इतिहास दिवाकर - अप्रैल 2011
सम्पादकीय: नव संवत्सर और राष्ट्रीय स्वाभिमान
कलियुगाब्द 5112-13 तदनुसार ईस्वी सन् 2011-12 युग निर्माण योजना एवं गायत्री परिवार के संस्थापक, भारतीय संस्कृति के उन्नायक, वेदमूर्ति तपोनिष्ठ युग विभूति पं० श्रीराम शर्मा 'आचार्य' जी का जन्म शताब्दी वर्ष है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा वर्ष आरम्भ की तिथि होने के कारण वर्ष प्रतिपदा कहलाती है। यह त्यौहार बड़े हर्षोल्लास के साथ सम्पूर्ण भारतवर्ष में मनाने की परम्परा चली आ रही है। अब धीरे-धीरे पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में 31 दिसम्बर की रात को ईसाई नव वर्ष का शोर सुनाई देता है, जिससे हमारी प्राचीन परम्परा विलुप्त होती जा रही है। इससे राष्ट्रीय स्वाभिमान को आहत करने में राष्ट्र विरोधी शक्तियों को बल प्राप्त हो रहा है। अतः राष्ट्र रक्षक आधार तत्त्वों को परिपुष्ट करने के लिए राष्ट्रवादी शक्तियों को सजग हो कर सक्रिय होने की प्रबल आवश्यकता है। इस दृष्टान्त के प्रकाश में श्रेष्ठ सांस्कृतिक मूल्यों को राष्ट्रमानस के व्यवहार में लाने के लिए सघन जीवन्त प्रयास करना अनिवार्य है। इसी से समृद्धि सम्पन्न राष्ट्रीय अवधारणाएं बलवती होंगी और राष्ट्रीय स्वाभिमान सदा दीप्तिमान रहेगा।
नव संवत्सर का वैज्ञानिक दिग्दर्शन
डॉ. ओम कुमार शर्मा
मनुष्य विश्व में सर्वोच्च विचारशील प्राणी है। भारतीय वेदादि शास्त्रों में मनुष्य जन्म को देव जन्म से भी श्रेष्ठ स्वीकार किया गया है। मनुष्य के द्वारा किए गए आविष्कारों व रचनाओं के माध्यम से ही विश्व मानवता अपने-अपने जीवन पथ का मार्ग चयन करती है। इस प्रस्तुत नव संवत्सर (नववर्ष) के सम्बन्ध में भी जब हम उक्त बौद्धिक मूल्यांकन की दृष्टि से विचार करते हैं तो अनेक प्रकार के नवीन-नवीन तथ्य व रहस्य प्रकट होते हैं। 'नववर्ष' शब्द पर विचार करने पर नवीन अर्थात् नया वर्ष। भारत के सभी प्रान्तों में प्रायः विभिन्न उत्सवों में पर्याप्त भेद व अभाव दोनों ही देखने को मिलते हैं। यह तथ्य विश्वविख्यात व सर्वत्र प्रसिद्ध है कि भारत के ऋषि मुनियों ने विश्व मानवता को काल ज्ञान की अमूल्य सम्पत्ति प्रदान की है। इस लेख में हम भारतीय कालगणना तथा नव संवत्सर की वैज्ञानिक प्रामाणिकता के विषय में ही कतिपय प्रकाश डालेंगे। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही विश्व की आदिशक्ति की उपासना का भी शुभारम्भ होता है। इसका एक अन्य सर्वप्रबल प्रमाण यह भी है कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा में ही वसन्त ऋतु भी अपने चरम पर पहुंचना प्रारम्भ करती है। इससे प्रकृति के प्रत्येक कण-कण में एक नवीन जीवनशक्ति का संचार स्पष्ट होता है। इसके विपरीत १ जनवरी को तो शिशिर ऋतु की ही प्रबलता विद्यमान होती है। अतः प्रत्येक पक्ष से विचार करने पर भारतीय चैत्र शुक्ल प्रतिपदा जिसे वर्ष प्रतिपदा कहते हैं, ही वैज्ञानिक सांस्कृतिक, तर्कसंगत तथा वास्तविक सिद्ध होती है।
कुल्लू में नया संवत् की लोक परम्परा
मौलू राम ठाकुर
कुल्लू में मनाए जाने वाले पर्व त्यौहारों में नया सम्वत् सर्वाधिक नामों से जाना और पहचाना जाता है तथा इसकी लोक परम्परा भी बड़ी विशिष्ट है। इसे 'नुआं समत', 'शुड़कु साज़ा', 'लेहुरा साज़ा', 'चिलड़ा साज़ा' आदि कई नामों से जाना जाता है। इस त्यौहार को चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन सम्पूर्ण कुल्लू जनपद में मनाने की समृद्ध परम्परा विद्यमान है। शुड़कु से तात्पर्य है चुपके से और साज़ा का अर्थ होता है – संक्रान्ति। इसे शान्त वातावरण तथा शान्तिप्रिय स्वभाव और परिस्थितियों में मनाए जाने की प्रथा है। प्रातः का भोजन करने के बाद प्रत्येक परिवार कुल ब्राह्मण की बड़ी उत्सुकता और बेसब्री से प्रतीक्षा करता है। वह उस दिन घर-घर भ्रमण करता है और नव वर्ष का पंचांग (जंतरी) सुनाता है। नया संवत् लोगों के लिये कुल देवता और ग्राम देवता की पूजा का विशिष्ट दिन होता है। उनसे नूतन वर्ष की आनन्दपूर्वक समाप्ति की कामना की जाती है। गांव-गांव में मेले लगते हैं।
संस्कृति के संदर्भ में संस्कृत की अभियुक्तता
डॉ. रमाकांत शर्मा आंगिरस
यह एक ऐसी समस्या के निदान का अन्वेषण है जो आज के भारतीय समाज के परिवेश में एक ओर बढ़ती हुई भौतिक सम्पन्नता और दूसरी ओर परम्परा-प्राप्त जीवन-मर्यादाओं की जर्जरता से जुड़ी है। मानव-मात्र का आन्तरिक जीवन ही उसकी या समाज की संस्कृति बनता है। अतः संस्कृति के स्वास्थ्य के लिए जिन आन्तरिक उपायों की आवश्यकता पड़ती है वे सभी आध्यात्मिक उपाय हैं। इस समुद्र-मंथन में नई पुरानी परम्पराओं को मन्दराचल बनना होगा और संस्कृत को वासुकिनाग का मन्थन-रज्जु। संस्कृत को मंथन रज्जु इसलिए बनना होगा क्योंकि भारत भूखण्ड ही नहीं अपितु ब्रह्माण्ड तक की होने वाली घटनाओं एवं गतिविधियों की छानबीन मनुष्य ने कितनी की है, और कितनी करनी चाहिए थी, इस बात की साक्षी आज केवल संस्कृत ही प्रामाणिक रूप दे सकती है।
राष्ट्र एक सांस्कृतिक इकाई
पं. श्रीराम शर्मा 'आचार्य'
भारत में राष्ट्र सदैव एक सांस्कृतिक शब्द है, राजनीतिक नहीं। पश्चिमी देशों में राष्ट्र को राज्य 'नेशन या स्टेट' के रूपों में ही लिया जाता है। भारत में राष्ट्र उपास्य है, इष्ट है। सैकड़ों राज्यों, विभिन्न उपासना पद्धतियों, विभिन्न भाषाओं एवं विभिन्न वेशभूषाओं के होते हुए भी भारत 'एक राष्ट्र' रहा है। हमारे ऋषियों ने संसार की प्रकृति प्रदत्त विविधताओं को बहुत सहज भाव से स्वीकार किया किन्तु मनुष्य के अन्तःकरण में स्थिर परिष्कृत चेतना को लक्ष्य कर के सांस्कृतिक एकता के भाव भरे सूत्रों को विकसित एवं प्रतिष्ठित करने में सफलता पायी। यह भाव भरी सांस्कृतिक चेतना ही उस कालजयी राष्ट्र को बनाती है जो 'भारत' कहलाता है।
जन्मजात देशभक्त : डॉ हेडगेवार
चन्द्रशेखर परमानन्द मिंशीकर
राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ का नाम आज केवल भारत में ही नही, दुनिया भर में फैल चुका है। डॉ. हेडगेवार का जन्म कलियुगाब्द ४९९१ की चैत्र शुद्ध प्रतिपदा, १ अप्रैल १८८९ ई. के दिन नागपुर के एक गरीब वेदपाठी परिवार में हुआ था। यह जो क्रियाशील देशभक्ति का भाव डॉक्टर हेडगेवार के बचपन में प्रकट हुआ, वही उनके पूरे जीवन में अखंड रूप से बना रहा। स्वतंत्रता आन्दोलन में उन्हें जो अनुभव मिले थे, उनसे मन में अनेक प्रकार के प्रश्न चक्कर काटने लगे। उन्हें लगने लगा कि कोई अन्य मार्ग खोजा जाना चाहिए। उन्हें भावी मार्ग के दर्शन हुए और संघ स्थापना का विचार मन में पक्का हो गया।
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई
वासुदेव शर्मा
भारत भूमि का सौभाग्य था कि लक्ष्मीबाई जैसा देदीप्यमान रत्न इस धरती पर प्रकट हुआ। भारत के स्वतन्त्रता समर की चर्चा चलने पर झांसी की रानी का नाम सर्वोपरि रहेगा। पिता मोरोपन्त तथा माता भागीरथी के घर कलियुगाब्द ४९३७ को काशी में उनका जन्म हुआ। कलियुगाब्द ४९५० में १३ वर्ष की आयु में झांसी के राजा गंगाधर राव से मनु का विवाह हुआ। राजा की मृत्यु के पश्चात् अंग्रेजी हुकूमत ने दामोदर राव को उनका पुत्र मानने से इन्कार कर दिया। रानी ने घोषणा की कि मैं अपनी झांसी नहीं दूँगी। लक्ष्मीबाई अपने स्वराज्य संघर्ष में जुटी रहीं और 1857 के महासंग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
नामकरण की पौराणिक पद्धतियां
श्रीराम शंकर भट्टाचार्य
किसी भी तीर्थ, नदी, नगर, पर्वत तथा जनपद आदि का नामकरण कैसे होता है, यह एक अध्येतव्य विषय है। प्रस्तुत प्रकरण में हम पुराणीय साक्ष्य के अनुसार उन कारणों के निदर्शन प्रस्तुत करेंगे, जिसके लिए किसी भौगोलिक प्रमेय का नाम पड़ा है। इसके विभिन्न प्रकार हैं जैसे - विशिष्ट-वस्तु-हेतुक नाम, विशिष्ट-घटना-हेतुक नाम, विशिष्ट-गुण-हेतुक नाम, शासक या स्थापयिता के अनुसार नाम, उत्पत्तिस्थान के अनुसार नामकरण, महत्व-ख्यापक नाम, तथा व्यक्ति नामानुसार स्थान नाम। यह लेख इन सभी पद्धतियों का पौराणिक उदाहरणों सहित विश्लेषण करता है।



