अप्रैल 2017

इतिहास दिवाकर
आयतन 10, मुद्दा 1
अप्रैल
01 अप्र 2017
इतिहास कर्मयोग जीवनी भारतीय दर्शन संस्कृति
अप्रैल 2017
यह प्रकाशन 'इतिहास दिवाकर' का अप्रैल 2017 का अंक है, जो एक त्रैमासिक अनुसंधान पत्रिका है। इस अंक में नवसंवत्सर पर विशेष लेख शामिल हैं, जिसमें हिमाचल के पारंपरिक 'उगतू पंचांग' की चर्चा की गई है। इसमें लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के 'गीता रहस्य' के आधार पर कर्मयोग के सिद्धांत का गहन विश्लेषण है। साथ ही, पुण्य प्रतापी राजा विक्रमादित्य, तिब्बत में बौद्ध धर्म के प्रचारक वज्रगुरु पद्मसम्भव, और महान सेनानायक जनरल जोरावर सिंह जैसी ऐतिहासिक विभूतियों पर भी लेख प्रस्तुत किए गए हैं।
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मुख्य विशेषताएं

लोकमान्य तिलक के 'गीता रहस्य' के माध्यम से कर्मयोग में समता की 'आत्मौपम्य दृष्टि' का विस्तृत विश्लेषण।

हिमाचल प्रदेश के पारंपरिक 'उगतू पंचांग' और नव संवत्सर के उत्सव पर एक विशेष लेख।

तिब्बत में बौद्ध धर्म के ध्वजवाहक, वज्रगुरु पद्मसम्भव के जीवन और उनके योगदान पर प्रकाश डाला गया है।

महान सेनानायक जनरल जोरावर सिंह के पारिवारिक जीवन से जुड़ी भ्रांतियों का निराकरण और तथ्यात्मक विश्लेषण।

योगदानकर्ताओं

डव
डॉ० विद्या चन्द ठाकुर
सम्पादक (Editor)
चग
चेतराम गर्ग
सह सम्पादक (Co-editor)
इख
इरविन खन्ना
मार्गदर्शक (Patron)
चेतराम
मार्गदर्शक (Patron)
डश
डॉ० शिवाजी सिंह
मार्गदर्शक (Patron)
रठ
रवि ठाकुर
टंकण एवं सज्जा (Typesetting and Design)
डर
डॉ० रमेश शर्मा
Editorial Support
डओ
डॉ० ओम प्रकाश शर्मा
सम्पादन सहयोग (Editorial Support) / लेखक (Author)

प्रकाशन सारांश

इतिहास दिवाकर - अप्रैल 2017

सम्पादकीय: गीता रहस्य : कर्मयोग शास्त्र

भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन में स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है के उद्घोषक लोकमान्य बालगंगाधर तिलक प्रखर राष्ट्र भक्त और राष्ट्रीय सांस्कृतिक चिन्तन के प्रखर पुरोधा थे। अंग्रेजी शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय आन्दोलन में तिलक जी की सक्रिय भूमिका से अंग्रेज सरकार द्वारा इन्हें ईस्वी सन् १९०८ में मांडले जेल भेजा गया जहां वे १९१४ तक रहे। इसी बीच विक्रमी संवत् १९६७ की कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से चैत्र कृष्ण अमावस्या के भीतर उन्होंने गीता रहस्य ग्रन्थ की पाण्डुलिपि जेल में ही पहले-पहल लिख कर तैयार की। यह कलियुगाब्द का ५०१२ तथा ईस्वी सन् के अनुसार १९१०-११ का वर्ष था। जेल से रिहा होने के उपरान्त सन् १९१५ में गीता रहस्य मराठी में प्रकाशित हुई और आज से एक सौ वर्ष पहले १९१७ में गीता रहस्य का हिन्दी संस्करण प्रकाशित हुआ।

लोकमान्य तिलक जी ने गीता के सदा सर्वदा प्रासंगिक कालजयी सत्य सनातन सिद्धान्तों का गीता रहस्य में विस्तार से सरल, सुबोध शैली में वर्णन किया है। गीता ने सर्वश्रेष्ठ कल्याण मार्ग निष्काम कर्म को माना है। इसी आधार पर गीता रहस्य को कर्मयोग शास्त्र कहा गया है। समाज में सब के हित में निष्काम भाव से काम करने की आत्मौपम्य दृष्टि अर्थात् दूसरे को अपने ही समान मनाने की समता की दृष्टि का होना अत्यन्त अनिवार्य है। गीता रहस्य के बारहवें प्रकरण के विषय अन्तर्गत वर्णित आत्मौपम्य दृष्टि से सम्बन्धित लेख इतिहास दिवाकर के प्रस्तुत अंक में सम्मिलित है।

नव संवत्सर विशेष: उगतू पंचांग और नव संवत्सर

डॉ. ओम प्रकाश शर्मा

उगतू हिमाचल प्रदेश का एक पारम्परिक पहाड़ी पंचांग है। हिमाचल सृष्टि, स्थिति और लय के कालक्रमिक पक्षों को समेटे हुए है। ये कालक्रमिक पक्ष यहां के समाज की विभिन्न परम्पराओं एवं पद्धतियों में झलकते हैं। हिमालय की नदी घाटियों एवं तराईयों में बसे समाज के पास जो बौद्धिक सम्पदा विद्यमान है, उसके मूल में कालगणना के सिद्धान्त विशेष महत्त्व रखते हैं। इन्हीं सिद्धान्तों के आधार पर यहां का समाज सभ्यता के पथ पर अग्रसर हुआ। समाज के जीवन दर्शन में भी कालगणना के सिद्धान्तों की विशेष भूमिका दिखाई देती है। समाज को ब्रह्माण्डीय एवं मानवीय सृष्टि का सम्यक् कालबोध हो, इसी उद्देश्य से यहां कालगणना की विभिन्न परम्पराएं एवं पद्धतियां स्थापित हैं। इसी प्रकार की एक पद्धति पहाड़ी पंचांग उगतू में देखने को मिलती है।

कालगणना की पद्धति : उगतू खोजने का शुभारम्भ मार्गशीर्ष मास में होता है। माघ, फाल्गुन और चैत्र कालगणना के विशेष मास माने जाते हैं। इन्हीं तीन मासों में कालगणना की प्रक्रिया पूर्ण की जाती है। सर्वप्रथम गांव के ज्योतिष विद्या के मर्मज्ञ विद्वान गांव के मन्दिर में ऐसे स्थान का चयन करते हैं जहां सूर्य की किरणें सीधी पड़े। वस्तुतः मन्दिर की स्थापना ही वास्तुशास्त्र के अनुरूप होती है।

पुण्य प्रतापी राजा विक्रमादित्य

कृष्ण चन्द महादेविया

पुराने समय की बात है कि एक राजा थे उनका नाम था जी विक्रमादित्य। देखने में बहुत सुन्दर-स्वस्थ, बहुत वीर, निडर और सत्य बचनी, सच्चा न्याय करने वाले राजा थे। उनके राज्य में प्रजा और पंछी-पशु सभी बहुत आनन्द में रहते थे। अन्न और धन की कोई कमी नहीं थी। चारों ओर शान्ति और संतोष था। उनके राज्य में कोई भी मनुष्य दुःखी न था। राजा जी वेश बदल-बदल कर स्वयं अपने राज्य में भ्रमण कर जानकारी लेते रहते थे।

एक बार क्या हुआ कि राजा विक्रमादित्य अपनी रियासत का अकेले भ्रमण करते-करते बड़ी दूर निकल गए। उन्होंने अपना वेश बदला हुआ था। महाराज, राजा ने देखा कि सांप फन उठाए एक मेंढक को खाने के लिए तैयार था। मेंढक बहुत करुण स्वर में अपनी जान बचाने के लिए गिड़गिड़ा रहा था। विक्रमादित्य के मन में दया आ गई। उन्होंने सांप से प्रार्थना की कि वह मेंढक को न खाए।

संवीक्षण: कर्मयोग में समता की आत्मौपम्य दृष्टि

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक

स्थितप्रज्ञ ज्ञानी पुरुष की बुद्धि और उसका बर्ताव ही नीति नीतिशास्त्र का आधार है। उनसे निकलने वाले नीति-नियमों में उनके नित्य होने पर भी समाज की अपूर्णावस्था में थोड़ा-बहुत बदलना पड़ता है, तथा इस रीति से बदले जाने पर भी नीति-नियमों की नित्यता में उस परिवर्तन में कोई बाधा क्यों और कैसे नहीं आती। अब उस पहले प्रश्न का विचार करते हैं कि स्थितप्रज्ञ ज्ञानी पुरुष अपूर्णावस्था के समाज में जो बर्ताव करता है, उसका मूल अथवा बीज-तत्त्व क्या है? यह विचार दो प्रकार से किया जा सकता है। एक तो कर्त्ता की बुद्धि को प्रधान मानकर और दूसरा उसके बाहरी बर्ताव से। इनमें से यदि केवल दूसरी ही दृष्टि से विचार करें, तो विदित होगा कि स्थितप्रज्ञ जो-जो व्यवहार करते है, वे प्रायः सब लोगों के हित के ही होते हैं।