अक्टूबर 2011

इतिहास दिवाकर
आयतन 4, मुद्दा 3
अक्टूबर
01 अक्ट 2011
नामकरण पुरातत्व भारतीय इतिहास मौखिक परम्परा यात्रा वृतांत संस्कृति
अक्टूबर 2011
इतिहास दिवाकर का अक्टूबर 2011 अंक एक त्रैमासिक अनुसंधान पत्रिका है जो विभिन्न ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विषयों पर केंद्रित है। इस अंक में 'भारत देश का नामकरण', 'हमारे देश की वाचिक परम्परा', और 'ब्रिटेन में हिन्दू संस्कृति का प्रभाव' जैसे महत्वपूर्ण लेख शामिल हैं। साथ ही, इसमें 'सोलासिंगी धार के सिद्ध स्थान' और 'भारत की प्रथम नगरपालिका वाले नगर' पर स्थान वृत्त, 'पालनपुर' पर यात्रा वृतांत और राष्ट्रीय गौरव पर एक संपादकीय भी प्रस्तुत किया गया है।
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मुख्य विशेषताएं

संपादकीय में स्वामी रामदेव और अन्ना हजारे के आंदोलनों से उत्पन्न राष्ट्रीय जागरण पर प्रकाश डाला गया है, जिसमें 'भारत माता की जय' के नारे के महत्व पर जोर दिया गया है।

एक विस्तृत लेख में पुराणों और वेदों के आधार पर 'भारतवर्ष' नाम की उत्पत्ति का विश्लेषण किया गया है, इसे राजा मनु और भरत जनजाति से जोड़ा गया है।

एक लेख में ब्रिटेन की भाषा, प्रशासन और स्थानों पर हिन्दू संस्कृति और संस्कृत के व्यापक प्रभाव का तर्क दिया गया है, जिसमें शब्दों की व्युत्पत्ति संबंधी समानताएं बताई गई हैं।

पत्रिका में भारत की समृद्ध 'वाचिक परम्परा' (मौखिक परंपरा) के महत्व पर जोर दिया गया है, जो सांस्कृतिक निरंतरता और ज्ञान के पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण को सुनिश्चित करती है।

योगदानकर्ताओं

डव
डॉ० विद्या चन्द ठाकुर
सम्पादक (Editor)
चग
चेतराम गर्ग
सह सम्पादक (Co-editor)
पन
पुरुषोत्तम नागेश ओक
लेखक (Author)
डव
डॉ० विद्या निवास मिश्र
लेखक (Author)
डव
डॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल
लेखक (Author)
इख
इरविन खन्ना
मार्गदर्शक (Patron)
चेतराम
मार्गदर्शक (Patron)
डश
डॉ० शिवाजी सिंह
मार्गदर्शक (Patron)

प्रकाशन सारांश

इतिहास दिवाकर - अक्टूबर 2011

सम्पादकीय: भारत माता की जय

महान् दार्शनिक एवं प्रखर राष्ट्र चिन्तक परम पूज्य माधवराव सदाशिवराव गुरु गोलवलकर जी ने अपने एक उद्बोधन में कहा था- किसी व्यक्ति या समाज को जब आत्मविस्मृति हो जाती है, तब वह अपनी विद्या, कला, शक्ति आदि सब कुछ खो बैठता है। समुद्र लांघने का जब अवसर आया, तब हनुमान जी एक ओर चुपचाप बैठे थे। वे अपना सामर्थ्य भूल गये थे। जब जामवन्त ने उन्हें जागृत किया, तब वे विशालकाय बने और उड़ान के लिए सिद्ध हुए। वैसी ही बात अर्जुन की भी हुई थी,"मैं कौन हूं और मेरा कर्तव्य क्या है?” इस बात को वह भूल गया था। भगवान कृष्ण ने उन्हें आत्मज्ञान कराया, तभी वह युद्ध कर सका और पराक्रम दिखा सका।

विगत दिनों स्वामी रामदेव और अण्णा हजारे जी ने भारत की राष्ट्र शक्ति के पराक्रम को जगाया है। काला धन और भ्रष्टाचार उन्मूलन एवं सशक्त जन लोकपाल बिल के पक्ष में इनके उच्च श्रेष्ठ अभियान को विफल बनाने में, भले ही शासनतंत्र ने घोर अलोकतान्त्रिक हथकण्डे अपनाए, लेकिन आत्मविस्मृति से उभरी समर्थ राष्ट्र शक्ति ने शासन को नतमस्तक होने पर विवश करवाया। अण्णा हजारे ने सात्त्विक राष्ट्रीय आकांक्षा से भारत माता की जय, वन्दे मातरम्, इनकलाब जिन्दाबाद के जयघोष के साथ जो आह्वान किया, उससे सारा देश एक हो कर उठ खड़ा हुआ। इससे सत्ताधीशों तक राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के काव्य का यह संदेश पहुंचा–

जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढ़ाती है,
दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

इसी का परिणाम है कि अण्णा हजारे के प्रस्तावित जन लोकपाल विधेयक की प्रमुख मांगों को संसद ने सर्वसम्मति से स्वीकार कर के संसदीय स्थायी समिति के पास भेजा। लोक शक्ति की इस ऐतिहासिक विजय में भारत माता की जय का जयघोष चरितार्थ हुआ है। शुद्ध विचार, शुद्ध आचार, निष्कलंक जीवन, त्याग और नीलकण्ठ शंकर भगवान् के विषपान की भांति सद्कार्य के लिए अपमान के घूंट पीना– इन पांच सिद्धान्तों को अपनाना, क्रांन्तिवीर राष्ट्र सन्त अण्णा हजारे ने लक्ष्य सिद्धि के लिए आवश्यक बतलाया। अण्णा द्वारा प्रबोधित, भारत की ऋषि परम्परा से पोषित ये आधारभूत शाश्वत सिद्धान्त राष्ट्र जीवन के व्यावहारिक धरातल पर व्याप्त हों तो भारत माता की जय का उद्घोष सकल विश्व में निरन्तर सत्यं शिवं सुन्दरम् की कल्याण भावना के साथ विस्तार पाएगा।

भारत देश का नामकरण

डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल

वायु पुराण के अनुसार हमारे देश का नाम भारतवर्ष है, और इसमें बसने वाली जनता का नाम भारती प्रजा है। भारतवर्ष का भौगोलिक विस्तार समुद्र के उत्तर और हिमवान् के दक्षिण में कहा गया है

उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमवद्दक्षिणं च यत्।
वर्षं यद्भारतं नाम यत्रेयं भारती प्रजा ।। (वायु. ४५-७५)

इसी पुराण के एक अन्य श्लोक में कुमारिका अंतरीप से लेकर हिमालय में गंगा के प्रभव-स्थान तक फैला हुआ भू-प्रदेश भारतवर्ष में सम्मिलित माना गया है – आयतो ह्याकुमारिक्यादागंगाप्रभवाञ्च वै।४५/८१ ।

पूर्व के महोदधि और पश्चिम के रत्नाकर' नामक दो समुद्रों का जहां संगम है उसके समीप ही कुमारी अंतरीप है, जहां तपश्चर्या में निरत कुमारी पार्वती गंगा के प्रभवस्थान हिमाचल के देवदारु वृक्षों की वेदिका में समाधिस्थ भगवान शंकर के ध्यान में अहर्निश लीन रहती हैं। देश के उत्तर-दक्षिण के बिन्दुओं में सतत् चारिणी विद्युत-शक्ति की एक अत्यंत रमणीय कल्पना शिव और पार्वती के इस रूपक के द्वारा ही की गई है। देश की भूमि केवल पार्थिव परमाणुओं की राशि तो है नहीं, उसमें एक चेतन प्राणधारा जो कुंडलिनी की तरह सजग है, ओतप्रोत है।

मध्यदेश-आर्यावर्त

मनु के धर्मशास्त्र में और पतंजलि के महाभाष्य में मध्यदेश और आर्यावर्त इन दो नामों का भी प्रयोग पाया जाता है। भारत नाम का प्रयोग वहां नहीं है। मध्यदेश और आर्यावर्त नामों की परंपरा लौकिक संस्कृत और काव्य-साहित्य में बराबर आगे चलती रही। पर इन दोनों नामों का प्रयोग समस्त देश के लिये न होकर उत्तरी भारत, विशेषतः गंगा-यमुना की अंतर्वेदी की विस्तृत सीमाओं के लिये ही प्रसिद्ध रहा। मनु में मध्यदेश के लिये बड़ी श्रद्धा का भाव प्रकट किया गया है। मध्यदेश मानव-चरित्र के लिये पृथिवी का आदर्श और उसका हृदय था। गुप्त-काल के सुवर्णयुग में भी मध्यदेश न केवल भारवर्ष में, बल्कि चतुर्दिगंत में भी प्रसिद्ध हो गया था। नेपाल और तिब्बत में अंतर्वेदी के निवासी गौरव के साथ 'मध्यदेशीय' या मधेसिया कहे जाने लगे।

सिंधु-हिन्दु

देश के नामकरण की एक दूसरी धारा ऋग्वेदीय 'सिन्धु' शब्द है। ऋग्वेद में सिंधु शब्द उस महान् नद की संज्ञा के लिये प्रयुक्त हुआ है जो उत्तर-पश्चिमी भारत के भूगोल की सब से बड़ी विशेषता है। सिन्धु के इस पार का पंचनदीय प्रदेश तो भारतवर्ष की सीमा के अंतर्गत है ही, सिंधु के उस पार का वह काँठा भी जहां का पानी ढलकर सिंध में आता है और जिसमें कुभा (काबुल नदी), सुवास्तु (स्वात पंजकोरा), गोमती (गोमल), कुमु (कुर्रम) आदि नदियाँ हैं सदा भारतीय भौगोलिक विस्तार का एक अंग माना जाता था। अफगानिस्तान (आश्वकायन, गंधार), बदख्शां और पामीर (कंबोज) का प्राचीन भूगोल एक प्रकार से बिल्कुल भारतीय संस्कृति की देन है और भारतवर्ष का जो सबसे पुराना प्राक्-पाणिनि-काल का साहित्य है, उसके साथ उस भूगोल का घनिष्ठ सम्बन्ध है।

हमारे देश की वाचिक परम्परा

डॉ. विद्या निवास मिश्र

वाचिक परम्परा की बात शुरू करूँ उसके पहले बतला दूँ, हर वाचिक सम्प्रेषण, वाचिक परम्परा नहीं है। असंख्य वाचिक सम्प्रेषणों से से छन कर और जातीय भाव में भिन्न कर जो वाक् बराबर सर्जना की कड़ाही में उबलती रहती है, वही वाचिक परम्परा है। मैं वाचिक परम्परा का आदमी माना जाता हूँ। कुछ लोग, गुरुगम्भीर लोग, वाचिक परम्परा के प्रति हेठी का भाव रखते हैं, वे समझते हैं, लिखने और छपने से ही बात गंभीर होती है। कहने से बात छोटी हो जाती है।

वाचिक सम्प्रेषण से यों तो दुनिया का काम चलता है पर जिस संस्कृति में वाचिक परम्परा का पलड़ा भारी रहता है, उसकी कुछ अलग विशेषताएँ अपने आप रच जाती हैं। एक तो यह कि उस संस्कृति में वचन का मोल कुछ अधिक होता है, प्राण जाहिं पर वचन न जाई। दूसरे यह कि भाषा का परिष्कार एक जीवन मूल्य बन जाता है। जो आदमी जितनी मधुर और जितनी असरदार बात करता है, उतना ही उसे सम्मान मिलता है।

तीसरे यह कि वाचिक परम्परा के कारण संस्कृति की निरन्तरता बनी रहती है, यह जो पीढ़ियों की दूरी की बात इतनी होने लगी है, उसका कारण वाचिक परम्परा के प्रति अनादर है। हमारे यहां वाचिक सम्प्रेषण एक पीढ़ी लांघ कर ही अधिक सक्रिय होता रहा है, नाना-नानी, दादा-दादी, नातियों-नातनियों, पौत्र-पौत्रियों को कहानी सुनाते रहे, लोरी सुनाते रहे और बच्चों के हर प्रश्न का उत्तर देते रहे, माता-पिता तो बस नाम मात्र की बातचीत करते थे। इसलिए अतीत और भविष्यत् के बीच अपने आप अन्तर महत्त्वहीन था, बाल सुलभ मानवीय उत्सुक्ता के साथ जुड़कर अधिक उम्र का अनुभव एक वृद्ध के जीवन में चाव पैदा करता था, दूसरी ओर बच्चे के भीतर आत्म विश्वास भरता था।