अप्रैल 2008

इतिहास दिवाकर
आयतन 1, मुद्दा 1
अप्रैल
01 अप्र 2008
प्राचीन भारत भारतीय इतिहास राष्ट्रवाद शोध पत्रिका संस्कृति हिन्दुत्व
अप्रैल 2008
यह 'इतिहास दिवाकर' शोध पत्रिका का अप्रैल 2008 का प्रवेशांक है। यह भारतीय इतिहास चिंतन एवं लोक जीवन पर केंद्रित एक त्रैमासिक प्रकाशन है। इस अंक में भारतीय इतिहास की विकृतियों को दूर कर एक राष्ट्रवादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करने पर बल दिया गया है। इसमें समर्थ गुरु रामदास की 400वीं जयंती, सिकंदर के आक्रमण का सत्य, और भारत की गौरवशाली परंपरा जैसे विषयों पर लेख शामिल हैं। इसका उद्देश्य पाठकों में अपनी सभ्यता, संस्कृति और इतिहास के प्रति गौरव का भाव जगाना है।
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मुख्य विशेषताएं

इतिहास दिवाकर का प्रवेशांक, जिसका उद्देश्य भारतीय इतिहास की विकृतियों को दूर कर एक राष्ट्रवादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करना है।

सिकंदर के आक्रमण के पारंपरिक वृत्तांत को चुनौती देता है, यह तर्क देते हुए कि उसे भारत में पराजय का सामना करना पड़ा।

यह अंक समर्थ गुरु रामदास की 400वीं जयंती के अवसर पर प्रकाशित हुआ है, जो राष्ट्रीय चेतना और इतिहास को जोड़ता है।

विभिन्न विद्वानों द्वारा लेख शामिल हैं जो भारत की गौरवशाली परंपरा, संस्कृति और सभ्यता के महत्व पर जोर देते हैं।

योगदानकर्ताओं

डव
डॉ० विद्या चन्द ठाकुर
सम्पादक (Editor)
चग
चेतराम गर्ग
सह सम्पादक (Co-editor)
ठर
ठाकुर राम सिंह
मार्गदर्शक (Mentor)
डश
डॉ० शिवाजी सिंह
मार्गदर्शक (Mentor)
शच
श्री चेतराम
मार्गदर्शक (Mentor)
शइ
श्री इरविन खन्ना
मार्गदर्शक (Mentor)
डर
डॉ० रमेश शर्मा
सम्पादक समिति (Editorial Committee)
डओ
डॉ० ओम प्रकाश शर्मा
सम्पादक समिति (Editorial Committee)
डव
डॉ० वेद प्रकाश अग्नि
सम्पादक समिति (Editorial Committee)
पस
प्रो० सतीश मित्तल
सम्पादक समिति (Editorial Committee)
सच
सुश्री चारु मित्तल
सम्पादक समिति (Editorial Committee)
कस
कुप्प०सी० सुदर्शन
लेखक (Author)
मस
महन्त सूर्यनाथ
लेखक (Author)
सस
सुरेश सोनी
लेखक (Author)
कन
केदार नाथ साहनी
लेखक (Author)

प्रकाशन सारांश

इतिहास दिवाकर - अप्रैल २००८

इतिहास पुरुष

सृष्टि संवत् का आरम्भ श्वेत वाराह कल्प से होता है, अतः 'इतिहास पुरुष' वाराह मुख है। काल का विशाल स्वरूप इतिहास के उदर में समाहित होने के कारण इन्हें महोदर (विशाल उदर वाला) कहा गया है। पार्थिव इतिहास का रंग-रूप पृथ्वी के प्रतिनिधि श्रेष्ठ पदार्थ कुशा के रंग-रूप से आभासित होता है, अतः इन्हें कुशाभास कहा गया है। इतिहास काल के संख्यात्मक निर्देश से सूत्रित है, इसलिए इतिहास पुरुष एक हाथ में अक्षसूत्र धारण किए है। ज्ञानामृत का दान इतिहास का पावन उद्देश्य होने के कारण इनके दूसरे हाथ में अमृत घट विद्यमान है। इतिहास पुरुष का यह शरीर कमल आभूषणों से विभूषित है - कमल सौन्दर्य, विकास और आनन्द का प्रतीक है जो कि इतिहास का पावन स्वरूप है।

सम्पादकीय

जय जय रघुवीर समर्थ

अत्यन्त सुखद संयोग है कि इतिहास दिवाकर का प्रवेशांक ऐसे सुमंगल अवसर पर प्रकाशित हो रहा है जब इस वर्ष की रामनवमी के अवसर पर परम पूज्य राष्ट्र सन्त समर्थ गुरु रामदास जी की 400 वीं जयन्ती है। समर्थ गुरु रामदास जी भगवान् राम के परम उपासक थे जिन्होंने श्री राम जय राम जय जय राम के त्रयोदशाक्षरी महामंत्र से निश्चेतन समाज की सुप्त शक्ति को जगा कर अध्यात्म शक्ति और राष्ट्र भक्ति का चैतन्य प्रकाश सर्वत्र फैलाया। उन्होंने जन-जन में जय जय रघुवीर समर्थ का विश्वास जगाया और समाज को प्रेरित किया कि यदि हम अपने कार्य को पूरी निष्ठा से करते हैं तो सर्व समर्थ प्रभु श्रीरघुवीर की कृपा से सब कार्य सफलता पूर्वक सम्पन्न हो जाते हैं।

यह भी एक मंगलमय संयोग है कि इतिहास दिवाकर के प्रकाशन तथा नव संवत्सर कलियुगाब्द 5110 का शुभारम्भ एक साथ हो रहा है। भारतीय परम्परा में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को वर्ष प्रतिपदा कहते हैं। यह दिन नये वर्ष का पहला दिन होता हैं। भारतवर्ष में अनेक संवत् प्रचलित हैं जिनमें विक्रमी संवत् और शक संवत् सर्वाधिक व्यवहार प्रसिद्ध हैं। विक्रमी और शक आदि संवत् जो भारत भूमि पर पुष्पित पल्लवित हुए हैं, का व्यवहार निस्संदेह हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान को प्रतिबिम्बित करता है लेकिन, इस बात की जानकारी भी अवश्य रहनी चाहिए कि ये संवत् किसी व्यक्ति या किसी घटना विशेष से सम्बन्धित होने के कारण काल गणना के वैज्ञानिक आधार नहीं हो सकते। कालगणना का सीधा सम्बन्ध काल से है, इसलिए काल से जुड़ी कालगणना ही वैज्ञानिक कालगणना मानी जा सकती है।

हम अपने को पहचानें

लेखक: कुप्प०सी० सुदर्शन

ऋषि अरविन्द ने कहा है 'भूतकाल का गौरव, वर्तमान की पीड़ा और भविष्य के सुनहरे सपने जिस देश के नौजवानों में हों, वह देश प्रगति के पथ पर अग्रसर होता है।' जब तक हम यह नहीं जानते कि हम क्या थे? हम उससे बढ़कर हैं या गिरे हुए हैं, तब तक हम यह निश्चित नहीं कर सकते कि भविष्य में हमें क्या करना है? यह अस्पष्टता की स्थिति खत्म होनी चाहिए। हम क्या थे? यह विकृत किया गया है। वर्तमान में भी हमें सब वही पढ़ाया जाता है- हम सदा गुलाम रहे, हमारी कोई उपलब्धि नहीं रही है। हमें कुछ लेना है तो वह विदेशों से ही लेना है।

हिन्दुत्व से एक देश

मैं छुटपन से ही संघ की शाखा में जाने लग गया था। संघ के कार्यक्रमों में बौद्धिक वर्ग सुनकर यह समझ में आया कि अंग्रेज किस प्रकार के चालाक थे। वे अच्छी तरह से जानते थे कि भारत एक देश है। शुरू-शुरू में तो यहां की भिन्न-भिन्न बोलियां, खान-पान, उपासना पद्धति को देखकर वे हैरान हुए कि यह कैसे एक देश है? पर उन्होंने देखा कि हिन्दुत्व एक ऐसा तत्त्व है जो पूरे देश को जोड़ता है। आसाम का व्यक्ति भी अपने को हिन्दू बोलता है तो पंजाब का भी। कन्याकुमारी का आदमी भी अपने को हिन्दू बोलता है तो कश्मीर का भी। हिन्दुत्व सबको जोड़ता है। अंग्रेजों ने सोचा क्यों न इस सूत्र को ही तोड़ दिया जाए। इससे यह सब बिखर जाएगा। हिन्दू शब्द को हीनार्थक शब्द के रूप में प्रचारित करना शुरु कर दिया।