इतिहास दिवाकर - जनवरी २०१६
सम्पादकीय: ठाकुर रामसिंह जी का शताब्दी स्मरण
वीरव्रती यशस्वी इतिहास पुरुष स्वर्गीय रामसिंह जी का जन्म कलियुगाब्द ५०१६ एवं विक्रमी संवत् १६७१ के फाल्गुन सौर मास की ४ प्रविष्टे तदनुसार १६ फरवरी, १६१५ को हुआ था। कलियुगाब्द ५११६, विक्रमी संवत् २०७२ के फाल्गुन मास प्रविष्टे ४ को ठाकुर जगदेव चन्द स्मृति शोध संस्थान, नेरी के परिसर में श्रद्धेय ठाकुर जी की जन्म शताब्दी कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। तत्पश्चात् वर्ष भर भिन्न-भिन्न स्थानों पर ये कार्यक्रम आयोजित हुए और आगामी वर्ष भी जन्म शताब्दी के कार्यक्रम प्रचलित रहेंगे।
जन्मशताब्दी के उपलक्ष्य में इतिहास दिवाकर के प्रत्येक अंक में ठाकुर जी की प्रेरक स्मृतियों पर आधारित लेख प्रकाशित किए जा रहे हैं। इस अंक में शताब्दी स्मरण के अन्तर्गत ठाकुर जी का सान्निध्य प्राप्त विद्वान लेखक श्री कृष्णानन्द सागर जी का लेख ठाकुर रामसिंह जी भारत विभाजन के परिपेक्ष्य में सम्मिलित है।
शताब्दी स्मरण: ठाकुर रामसिंह जी भारत-विभाजन के परिप्रेक्ष्य में
कृष्णानन्द सागर
१९४१ की बात है। लाहौर में पंजाब विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में एक एम.ए. (इतिहास) का छात्र अखबार पढ़ रहा था। अखबार में गांधी जी का एक वक्तव्य था। “मुसलमान स्वभाव से ही आक्रामक है और हिन्दू कायर। यह पढ़ उस छात्र को गुस्सा आ गया और वह गुस्से में ही बड़बड़ाया, “गांधी का दिमाग खराब हो गया है, हिन्दू को कायर कहता है।” पास में ही एक दूसरा छात्र भी अखबार पढ़ रहा था, वह बोला- आपने जो अभी बोला, मैं भी उससे सहमत हूं। दोनो में परिचय हुआ। बड़बड़ाने वाले छात्र थे ठाकुर रामसिंह और उनसे सहमति प्रकट करने वाले थे बलराज मधोक।
हिन्दू स्वभाव से ही कायर है, गांधी जी के इस वक्तव्य को पढ़ कर ठाकुर जी के मन को जो वेदना हुई थी, और उसके कारण उनके मुख से जो गुस्सा फूटा था, वह संघ शाखा में आकर शान्त तो हुआ ही, साथ ही उसे एक निश्चित दिशा भी मिली – भारत हिन्दू राष्ट्र है और उसे विदेशी शासन से मुक्त कराने का दायित्व भी हिन्दू समाज पर ही है, इसलिए हिन्दुओं को संगठित करना और उनमें क्षात्रवृति का निर्माण करना प्रथम कर्त्तव्य है। इस दिशा के मिल जाने के बाद वे संघ कार्य में रमते गए।
संवीक्षण: भारतीय संस्कृति-सभ्यता की आत्मा : सरस्वती नदी
रामशरण युयुत्सु
संस्कृति शब्द संस्कृत भाषा में 'सम' उपसर्गपूर्वक 'कृ' धातु से 'कृन' प्रत्यय लगाने पर निष्पन्न होता है। इसका अक्षर अर्थ है 'संस्कार- निखरना या निखारना।' अतः जो चीज हमारे जीवन के प्रत्येक पक्ष को निखारती है, वह संस्कृति है।
हरियाणवी संस्कृति भारतीय संस्कृति से भिन्न कोई अलग-थलग वस्तु नहीं है। लेकिन जब हम भारतीय संस्कृति के लोग-कल्याणकारी स्वरूप को देखते हैं, तो पाते हैं, कि यह तत्त्व यहां, हरियाणा क्षेत्र में, बहुत ज्यादा विकसित हुआ है। दूसरे शब्दों में हरियाणावासियों की लोक उपकार की सांस्कृतिक धरोहर बहुत पुरानी है।
भारतीय संस्कृति का परिचय ऋग्वेद के सूक्तों से होता है। उनमें वर्णित विचार ही, वे आधार-स्तम्भ हैं, जिन पर हिन्दू सभ्यता खड़ी है। ऋग्वेदीय सूक्त प्राचीन आर्यो के धर्म, सामाजिक संगठन, आर्थिक तथा सामाजिक रीतियों और उनके नैतिक आदर्शों की विज्ञप्ति के प्रधान स्रोत हैं। इस भारतीय संस्कृति के मुख्य मूलाधार दो हैं- भारतवर्ष की भूमि और वैदिक वाङ्मय।
कृषि दर्शन: वैदिक अर्थ व्यवस्था में कृषि
पद्मश्री डॉ. कपिलदेव द्विवेदी
वैदिक अर्थ-व्यवस्था का प्रमुख आधार कृषि था। कृषि से उत्पन्न अन्न आजीविका का मुख्य साधन था। अतएव वैदिककाल में कृषि की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दिया गया था। मानवमात्र का जीवन अन्न पर निर्भर है। अन्नों की प्राप्ति का प्रमुख साधन कृषि है, अतः कृषि समस्त मानवों के जीवन का आधार है। सृष्टि की उत्पत्ति के साथ ही अन्न की समस्या उत्पन्न हुई। इसके निवारण के लिए कृषि-विद्या का आविष्कार हुआ। ऋग्वेद और अथर्ववेद से ज्ञात होता है कि कवि (मेधावी, दूरदर्शी) और धीर (विद्वान) मनुष्य कृषि-कार्य को अपनाते थे। कृषि गौरव का कार्य था।
अथर्ववेद का कथन है कि मानव जीवन की प्रमुख समस्या अन्न है। कृषि और अन्न मनुष्यों पर जीवन निर्भर है। अतः इस समस्या का हल करने के लिए कृषि की उपज बढ़ाना, उसके सहायक तत्त्वों बीज आदि की उन्नत किस्म तैयार करना आवश्यक है। यजुर्वेद में राजा के चार प्रमुख कर्तव्य बताये गए हैं। उनमें भी कृषि को उन्नत करना प्रथम कर्तव्य बताया गया है। राजा के चार कर्तव्य ये हैं : १. कृषि को उन्नत करना, २. जल-कल्याण करना, ३. अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करना, ४. जनता को सुख-सुविधा प्रदान कर पुष्ट बनाना।


