इतिहास दिवाकर: अप्रैल २०१५
सम्पादकीय: इतिहास के सभी पक्षों का बोध
नव संवत्सर कलियुग ५११७, विक्रमी संवत् २०७२ तथा शक संवत् १६३७ सर्व मंगलमय हो। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से हमारा नव संवत्सर आरम्भ होता है। नये वर्ष की पहली तिथि होने के कारण चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को वर्ष प्रतिपदा के नाम से जाना जाता है। वर्ष प्रतिपदा भारत को गौरवशाली परम्परा का बोध करवाती है और इसी बोध से भारत के इतिहास और संस्कृति के प्रकाश में वर्तमान और भविष्य का मार्ग प्रशस्त होता है। यहां इस ओर ध्यान देना आवश्यक है कि हम इतिहास की उपलब्धियों का ही गुणगान न करते रहें, अपितु उस इतिहास को भी ध्यान में रखें जिसमें हमारे अतीत की गलतियों का वर्णन है। इन्हीं गलतियों के परिणाम हमें जागरूक करते हैं कि फिर से हम उन गलतियों को न दोहराएं। इसी जागरूकता में ही राष्ट्र समाज और मानव जीवन के वर्तमान और भविष्य की उज्जवल सम्भावनाएं समाहित है।
परम पूज्य सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत जी का यह प्रेरक कथन उल्लेखनीय है कि जब तक देशवासी स्वयं को नहीं पहचानेंगे तब तक हमारे चारों ओर भिन्न-भिन्न समस्याएं बनी रहेगी। आज हम देश की समस्याओं के लिए एक-दूसरे पर दोषारोपण करते हैं, लेकिन इससे कुछ नहीं होने वाला। पहलें हम अपने को पहचानें, तभी हम देश को आगे बढ़ा पाएंगे और तभी देश के भाग्य का उदय होगा। हमारे संघ के कार्यक्रम शक्ति प्रदर्शन के लिए नहीं, बल्कि आत्मदर्शन के लिए होते हैं। ये कार्यक्रम आत्म साक्षात्कार हैं, ताकि हम अपनी क्षमताओं को पहचानें और उसका उपयोग राष्ट्रहित में करें। वास्तव में आत्मदर्शन एवं अपनी क्षमताओं के समुचित आकलन के लिए इतिहास के अच्छे बुरे सभी पक्षों का बोध होना अत्यावश्यक है।
दधीचि के अस्थि वज्र से वृत्रासुर वध
बाबा साहब आपटे
अपने शत्रु को मारने के साधनस्वरूप इन्द्र जिस आयुध का उपयोग करता था, उसका नाम अपने पुराण ग्रन्थों में 'वज्र' बताया गया है। किन्तु वृत्रासुर को मारने के लिए इन्द्र ने जिस वज्र का प्रयोग किया था वह उसका स्वयं का न था, वह तो एक विशेष प्रकार का वज्र था और वह उसी उद्देश्य से तैयार कराया गया था, ऐसा वर्णन प्रसिद्ध है। इन्द्र का वज्र सामान्यतः किस पदार्थ का बनता था, इसका वर्णन कहीं भी नहीं मिलता। किन्तु वृत्रासुर को मारने के लिए जो विशेष वज्र बनाया गया था, वह दधीचि नामक एक महर्षि की अस्थियों से बना था। वृत्रासुर को मारने के लिए दूसरे किसी भी आयुध का उपयोग नहीं हो सकता था। इन्द्र से कहा गया था कि वृत्रासुर को मारने का एकमात्र यही उपाय है कि दधीचि की अस्थियों से बने हुए वज्र का उस पर प्रयोग किया जाए। जब इन्द्र ने महर्षि के पास जाकर अपना उद्देश्य बताया तब बड़े आनन्द से योग द्वारा उन्होंने प्राणत्याग कर दिया। तत्पश्चात् उनकी हड्डियों से बने हुए वज्र से इन्द्र ने वृत्रासुर का वध किया। इस प्रकार की यह बड़ी विलक्षण कथा है।
क्या यह शब्दशः सत्य है?
अति प्राचीन वेदों से लेकर अर्वाचीन पुराणों तक बहुत से ग्रन्थों में इस घटना का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उल्लेख है, इस कारण इस घटना की ऐतिहासिकता में कोई सन्देह नहीं रह जाता। किन्तु उससे भी अधिक आश्चर्य की बात यह है कि इस एक प्रसंग को छोड़ देने पर इतने विशाल संस्कृत साहित्य में कहीं भी अस्थि के ऐसे उपयोग का वर्णन नहीं मिलता। शस्त्र का वर्णन अनेक स्थानों पर मिलता है किन्तु वह लोहा आदि धातुओं से बनता था, ऐसा स्पष्ट या अस्पष्ट रूप से कहा गया है।
भारत का पौराणिक भूगोल
डॉ. ओम दत्त सरोच
पुराण भारतीय धर्म, दर्शन, कला, संस्कृति एवं इतिहास के ज्ञान का मुख्य स्रोत हैं। भारत की प्राचीन ज्ञान परम्परा का दर्शन पुराणों में होता है। भारत के प्राचीन स्वरूप एवं भूगोल व इतिहास का विस्तार से वर्णन पुराणों में मिलता है। भौगोलिक दृष्टि से अखण्ड भारत का दर्शन पुराणों में होता है। पुराणों के अनुसार इस ब्रह्माण्ड में चौदह लोक हैं। छः लोक पृथ्वी से ऊपर तथा सात लोक पृथ्वी से नीचे स्थित हैं। भूलोक ब्रह्माण्ड के मध्य में है। ये चौदह लोक इस प्रकार से हैं - भूलोक, भुवः लोक, स्वःलोक, तपःलोक, जन लोक, महःलोक तथा सत्यलोक, ये पृथ्वी से ऊपर हैं। पृथ्वी से नीचे के सात लोक हैं - अतल, वितल, नितल, गभस्तिमान, महातल, सुतल तथा पाताल। इन चौदह लोकों में भूलोक ही पृथ्वी लोक है, जिस पर हम रहते हैं। भूलोक के भूगोल के अन्तर्गत इसके द्वीपों, खण्डों, वर्षों, पर्वतों, वनों, नदियों एवं देशों का विस्तृत वर्णन विभिन्न पुराणों में किया गया है। भारत वर्ष को केन्द्र बिन्दु मान कर ही भूमण्डल का वर्णन हुआ है।
भारतवर्ष की इतिहास दृष्टि
गुंजन अग्रवाल
इतिहास क्या है? इतिहास-शिक्षण का उद्देश्य क्या है? इतिहास के प्रति दृष्टिकोण क्या होना चाहिए? प्राचीन भारत में इतिहास-लेखन की परम्परा क्या थी? भारतीय-इतिहास का पुनर्लेखन क्यों? – ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं, जो भारतीय-समाज में न केवल बुद्धिजीवियों को परेशान कर रहे हैं, बल्कि देश के राजनीतिज्ञ भी इससे भयभीत हैं; और देश का सामान्य व्यक्ति भी कौतूहलपूर्वक इतिहास में चल रही रस्साकशी को देख रहा है। हमारी मान्यता है कि इतिहास किसी भी राष्ट्र का प्राण है। राष्ट्रात्मा का ज्ञान और राष्ट्र-शरीर का कर्म उसी पर निर्भर है। वह सभ्यता का आधार एवं संस्कृति का प्रधान अंग है। भविष्य के निर्माण में इतिहास का सहयोग अनिवार्य रूप से रहा करता है। इसलिए यदि इतिहास की उपेक्षा की गयी, तो राष्ट्र का पतन अवश्यंभावी होता है।



