जनवरी 2012

इतिहास दिवाकर
आयतन 4, मुद्दा 4
जनवरी
01 जन 2011
जनजातीय अध्ययन धर्म और दर्शन पर्व-त्योहार पुरातत्व भारतीय इतिहास यात्रा वृत्तांत संस्कृति
जनवरी 2012
यह प्रकाशन 'इतिहास दिवाकर' का जनवरी २०१२ का अंक है, जो एक त्रैमासिक अनुसंधान पत्रिका है। इस अंक में गीता के कर्मयोग पर सम्पादकीय, प्राचीन आर्यों के ऐतिहासिक ज्ञान, स्पिति जनजातीय समुदाय की प्राचीन व्यवस्था, ममलेश्वर महादेव मंदिर के इतिहास, गुजरात के पाटन और सिद्धपुर, संत वल्लुवर की जीवनी, चम्बा में लोहड़ी उत्सव का वर्णन, तथा बीकानेर यात्रा वृत्तांत जैसे विविध विषयों पर लेख शामिल हैं। यह अंक भारत की समृद्ध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत पर प्रकाश डालता है।
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मुख्य विशेषताएं

संपादकीय में भगवद्गीता के कर्मयोग दर्शन की समकालीन प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला गया है, विशेष रूप से रूस में इसके अनुवाद पर प्रतिबंध लगाने के एक असफल प्रयास के संदर्भ में।

एक विस्तृत लेख यह तर्क देता है कि प्राचीन आर्यों को इतिहास का गहरा ज्ञान था, जो औपनिवेशिक धारणा के विपरीत है, और इसके प्रमाण के रूप में विभिन्न प्राचीन ग्रंथों का हवाला देता है।

स्पिति की जनजातीय संस्कृति का अन्वेषण, जिसमें बौद्ध धर्म के आगमन से पहले उनके प्राचीन 'बोन' धर्म और अद्वितीय सामाजिक संरचना पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

चम्बा में लोहड़ी उत्सव के अनूठे और पारंपरिक तरीकों का वर्णन, जो इस क्षेत्र की विशिष्ट सांस्कृतिक प्रथाओं को दर्शाता है।

योगदानकर्ताओं

डश
डॉ० शिवाजी सिंह
मार्गदर्शक (Mentor)
चेतराम
मार्गदर्शक (Mentor)
इख
इरविन खन्ना
मार्गदर्शक (Mentor)
डव
डॉ० विद्या चन्द ठाकुर
सम्पादक (Editor)
चग
चेतराम गर्ग
सह सम्पादक
डर
डॉ० रमेश शर्मा
सम्पादक मण्डल
डओ
डॉ० ओम प्रकाश शर्मा
सम्पादक मण्डल
पस
प्रो० सतीश चन्द्र
सम्पादक मण्डल
पर
प्रो० रामदेव
लेखक (Author)
छद
छेरिंग दोरजे
लेखक (Author)
डभ
डॉ० भाग चन्द चौहान
लेखक (Author)
कम
कौशिक मोदी
लेखक (Author)
रस
राजेन्द्र सिंह गौड़
लेखक (Author)
रज
रमेश जसरोटिया
लेखक (Author)
चर
चेत राम गर्ग
लेखक (Author)

प्रकाशन सारांश

इतिहास दिवाकर

त्रैमासिक अनुसंधान पत्रिका

वर्ष ४ अंक ४ पौष मास कलियुगाब्द ५११३ जनवरी, २०१२

अनुक्रमणिका

  • सम्पादकीय
  • इतिहास दृष्टि
    • प्राचीन आर्यों का इतिहास ज्ञान - प्रो० रामदेव
  • संवीक्षण
    • स्पिति जनजातीय समुदाय की प्राचीन धार्मिक तथा सामाजिक व्यवस्था - छेरिंग दोरजे
    • ममलेश्वर महादेव मन्दिर ममेल - डॉ० भाग चन्द चौहान
  • स्थान वृत्त
    • गुजरात में पाटन और सिद्धपुर - कौशिक मोदी
  • राष्ट्र विभूति
    • संत वल्लुवर - राजेन्द्र सिंह गौड़
  • पर्व त्योहार
    • ऐसे मनाई जाती है चम्बा में लोहड़ी - रमेश जसरोटिया
  • यात्रा वृत्त
    • बीकानेर में दो दिन - चेत राम गर्ग
  • गतिविधियां

सम्पादकीय: गीता का कर्मयोग

वैवस्वत मन्वन्तर के अट्ठाइसवें द्वापर युग के अन्तिम चरण में महाभारत का ऐतिहासिक युद्ध हुआ है जिसका वर्णन महर्षि वेदव्यास ने महाभारत ग्रन्थ में विस्तारपूर्वक किया है। इस ऐतिहासिक ग्रन्थ के भीष्म पर्व में पच्चीसवें अध्याय से व्यालीसवें अध्याय तक कुरुक्षेत्र की रणभूमि के बीच भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्मयोग का दिव्य संदेश दिया है। अट्ठारह अध्यायों में वर्णित उपदेश का यह कथानक श्रीमद्भगवद्गीता कहलाता है जो संक्षेप रूप में गीता के नाम से विख्यात है। गीता के उपदेश में अर्जुन के बहाने भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने कर्त्तव्य कर्म के प्रति अनिर्णय की स्थिति में खड़े मानव समुदाय का मार्गदर्शन किया है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मनुष्य कभी भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता। इसलिए आसक्ति से रहित होकर कर्त्तव्य भावना से निरन्तर कर्म करते रहना चाहिए। इसी निष्काम कर्मयोग से मनुष्य परम लक्ष्य को प्राप्त करता है।

राष्ट्र और समाज को नेतृत्व प्रदान करने वाले लोग यदि गीता का कल्याणमार्गी सदुपयोग अपने जीवन में उतारें तो समाज में व्याप्त किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार, दुराचार से मुक्ति सहज सम्भव है। इस सम्बन्ध में गीता का व्यावहारिक मार्गदर्शन है –
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ।।

अर्थात् जो व्यक्ति समाज में श्रेष्ठ एवं अग्रणी होते हैं, जो नेतृत्व प्रदान करते हैं, उनका जिस प्रकार का आचरण होता है, साधारण मनुष्य उन्हीं के अनुसार आचरण करने लगते हैं। माननीय न्यायालय ने 28 दिसम्बर, 2011 को उपरोक्त याचिका अस्वीकृत करके गीता के सर्वजन उपयोगी महत्त्व की ओर विश्व समाज का ध्यान आकृष्ट किया है।

वास्तव में श्रीमद्भगवद्गीता के अध्ययन और उस पर आचरण से ही वर्तमान निराशा भरा वातावरण, आशा के वायुमण्डल में परिवर्तित होगा और गीता के कर्मयोग द्वारा जगत के उज्जवल भविष्य का सृजन होगा।

इतिहास दृष्टि: प्राचीन आर्यों का इतिहास ज्ञान

प्रो० रामदेव

दुःख सागर से पार होने के जो कतिपय प्रधान साधन हैं उनमें से एक ऐतिहासिक ज्ञान भी है। अनेक शताब्दियों से इस भयंकर सागर के भंवर में पड़ी यह हमारी नौका डगमगा रही है। हमारे जो पूर्वज इस नौका को सुगति से चलाते थे वे तो परलोकवासी हो गए किन्तु आलसियों ने इस नौका संचालन की विधि उन से न सीखी।

यह एक स्वाभाविक बात है कि जब मनुष्य किसी महान् कार्य सम्पादन की चिन्ता में निमग्न होता है तो कार्य शैली के परिज्ञान के लिए चाहता है कि उसे कोई ऐसा व्यक्ति मिले जिस ने उस प्रकार के कार्य पूर्ण करने में सफलता प्राप्त की है अथवा जिस ने अकृतकार्यता की दशा में भी अभीष्ट सिद्धि के लिए पूर्ण पुरुषार्थ किया हो।

इतिहास

इतिहास उस विद्या का नाम है जिस के अवलोकन से हमें किसी जाति के पूर्वजों के वृत्तान्त अर्थात् उन की उन्नति और अवनति, उन की चेष्टा और शिथिलता, उनकी भ्रान्ति और दक्षता एवं उन के सुखों और दुःखों का पूरा-पूरा ज्ञान हो।

भारतवर्षीय इतिहास

आर्य जाति की उन्नति और अवनति, उसकी चेष्टा और शिथिलता, उसकी भ्रान्ति और दक्षता, अनेक समय उनके नेताओं की मूर्खता तथा स्वार्थपरता के कारण उसके दुःखों को अन्यान्य समयों में बुद्धिमता तथा आत्मत्याग के कारण उस के सुखों का वृत्तान्त है। यह निश्चित है कि हम भारतवासी जब भारतवर्ष का इतिहास पढ़ेंगे तो अपने पूर्वजों के महान् कार्यों का मनन कर उत्साहित होंगे, जातीय अभिमान उत्तेजित होगा तथा अपने कई पूर्वजों की भूलों को देख कर निश्चित पदों से उन्नति के मार्ग पर चलेंगे।

संवीक्षण: स्पिति जनजातीय समुदाय की प्राचीन धार्मिक तथा सामाजिक व्यवस्था

छेरिंग दोरजे

सातवीं शताब्दी पूर्व तक स्पिति क्षेत्र एक विस्तृत राज्य जङ जुङ का भाग रहा था। जङ जुङ राज्य पश्चिमी तिब्बत से बालतिस्तान (पाकिस्तान अधिकृत) तक फैला एक विस्तृत राज्य था। इसमें हिमाचल के कुछ क्षेत्र भी सम्मिलित थे। इस राज्य के तीन शासकीय प्रदेश थे। जिनको गो, फुग्स और वर कहा जाता था।

प्राचीन बोन धर्म का स्वरूप

बोन धर्म संसार के प्राचीनतम धर्मों में से एक है। जिसे हम ईरानी प्राचीन धर्म जोराष्ट्र (अग्निपूजक) और इज़रायली धर्म यहूद से तुलना कर सकते हैं। बोन धर्म का प्रवर्तक महात्मा शेन-रब-मिवो थे। कहा जाता है कि वह तगजिक नामी प्रदेश से जङ जुङ देश आए थे और यहीं उन्होंने अपने मत का प्रचार स्थानीय भाषा जङ जुङ में किया। तत्पश्चात् वह तिब्बत भी गए। तिब्बत में भी अपने मत का प्रचार तिब्बती भाषा में नहीं, अपितु जङ जुङ भाषा में किया। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि जङ जुङ भाषा को समझने वाले विस्तृत भूखण्ड में थे।