इतिहास दिवाकर
सम्पादकीय: चिन्तन भूमि
इतिहास साक्षी है कि महापुरुषों के कृत्य उनके जीवन काल में ही समाज के समक्ष आ जाए, यह विरल ही दिखाई देता है। ठाकुर रामसिंह जी भी इसके अपवाद नहीं है। ठाकुर रामसिंह ने हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिला के झण्डवीं गांव में जब १०४ वर्ष पूर्व जन्म लिया था उस समय शायद ही यह कल्पना की जा सकती थी कि यह रामसिंह नाम का बालक भारत के इतिहास को सही दिशा देगा जिसे विदेशी आक्रमणकारियों की तानाशाही और कुत्सित मानसिकता ने विकृत कर दिया था। ठाकुर रामसिंह ने भारत की इतिहास परम्परा को समझा और उसे स्थापित करने का सफल प्रयास किया। अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के वे प्रथम राष्ट्रीय अध्यक्ष सन् १९९२ में बने। इस दायित्व पर आकर उन्होंने इतिहास के सत्य साक्ष्य को सामने रखकर कहा – आर्य भारत के मूल निवासी हैं। भारत का इतिहास १९७ करोड़ वर्ष का इतिहास है। भारतीय कालगणना विश्व की प्राचीनतम एवं वैज्ञानिक कालगणना है। भारत का इतिहास पराजय का नहीं सतत् संघर्ष का इतिहास रहा है। विश्व सभ्यता की आदि जननी भारत है।
ठाकुर रामसिंह ने अपने विचारों से सुप्त पड़े भारतीय विचारों के विद्वानों को जागृत करने का काम किया। साथ ही उस साम्यवादी विचारधारा पर प्रहार किया जो अपने स्वार्थ के लिए अपने ही समाज और धर्म से धोखा कर रही थी। उन्होंने अपने जीवन के अन्तिम दशक में हमीरपुर जिला के नेरी गांव में इतिहास के स्थाई शोध कार्य के लिए इस इतिहास शोध संस्थान की स्थापना की। जो अपनी विकास यात्रा के लगभग १२ वर्ष पूरा कर चुका है। ठाकुर रामसिंह पर पूर्व में इतिहास दिवाकर पत्रिका के दो विशेषांक प्रकाशित हो चुके हैं। जिसका प्रथम विशेषांक “इतिहास पुरुष अमर विभूमि ठाकुर रामसिंह स्मृति श्रद्धाञ्जलि विशेषांक" तथा दूसरा "वीरव्रती यशस्वी इतिहास पुरुष ठाकुर रामसिंह जन्म शताब्दी विशेषांक" के रूप में है। यह तीसरा विशेषांक उनके जीवन कार्य को शोध परक दिशा में ले जाने वाला सिद्ध होगा। सुधी पाठकों से इस अंक में प्रकाशित सामग्री के विषय में प्रतिक्रिया की अपेक्षा सम्पादक मण्डल करता है।
इतिहास पुरुष ठाकुर रामसिंह की चिन्तन भूमि
डॉ. ओम प्रकाश शर्मा
एक महान विचारक अपनी चिन्तनधारा में चिन्तन के महान सूत्रों को सर्वप्रथम बीज रूप में स्थापित करता है। चिन्तन रूप में स्थापित बीज प्रस्फुटित होता है। प्रस्फुटित बीज से एक अंकुर निकलता है। उस अंकुर में धीरे-धीरे चिन्तन की शाखाएं-प्रशाखाएं पुष्पित-पल्लवित होती है और अन्त में वह बीज एक महान चिन्तन रूपी वृक्ष का स्वरूप धारण करता है। महान चिन्तक ठाकुर रामसिंह जी ने भी अपनी चिन्तनधारा में भारतबोध नामक एक शब्द रूपी बीज स्थापित किया। वह बीज आज महाकाल सिद्धान्त, सृष्टि एवं राष्ट्रप्रतिपदा, भारतीय इतिहास बोध, इतिहास लेखन के बिन्दु एवं संकल्प पाठ की ऐतिहासिक महत्ता आदि चिन्तन की विभिन्न शाखाओं-प्रशाखाओं में पुष्पित-पल्लवित होकर चहुंओर अपनी छटा बिखेर रहा है।
महाकाल सिद्धान्त
ठाकुर रामसिंह जी पाश्चात्य जगत् के उस आक्षेप से बेहद आहत थे, जिसमें पाश्चात्य चिन्तक यह सिद्ध करने में लगे रहे कि भारत का इतिहास कालगणना रहित है। उन्होंने कहा कि पाश्चात्य जगत् के इस चिन्तन को प्रमाणों के आधार पर निरस्त किया। उन्होंने वैदिक सिद्धान्तों के प्रबल प्रमाणों के आधार पर १९७ करोड़ वर्ष के भारतीय इतिहास के गौरवमयी प्रमाण विश्व के समक्ष रखे। पाश्चात्य जगत् के सिद्धान्तकारों के उस विचार पक्ष को समझा जहां से यह भ्रान्ति फैली कि भारत के चिन्तकों को कालक्रमिक इतिहास लिखना नहीं आता। ठाकुर रामसिंह जी ने अपने सिद्धान्त में यह स्पष्ट किया कि भारत का कालक्रमिक इतिहास चार-पांच हजार वर्ष का नहीं, वह तो १९७ करोड़ वर्ष के आदि बिन्दु से प्रारम्भ होता है।
हिमाचल प्रदेश से इतिहास के दो पुरोधा ठाकुर रामसिंह और विपिन चन्द्र सूद
डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
हिमाचल प्रदेश ने पिछली शताब्दी में भारत को दो इतिहासकार दिए, जिनका विशेष उल्लेख किया जा सकता है। पहले मा. ठाकुर रामसिंह और दूसरे विपिन चन्द्र सूद। ये दोनों ही हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जनपद के रहने वाले थे। ठाकुर रामसिंह का १६ फरवरी १९१५ को झंण्डवी गांव में (यह गांव आजकल हमीरपुर जिला में आता है) और विपिन चन्द्र सूद का जन्म उनके १३ साल बाद २७ मई, १९२८ को गरली परागपुर हुआ और उनका देहान्त अगस्त २०१४ को ८६ साल की आयु में हुआ।
लाहौर से शिक्षा प्राप्त करने तक दोनों के रास्ते लगभग एक जैसे थे। लाहौर में रहकर ज्ञान साधना कर रहे हिमाचल प्रदेश की पर्वतीय श्रृंखलाओं में बसे दो गांवों के युवक। यह अलग बात है झण्डवी के ठाकुर राम सिंह की यह ज्ञान साधना उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर खींच कर ले गई और गरली परागपुर के विपिन चन्द्र सूद को यही साधना उन्हें कार्ल मार्क्स के चरणों में ले गई।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में सक्रिय भागीदारी के चलते उन्होंने अपने लिए एक अलग ही रास्ता चुन लिया था। लगभग तेरह साल बाद इसी रास्ते पर चलते हुए हिमाचल का एक दूसरा युवक विपिन चन्द्र सूद भी लाहौर ही पहुंचा। लाहौर के फोरमैन क्रिश्चियन कालेज में उन्होंने अपनी पढ़ाई लिखाई पूरी की लेकिन लाहौर में रहते हुए वे साम्यवादी विचारधारा से जुड़ गए। लाहौर उन दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, कांग्रेस, साम्यवादी समूहों, आर्य समाज, मुस्लिम और ईसाई संस्थाओं की गतिविधियों का केन्द्र और सप्त सिन्धु या पश्चिमोतर भारत का सक्रियता का प्रतीक बन चुका था।



