सम्पादकीय
स्मरणीय ऐतिहासिक पल
प्रयागराज का अर्धकुम्भ इतिहास के पन्नों पर अपनी अमिट छाप छोड़ गया है। व्यवस्था पक्ष, आस्था का सैलाब, अपनी परम्परा और विश्वासों के प्रति जागरूकता के इस महासंगम ने देश के प्रधानमन्त्री से लेकर आम आदमी तक को अपनी ओर आकर्षित किया जिसका साक्षी विश्व का मीडिया बना। उतर प्रदेश के मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ की प्रशंसा हर कुम्भ यात्री की जुबान पर थी। होती भी क्यों न? उन्होंने मुख्यमन्त्री होने के साथ, योगी होने का साक्षात प्रमाण हिन्दू आस्था के संगम की व्यवस्था को आकर्षक और सुगम बनाने में कोई कोर कसर न छोड़कर दिया।
इतिहास के पन्ने हमारे अतीत के स्मरण मात्र का लेखा-जोखा ही नहीं है। यह भविष्य में आने वाली चुनौतियों और अवसरों का भी ध्यान रखता है। इस वर्ष में कुछ ऐसी ऐतिहासिक घटनाएं हैं जिनका स्मरण करना प्रत्येक भारतीय के लिए आवश्यक है – जलियांवाला हत्या काण्ड के सौ वर्ष, महात्मा गान्धी की १५० वीं वर्षगांठ और पद्मश्री विष्णु श्रीधर वाकणकर का जन्मशताब्दी वर्ष महत्वपूर्ण है। साम्राज्यवादी शक्तियों के अत्याचारों का सामना और प्रतिकार की जीती जागती स्मृति है वैसाखी के दिन जनरल डायर द्वारा निहत्थी जनता पर गोलियों कि बौछारें। मानवता और सभ्यता पर कलंक का दाग हैं साम्राज्यवादी शक्तियों की काली करतूतें। डॉ कुलदीप चन्द अग्निहोत्री का लेख उस दृश्य को बयां कर रहा है। इस अंक में प्रसिद्ध पुरातत्त्वविद् व चित्रकार पदमश्री विष्णु श्रीधर वाकणकर का जीवन चरित्र सब के लिए प्रेरणास्पद है।
नवसम्वत् - शास्त्रीय दृष्टि एवं लोकपरम्परा
डॉ. ओम दत्त सरोच
भारतीय संस्कृति एवं परम्परा में विक्रमी संवत् व्यवहारिक रूप में प्रयुक्त होता है। यद्यपि शक संवत्, कलिसंवत्, सृष्टि संवत्, नानकशाही व कृष्ण संवत् आदि कई संवत् प्रचलन में है, परन्तु धार्मिक, सांस्कृतिक व पारम्परिक क्रिया-कलाप उत्तर भारत में विक्रमी संवत् के आधार पर ही सम्पन्न होते हैं। भारत सरकार भी सरकारी तौर पर शक संवत् को महत्त्व देती है। यह विशेष बात है कि भारत में जब भी संवत्सर का शुभारम्भ हुआ है उसका सम्बन्ध सदैव भारतीय सृष्टि संवत् के साथ ही रहा है।
नये विक्रमी संवत् का आरम्भ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है। भारतीय शास्त्रीय मान्यता के अनुसार इस दिन से ब्रह्मा ने सृष्टि रचना का कार्य आरम्भ किया था तथा उज्जैन के सम्राट महाराज विक्रमादित्य ने विदेशी आक्रान्ताओं से भारत की धरती को मुक्त करवा कर इसी दिन से नये संवत् विक्रमी संवत् का प्रचलन शुरू किया था। विक्रमी संवत् २०७६ का शुभारम्भ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (सूर्योदय व्यापिनी) तदनुसार ६ अप्रैल सन् २०१६ शनिवार से हो रहा है। साठ संवतों के चक्र के क्रमश: प्रवर्तन के अनुसार प्रत्येक संवत् का एक नाम होता है। संवत् २०७६ संवत् चक्र का छियालीसवां परिधावी नाम का संवत् है।
जलियांवाला बाग का नरसंहार और उसका परिणाम
प्रो. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
तेरह अप्रैल १६१६ को उस समय की ब्रिटिश सरकार ने पंजाब के अमृतसर में जो नरसंहार किया, उसकी पृष्ठभूमि को जानने बूझने के लिए उस समय की राजनैतिक पृष्ठभूमि को समझ बूझ लेना जरूरी है। भारतीयों ने संगठित रूप से अंग्रेजों को देश में से भगाने के लिए १८५७ में पहला प्रयास किया था, जिसे इतिहास में स्वतन्त्रता का प्रथम संग्राम कहा जाता है। यह संग्राम अंग्रेजों के यहां कब्जा जमा लेने के पूरे सौ साल के बाद किया गया था। १८५७ के प्रथम स्वतन्त्रता युद्ध में मिली पराजय के कारण भारतीयों में गुलामी को समाप्त करने के लिए नए सिरे से नव उत्साह का निर्माण हो रहा था।
दूसरी ओर ऐसे भारतीय भी थे जिन्होंने Her Majesty को ही मान्यता नहीं दी थी। उनका मानना था कि भारत में ब्रिटिश सरकार किसी अधिनियम या संविधान के अधिकार से स्थापित नहीं हुई है। इस सरकार की स्थापना विशुद्ध ताकत के बल पर हुई है, जिसे राजनीति विज्ञान में पशुबल भी कहा जाता है। अर्थात् यह सरकार बदूंक के आधार पर स्थापित हुई है। इसलिए इसे उखाड़ने के लिए भी बल का प्रयोग ही किया जाना चाहिए। ब्रिटिश संसद द्वारा पारित अधिनियमों के माध्यम से सत्ता में आंशिक भागीदारी के लिए संघर्ष करते रहना परोक्ष रूप में भारत में ब्रिटिश सरकार को मान्यता देना ही नहीं है बल्कि उनके जाल में जानबूझकर फंसना भी है। ये भारतीय आम जनता की नजर में क्रान्तिकारी कहलाते थे लेकिन ब्रिटिश सरकार की शब्दावली में वे अराजकतावादी कहे जाते थे।
मार्तण्ड-कश्मीर के सूर्य मन्दिर का पुरातात्त्विक अध्ययन
डॉ. सतीश गंजू, बनीता रानी
कश्मीर में कई प्राचीन भव्य मन्दिर हमें देखने को मिलते हैं। जिनमें से 'मार्तण्ड सूर्य मन्दिर' का महत्त्व पुरातात्त्विक दृष्टि से विशेष है। यह कश्मीर के अनन्तनाग जो पहलगांव के रास्ते पर स्थित है, से कुछ ही दूरी पर 'मट्टन' नामक स्थान पर स्थित है। सूर्य मन्दिर अपनी भव्यता के लिए विश्व प्रसिद्ध है जिसे कि 'कश्मीर का साईक्लोप्स' भी कहा जा सकता है। इसमें भारतवर्ष के पुराकालीन भारतीय वास्तु, मूर्ति एवं भास्कर कला का विशिष्ट स्थान है। कुछ विद्वानों ने मिस्र के स्थापत्यता और यूनानी स्थापत्य के लालित्य का मिश्रण भारत के प्रसिद्ध सूर्य मन्दिर में ढूंढने का प्रयास किया है।
स्थापत्य कला
मार्तण्ड मन्दिर का स्थापत्य कश्मीरी हिन्दू कला प्रदर्शित करता है। इस मन्दिर के निर्माण में नीले रंग के चूना पत्थर का इस्तेमाल किया गया है। प्राचीन हिन्दू मन्दिरों राजमहलों में चूना पत्थर तथा उड़द दाल के मिश्रण को उसकी मजबूती एवं चमक के लिए प्रयोग किया जाता था। पुरातत्त्व विभाग आज भी प्राचीन धरोहरों के संरक्षण के लिए इस मिश्रण का प्रयोग करते है।


