वैज्ञानिक भारत के आध्यात्मिक ईश्वर चिन्तन के सन्निकट हुए हैं। अतः इन कणों को गॉड पार्टिकल अर्थात् ईश्वरीय कण कहना सर्वथा उपयुक्त है। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के आधार पर गॉड पार्टिकल को वैज्ञानिक भाषा में हिग्स बोसोन पार्टिकल नाम दिया गया है। प्रथम जनवरी, १८९४ को कोलकत्ता में जन्मे भारतीय वैज्ञानिक सत्येन्द्र नाथ बोस ने विज्ञान जगत् को बताया कि परमाणु के नाभिक (न्यूक्लियस) में इलेक्ट्रोन, प्रोटोन और न्यूट्रान के अतिरिक्त अन्य कण भी अपार संख्या में विद्यमान हैं। इनके इस विचार को वर्ष १९६५ में ब्रिटिश वैज्ञानिक पीटर हिग्स ने आगे बढ़ाया। इसी सिद्धान्त पर वैज्ञानिकों को वर्तमान सफलता अर्जित हुई है। इसलिए ईश्वरीय कण को हिग्स बोसोन कण का नाम प्राप्त हुआ है। इसमें बोसोन नाम सत्येन्द्र नाथ बोस के बोस नाम से गृहीत है जो भारतीय मेधा की सम्पन्न शक्ति का परिचायक है।

विवेकानन्दामृतम्: वेदप्रणीत धार्मिक आदर्श

स्वामी विवेकानन्द

हमारे लिए सर्वाधिक महत्त्व का विषय है, धार्मिक चिंतन आत्मा, परमात्मा तथा धर्म से सम्बन्ध रखनेवाला सब कुछ। हम संहिताओं को लेंगे। ये ऋचाओं के संग्रह हैं और मानो प्राचीनतम आर्य साहित्य हैं, वस्तुतः ये संसार के सबसे पुरातन साहित्य हैं। इनसे भी प्राचीनतर साहित्य के कुछ छोटे-मोटे अंश यहां-वहां भले ही रहे हों, पर उन्हें यथार्थतः ग्रन्थ या साहित्य नहीं कहा जा सकता। संकलित ग्रन्थ के रूप में ये ही संसार में प्राचीनतम हैं और इनमें आर्यों की आदिकालीन भावनाएँ, उनकी आकांक्षाएँ तथा उनकी रीति-नीति के सम्बन्ध में उठनेवाले प्रश्न आदि चित्रित हैं। प्रारम्भ में ही हमें एक बड़ी विचित्र कल्पना मिलती है। इन ऋचाओं में भिन्न-भिन्न देवताओं की स्तुतियाँ हैं। इन देवताओं को देव या द्युतिमान कहा गया है। ये देव अनेक हैं। एक हैं, इन्द्र, दूसरे वरुण, मित्र, पर्जन्य आदि-आदि। एक के बाद एक, पौराणिक और रूपक कथाओं के विभिन्न पात्र क्रमशः हमारे सामने आते हैं।

संवीक्षण: ब्रिटिश इतिहासकारों की भारतीय इतिहास दृष्टि

डॉ. रत्नेश कुमार त्रिपाठी

भारतीय इतिहास का लेखन ब्रिटिश इतिहासकारों द्वारा कैसे और किन परिस्थितियों में प्रारम्भ हुआ, इसे जाने बिना हम उनके इतिहास लेखन को सत्य का आधार मानते हैं तो ये कहीं न कहीं इतिहास के साथ और खासकर भारतीय इतिहास के साथ अन्याय करने जैसा ही है। संसार के इतिहास में जब-जब और जहां-जहां एक कौम दूसरी कौम के शासन में आयी, वहां-वहां स्वाभाविक रूप से शासक वर्ग के लेखकों ने शासन की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर ऐसा इतिहास लिखा जिससे कि आम जनता में देशभक्ति, आत्मविश्वास, स्वाभिमान और साहस का जागरण न होने पाये।

अंग्रेजों के लिखे भारतीय इतिहास, सामान्यतः शुरू से आखिर तक, इसी दोष से रंगे हुए हैं। शायद संसार में किसी भी देश का इतिहास इतना अधिक विकृत नहीं किया गया, जितना हिन्दुस्तान का। उस समय हिन्दुस्तान और इंगलिस्तान का संबंध ही इस तरह का था कि इस संबंध के एक बार शुरू हो जाने के बाद निष्पक्ष भारतीय इतिहास का लिखा जाना प्रायः नामुमकिन हो गया। एक ओर अंग्रेज लेखकों की साम्राज्यप्रिय दृष्टि और दूसरी ओर अंग्रेजी काल के ज्यादातर भारतीय लेखकों की विदेशी शिक्षा, मानसिक दासता और आजीविका की विकट परिस्थिति थी। नतीजा यह है कि ब्रिटिश भारतीय इतिहास की जो पुस्तकें आजकल हमें मिलती हैं, उनमें से अधिकांश में निरर्थक तुच्छ बातों पर जोर दिया जाता है और इतिहास के महत्त्वपूर्ण पहलुओं की अवहेलना की जाती है, उन्हें दबाया जाता है।

प्राच्यवादी इतिहासकार

भारतीय इतिहास के सन्दर्भ में यदि हम कुछ महत्त्वपूर्ण माने जाने वाले ब्रिटिश इतिहास लेखकों की चर्चा करें तो हमें ज्ञात होता है कि प्रारम्भ में इनकी दृष्टि कुछ हद तक सकारात्मक रही किन्तु बाद के कालों में ये पूरी तरह विध्वंसकारी विचारों में बदल गयी। उदाहरणतः आर्थिक जगत में १७वीं तथा १८वीं शताब्दियों में यूरोपीय विद्वानों ने इस संदर्भ में भारत की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। वास्कोडिगामा के आगमन से लेकर १८वीं शताब्दी तक अनेक विद्वानों ने भारत को ‘स्वर्ण भारत' कहा।