जुलाई 2016

इतिहास दिवाकर
आयतन 6, मुद्दा 2
जुलाई
01 जुल 2016
इतिहास पौराणिक इतिहास प्राचीन भारत भारतीय इतिहास राष्ट्रवाद हिन्दुत्व
जुलाई 2016
जुलाई २०१६ का 'इतिहास दिवाकर' अंक प्रो. बलराज मधोक को समर्पित है, जिसमें 'युग-युगीन त्रिगर्त' राष्ट्रीय परिसंवाद पर उनका उद्घाटन भाषण शामिल है। इसमें हिन्दू, हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व पर उनका एक विस्तृत लेख भी है। अन्य लेख पौराणिक इतिहास के वैज्ञानिक आधार और सिकंदर व चंद्रगुप्त मौर्य के समकालीन होने की धारणा को चुनौती देने जैसे विषयों पर केंद्रित हैं। पत्रिका का उद्देश्य भारतीय इतिहास का राष्ट्रवादी दृष्टिकोण से पुनर्लेखन करना है।
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मुख्य विशेषताएं

यह अंक राष्ट्रवादी विचारक और इतिहासकार प्रो. बलराज मधोक को श्रद्धांजलि देता है और भारतीय इतिहास में उनके योगदान पर प्रकाश डालता है।

पत्रिका में इस बात पर जोर दिया गया है कि 'हिन्दू' शब्द एक भौगोलिक और राष्ट्रीय पहचान है, और हिन्दुत्व भारतीय राष्ट्रवाद का पर्याय है।

पौराणिक इतिहास को केवल कथा न मानकर, उसे खगोल विज्ञान और भूगर्भ विज्ञान जैसे वैज्ञानिक सिद्धांतों के आधार पर समझने का प्रयास किया गया है।

एक लेख पारंपरिक ऐतिहासिक समय-सीमा को चुनौती देता है, जिसमें तर्क दिया गया है कि सिकंदर और चंद्रगुप्त मौर्य समकालीन नहीं थे।

योगदानकर्ताओं

डश
डॉ० शिवाजी सिंह चेतराम
मार्गदर्शक
इख
इरविन खन्ना
मार्गदर्शक
डव
डॉ० विद्या चन्द ठाकुर
सम्पादक (Editor)
चग
चेतराम गर्ग
सह सम्पादक
डर
डॉ० रमेश शर्मा
सम्पादन सहयोग
डओ
डॉ० ओम प्रकाश शर्मा
सम्पादन सहयोग
रठ
रवि ठाकुर
टंकण एवं सज्जा
पब
प्रो. बलराज मधोक
लेखक (Author)
ठर
ठा. रामसिंह
लेखक (Author)
वश
विश्वनाथ शेखड़ी
लेखक (Author)
डठ
डॉ. ठाकुर प्रसाद वर्मा
लेखक (Author)
कब
कुंज बिहारी जालान
लेखक (Author)

प्रकाशन सारांश

इतिहास दिवाकर - जुलाई २०१६

अनुक्रमणिका

  • सम्पादकीय
  • स्मृति आलोक
    • युग-युगीन त्रिगर्त : राष्ट्रीय परिसंवाद - प्रो. मधोक जी का उद्घाटन भाषण
    • हम सब एक पथ के पथिक - ठा. रामसिंह
    • सब बातों में महान - प्रो. बलराज मधोक
    • ठाकुर जी और मधोक जी में आत्मीयता - विश्वनाथ शेखड़ी
    • हिन्दू, हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व - प्रो. बलराज मधोक
  • संवीक्षण
    • पौराणिक इतिहास का वैज्ञानिक आधार - डॉ. ठाकुर प्रसाद वर्मा
    • सिकन्दर चन्द्रगुप्त मौर्य का समकालीन नहीं - कुंज बिहारी जालान

सम्पादकीय: राष्ट्रवाचक है हिन्दू शब्द

अपने जीवन को राष्ट्र सेवा में समर्पित करने वाले भारत के सपूतों में प्रो. बलराज मधोक का एक प्रतिष्ठित स्थान है। वैशाख कृष्ण १०, कलियुगाब्द ५११८, ईस्वी सन् २ मई, २०१६ को प्रो. मधोक जी ६६ वर्ष की आयु में अपना नश्वर शरीर छोड़ कर स्वर्ग सिधार गए। नेरी शोध संस्थान के संस्थापक श्रद्धेय ठाकुर रामसिंह और प्रो. मधोक में परस्पर बहुत आत्मीय सम्बन्ध थे। हिमाचल प्रदेश के विख्यात ऐतिहासिक स्थल, नगरकोट कांगड़ा में आयोजित युग युगीन त्रिगर्त राष्ट्रीय परिसंवाद में ठाकुर जी के अनुरोध पर उद्घाटन भाषण उन्हीं का था। वह इतिहासोपयोगी भाषण इतिहास दिवाकर के इसी अंक में प्रकाशित है।

प्रो. मधोक राष्ट्रनिष्ठ उच्च कोटि के इतिहासकार थे। उनका एक ऐतिहासिक लेख हिन्दू, हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व इस अंक में दिया गया है। उनका मत स्पष्ट है कि हिन्दू शब्द का उद्गम भौगोलिक है और इसका अर्थ राष्ट्रवाचक है। अनेक शताब्दियों तक इसी नाम से हमारे पूर्वजों ने विदेशियों से लोहा लिया और हिन्दुस्तान को हिन्दू देश के रूप में प्रख्यात किया। इसी कारण हिन्दुत्व, हिन्दुस्तान के राष्ट्रवाद का परिचायक बन गया। आवश्यकता है हिन्दुत्व स्वतन्त्र भारत के राष्ट्रीय जीवन में प्रतिविम्बित हो। हिन्दू मज़हब नहीं, धर्म है। धर्म का अर्थ वह आचार संहिता है जो मनुष्य और मानव समाज को विशिष्टता और स्थायित्व प्रदान करती है।

युग-युगीन त्रिगर्त : राष्ट्रीय परिसंवाद - प्रो. मधोक जी का उद्घाटन भाषण

जिस वर्तमान में हम रह रहे हैं उसकी जड़ें भूतकाल में हैं। हमारी आज जो मानसिक सोच है उसको बनाने में हमारे इतिहास का स्थान है। इसलिए इतिहास का महत्त्व है। हमारे देश में हमेशा इतिहास को महत्त्व दिया गया है। राजाओं के लिए इतिहास का ज्ञान अनिवार्य माना गया था। अंग्रेज़ इसके महत्त्व को समझते थे। इसीलिए उन्होंने ICS, जिसको उन्होंने अपना Steal Frame बनाया, उसमें २-३ परचे इतिहास के रखे थे। हुकूमत चलाने के लिए इतिहास का ज्ञान विशेष महत्त्व रखता है। मगर दुर्भाग्य से हमने इतिहास की ओर ध्यान नहीं दिया। आज़ादी के बाद हमने अपने इतिहास को जानने की कोशिश नहीं की। इतिहास के ज्ञान के अभाव में हम बहुत सी भूल कर बैठे हैं। हमने चीन के बारे में भूल की, कश्मीर के बारे में भूल की, पाकिस्तान के बारे में भूल की, अभी और जो भूलें हो रही हैं, उनका प्रमुख कारण भी इतिहास के ज्ञान का अभाव ही है। हमने अपने इतिहास से कुछ नहीं सीखा। इसलिए अपने देश के इतिहास पर विशेष ध्यान देना, उसको लिखना, राष्ट्रीय दृष्टिकोण से उससे उचित सबक लेना, यह आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

हिन्दू, हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व - प्रो. बलराज मधोक

भारत अथवा हिन्दुस्तान अथवा इण्डिया के लोग अति प्राचीन काल से हिन्दू नाम से जाने जाते रहे हैं। यह नाम सिन्धु से निकला है। सिन्धु नदी इस देश का प्रमुख भौगोलिक मानचिह्न है। पश्चिम की ओर से भारत में प्रवेश करने पर प्रवहमान सागर जैसी यह विशाल नदी हमारे देश की विशिष्ट पहचान रही है। इस महान् नदी और उसकी सरस्वती नदी समेत सहायक नदियों के तटों पर ही उस महान् आर्य संस्कृति और जीवन-पद्धति का विकास हुआ जो बाद में सिन्धु से ब्रह्मपुत्र और हिमालय से कन्याकुमारी तक फैले सारे देश में व्याप्त हो गई। यही क्षेत्र वैदिक आर्यों का आदि देश और मूल निवास था। यहीं से उनका पूर्व और पश्चिम के देशों में विस्तार हुआ।

आर्यों के प्राचीनतम ग्रन्थ और भारतीय संस्कृति और ज्ञान के आदि स्रोत ऋग्वेद में इस क्षेत्र को सप्तसिन्धवः (सात नदियों का क्षेत्र) और 'ब्रह्मावर्त (जहां से परमात्मा ने सृष्टि आवर्तन किया) कहा गया है। भ्रातृदेश ईरान के लोगों के संस्कृत 'स' का उच्चारण 'ह' किया। इसलिए उन्होंने सप्तसिन्धवः को हप्तहिन्दवः कहा। ईरानियों (पारसियों) की प्राचीन धर्मपुस्तक जिन्द अवेस्ता में 'हप्तहिन्दवः' शब्द का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। इस प्रकार संसार में ईसाई मत और इस्लाम के प्रादुर्भाव से बहुत पहले सिन्धु नदी के इस देश को सिन्धुस्तान अथवा हिन्दुस्तान की संज्ञा मिल चुकी थी। इसके लोगों को हिन्दू नाम से पहचाना जाने लगा था।

पौराणिक इतिहास का वैज्ञानिक आधार - डॉ. ठाकुर प्रसाद वर्मा

पुराण भारत की सभ्यता एवं संस्कृति की अमूल्य निधियां हैं। इनमें भारत ही नहीं संसार के इतिहास का उत्स तो निहित हैं ही समस्त मानवता के लिए जो कुछ भी कल्याणकारी हो सकता है वे सभी बातें और आचरण इनमें सन्निहित हैं। पुराण इतिहास ग्रन्थ हैं। अतः इनमें समय-समय पर समाज की आवश्यकता के अनुसार परिवर्तन एवं परिवर्धन होते रहे हैं।

लेकिन पुराण वास्तव में, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, मूल रूप से संसार में होने वाली पुरानी घटनाओं का विवरण रखने के स्रोत के रूप में कल्पित किए गए थे। इन्हें वेदों से भी प्राचीन माना गया है। जो कुछ भी हो पुराणों का मुख्य विषय इतिहास ही माना गया है तथा इनके पांच लक्षण बताए गये हैं, सर्ग, प्रतिसर्ग, मन्वन्तर, वंश तथा वंशानुचरित। इनमें प्रथम दो तो सृष्टि विद्या से सम्बन्धित है लेकिन मन्वन्तर धरती के इतिहास का भाग हैं तथा खगोलीय घटना से जुड़े हैं, अतः इसका खगोल विज्ञान से भी सम्बन्ध होते हुए भी यह सूर्यमण्डल तथा धरती के जीवनकाल से जुड़ा हुआ है।