इतिहास दिवाकर - अप्रैल २०१६
सम्पादकीय: जौ की महिमा
हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिला की एक पंचायत है – बाराहार। बाराहार के नम्बरदार के ज्येष्ठ पुत्र थे हुक्म राम। पिता के देहान्त के बाद नम्बरदार ज्येष्ठ पुत्र को बनना था, लेकिन उसने फक्कड़ प्रवृत्ति के कारण नम्बरदार का पद नहीं सम्भाला, जो उसके छोटे भाई को सम्भालाना पड़ा। स्वयं उनका घूमने-फिरने और गप्प-शप्प लगाने का शौक रहा। आज उनकी बात स्मरण में आती है तो ज्ञात होता है, उनकी बात में पूर्ण सच्चाई है। वेदों में भी अन्नों में यव (जौ) का प्राधान्य है। जैसे कि ऋग्वेद में एक स्थान पर जौ द्वारा भूख से पार होने की बात कही गई है। भारतीय परम्परा में नवरात्रों में विशेषतः नया सम्वत् के साथ आरम्भ होने वाले चैत्र नवरात्रे और आश्विन नवरात्रों में भगवती पूजनार्थ जौ के जवार उगाए जाते हैं। हिमाचल प्रदेश में जवार को जौरा या लूंग कहा जाता है। जौ नया सम्वत् के अवसर पर तैयार होने वाली पहली फसल है। इसी उपलक्ष्य में कुल्लू और मण्डी ज़िला के कुछ क्षेत्रों में वैशाख मास में सलाहर का त्यौहार मनाते हैं। इस प्रकार जौ की महिमा शास्त्र और लोक परम्परा में सर्वत्र व्याप्त है।
चैत्र संक्रान्ति और नया संवत्
लेखक: डॉ. सूरत ठाकुर
भारतीय परम्परा के अनुरूप हिमाचल प्रदेश में भी नव वर्ष का प्रारम्भ चैत्र मास से माना जाता है। चैत्र के आगमन के साथ-साथ प्रत्येक जड़-चेतन में एक नये रस का संचार होने लगता है। पेड़-पौधों में नई कोंपलें फूटने लगती हैं। प्रत्येक प्राणी शिशिर ऋतु की ठिठुरती ठण्डक से मुक्ति पाता है। हिमाचल प्रदेश के अधिकांश आंचलों में चैत्र मास के आते ही अपने सगे सम्बन्धियों और मित्रों को मिष्ठान तथा कपड़े नववर्ष के उपहार स्वरूप बांटे जाते हैं। चैत्र की संक्रान्ति को गुड़ का गुड़ाणी खाना शुभ माना जाता है। परम्परा के अनुसार अपने मुख से चैत्र मास का नाम लेना शुभ नहीं माना जाता, बल्कि इस मास में गाये जाने वाले लोकगीतों को गाने वाले पारम्परिक गायकों द्वारा सुनना ही शुभ माना जाता है।
नया सम्वत्: यह दिन हिमाचल ही नहीं अपितु पूरे हिन्दू समाज में पुण्य दिवस के तौर पर मनाया जाता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ब्रह्मा जी ने सृष्टि का प्रारम्भ किया था तथा यही संवत्सर का आरम्भ का दिन है। इसे यहां पर नया सम्वत् 'नोउआं साजा', 'गुड़ला साज़ा', 'कनाउआ साज़ा' आदि नामों से पुकारा जाता है। इस दिन भोर होने से पूर्व ही मीठा खाने की परम्परा है। जन विश्वास है कि यह दिन जैसा गुजरेगा वैसा ही पूरा वर्ष व्यतीत होगा। धूप निकलने पर कुल पुरोहित अपने यजमानों के घर जाता है और उन्हें अगले वर्ष होने वाली घटनाओं की पत्री पढ़कर सुनाता है।
नये संवत् में जौ की फसल का जौ-लाई त्यौहार
लेखक: तोबदन
किसी समय हिमाचल प्रदेश के पूरे क्षेत्र में एक प्रमुख फसल के रूप में जौ बोया जाता रहा है। जौ हमारे भोजन का महत्त्वपूर्ण तत्व रहा है। यह पौष्टिक है। जौ को भूनने के बाद उसको पीसकर सत्तु बनाते हैं। जिससे फिर अलग-अलग पकवान बनाए जा सकते हैं। हमारी प्राचीन संस्कृति में जौ के महत्व का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि इससे सम्बन्धित कई परम्पराएं अब भी जीवित हैं और उनका स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण है। हिमाचल प्रदेश पहाड़ी क्षेत्र होने और सर्दियों में अधिक ठंडा होने के कारण यहां इन दिनों ताजा फूल प्राप्त करना कठिन होता है। जौ की पनीरी का फूल के रूप में प्रयोग करने की प्रथा पूरे प्रदेश में प्राचीन काल से प्रचलित रही है। लाहौल में इसे यवराग कहते हैं और कुल्लू में पुराने समय में यह जौरे नाम से जाना जाता था।
प्राचीनतम कालगणना की आधुनिकता और वैज्ञानिकता
लेखक: डॉ. मुरली मनोहर जोशी
भारतीय पौराणिक साहित्य में श्रीमद्भागवत का महत्त्व सर्वविदित है। इस ग्रन्थ में कतिपय दार्शनिक एवं वैज्ञानिक अवबोधों को अन्य कथाओं के साथ-साथ, इस सुघड़ता से पिरोया गया है कि व्यास जी के कौशल के समक्ष नतमस्तक होना पड़ता है। एक ऐसा ही महत्त्वपूर्ण अवबोध है 'काल'। श्रीमद्भागवत पुराण में अनेक स्थलों पर इसके संबंध में दार्शनिक एवं वैज्ञानिक मीमांसा विस्तृत रूप में प्रस्तुत की गई है।
श्रीमद्भागवत के द्वितीय स्कंध के आठवें अध्याय में राजा परीक्षित ने शुकदेव मुनि से विविध प्रश्न किये हैं। वे पूछते हैं कि महाकल्प एवं उनके अवांतर कल्प कितने होते हैं? भूत, भविष्य एवं वर्तमान काल का अनुमान कैसे किया जाता है? तथा काल की 'अण्वी' (सूक्ष्म) एवं 'वृहत्' (महान) गतियां किस प्रकार जानी जा सकती हैं? इस अध्याय में मैत्रेय जी विदुर जी को बताते हैं कि जो 'काल' पदार्थ की 'परमाणु' जैसी सूक्ष्म अवस्था में व्याप्त रहता है, वह 'अत्यन्त सूक्ष्म' (परमाणु काल) है जो सृष्टि से प्रलय पर्यंत उसकी सब अवस्थाओं का भोग करता है, वह परम महान है।



