अप्रैल 2014

इतिहास दिवाकर
आयतन 7, मुद्दा 1
अप्रैल
01 अप्र 2014
इतिहास कृषि भारतीय कालगणना भारतीय राष्ट्रवाद संस्कृति
अप्रैल 2014
यह प्रकाशन 'इतिहास दिवाकर' का अप्रैल 2014 का अंक है, जो एक त्रैमासिक अनुसंधान पत्रिका है। इसमें भारतीय कालगणना की वैज्ञानिकता, नव संवत्सर का महत्व, और भारतीय राष्ट्रीय चिंतन के मूल तत्वों पर विस्तृत लेख शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, कुल्लू की कृषि शब्दावली, राजस्थानी लोक गाथाओं में सृष्टि रचना, और भारतीय चिंतन पर एक संगोष्ठी की रिपोर्ट भी प्रस्तुत की गई है। पत्रिका का संपादकीय कृषि को जीवन का आधार मानता है और इसमें एक स्मृति शेष खंड भी शामिल है।
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मुख्य विशेषताएं

पत्रिका भारतीय कालगणना (विक्रमी सम्वत्) को एक वैज्ञानिक और सार्वभौम प्रणाली के रूप में प्रस्तुत करती है, जो प्रकृति के नियमों पर आधारित है।

कृषि को भारतीय संस्कृति और जीवन निर्वाह का मौलिक आधार बताया गया है, जिसमें कुल्लू घाटी की विशिष्ट कृषि शब्दावली पर एक विशेष लेख शामिल है।

भारतीय राष्ट्रीय चिंतन के मूल तत्वों का विश्लेषण किया गया है, जिसमें इसकी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जड़ों पर जोर दिया गया है, जो पश्चिमी राजनीतिक राष्ट्रवाद से भिन्न है।

योगदानकर्ताओं

डव
डॉ० विद्या चन्द ठाकुर
सम्पादक (Editor)
चग
चेतराम गर्ग
सह सम्पादक (Co-editor)
मर
मौलु राम ठाकुर
लेखक (Author)
अध्यक्ष, देवप्रस्थ साहित्य एवं कला संगम, ढालपुर कुल्लू (हि.प्र.)
डस
डॉ० सतीश चन्द्र मित्तल
लेखक (Author)
नस
नरेन्द्र सहगल
लेखक (Author)
डओ
डॉ० ओम प्रकाश शर्मा
सम्पादक मण्डल
डश
डॉ० शिवाजी सिंह
मार्गदर्शक (Patron)

प्रकाशन सारांश

सम्पादकीय: कृषि ही जीवन का निर्वाह

नव संवत्सर कलियुगाब्द ५११६, विक्रमी संवत् २०७१ तथा शक संवत् १९३६- सब प्रकार से सुख-समृद्धि पूर्ण हो !

कृषि का महत्त्व सर्वकाल और सर्वदेशव्यापी है। भारतवर्ष तो कृषि प्रधान देश के रूप में प्राचीन काल से ख्यातिप्राप्त है और ऋषि चिन्तन और कृषि कर्म ही भारत की सांस्कृतिक धारा का मौलिक प्रवाह है। मानव समाज एवं भारत राष्ट्र की अनुपम धरोहर एवं विश्व साहित्य के प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद में कृषि के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए कहा गया है कि कृषि करो और सम्मानपूर्वक सम्पन्न बनों- कृषिमित् कृषस्व वित्ते रमस्व बहुमन्यमानः।

कृषि पराशर कृषि विज्ञान के क्षेत्र में महर्षि पराशर रचित एक विशिष्ट कृति है। महर्षि पराशर कहते हैं कि कृषि मनुष्य को सम्पत्ति और प्रखर बुद्धि प्रदान करती है और प्राणी जगत् के जीवन का निर्वाह कृषि पर ही आधारित है– कृषिर्धन्या कृषिर्मेध्या जन्तूनां जीवनं कृषिः।

जीवन के लिए कृषि की उपेक्षा कदापि नहीं की जा सकती है। इस सम्बन्ध में कृषि पराशर में कहा गया है कि कण्ठ, कान एवं हाथ में यदि सोने के आभूषण पहने हों तो, तब भी अन्न के अभाव में मनुष्य को उपवास ही करना पड़ता है– कण्ठे कर्णे च हस्ते च सुवर्ण विद्यते यदि। उपवासस्तथापि स्यादन्नाभावेन देहिनः।।

कृषि एक विज्ञान है जिसकी भिन्न-भिन्न आंचलों की विविध विशेषताएं हैं। इनके अध्ययन से समाज जीवन के इतिहास, संस्कृति एवं सामाजिक चिन्तन और व्यवहार के अनेक पहलू प्रकाश में आते हैं। इसीलिए हिमाचल प्रदेश के अनुभवसिद्ध प्रख्यात विद्वान श्रीयुत् मौलू राम ठाकुर जी का लेख, 'कुलुई की कृषि व्यावसायिक शब्दावली' इस अंक में सम्मिलित कर रहे हैं। इतिहास दिवाकर में कृषि दर्शन के अन्तर्गत भविष्य में भी लेखकों से ऐसी सामग्री की विनम्र अपेक्षा रहेगी।

सार्वभौम वैज्ञानिक कालगणना

नरेन्द्र सहगल

सर्वस्पर्शी एवं सर्वग्राह्य भारतीय संस्कृति के द्रष्टा मनीषियों और प्राचीन भारतीय खगोलशास्त्रियों के अनुसार पृथ्वी पर पहले मानव की उत्पति चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन हुई। इसलिए न केवल भारतवासियों, बल्कि सारी मानवता के लिए यह दिन महत्त्वपूर्ण एवं पूजनीय है। यह दिन सारे ब्रह्माण्ड के लिए नववर्ष के शुभागमन का शंखनाद है।

सारे विश्व में प्रचलित लगभग सत्तर कालगणनाओं में से भारतीय कालगणना ही एकमात्र ऐसी वैज्ञानिक कालगणना है जिसका सम्बन्ध सारी मानवता को व्याप्त करने में सिद्ध कालतत्त्व से है। शेष सभी कालगणनाएं क्षेत्र और वर्ग विशेष पर आधारित है। पाश्चात्य जगत के विद्वान अभी तक यही कहते रहे कि मानव सृष्टि की आयु मात्र सात-आठ हजार वर्ष ही है, परन्तु अब नए अनुसंधान सामने आने के बाद पश्चिम के विद्वानों ने भी प्राचीन भारतीय खगोलशास्त्रियों के इस कथन का समर्थन कर दिया है कि मानवीय सृष्टि दो अरब वर्ष पुरानी है।

प्रकृति आधारित कालगणना

भारतीय जीवनदर्शन के अनुसार पूर्णतः जलमग्न पृथ्वी में से सर्वप्रथम बाहर निकले भूभाग सुमेरू पर्वत पर सृष्टि निर्माता ब्रह्मा के रूप में प्रथम मानव का प्रादुर्भाव १ अरब, ९७ करोड़, २९ लाख, ४९ हजार, १५ वर्ष पूर्व चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को रविवार के दिन प्रातः हुआ।

भारतीय कालगणना प्रकृति के नियमों पर आधारित है। नक्षत्रों पर आधारित विज्ञानसम्मत चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन नामक १२ मास एक वर्ष में आते हैं। इसी प्रकार सप्ताह के सात दिनों रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार तथा शनिवार का ग्रह-आधारित नामकरण भी स्वयं ब्रह्मा जी द्वारा विज्ञान के आधार पर किया गया है।

भारतीय राष्ट्रीय चिन्तन के मूल तत्त्व

डॉ० सतीश चन्द्र मित्तल

राष्ट्र, राष्ट्रीयता अथवा राष्ट्रवाद विश्व के इतिहास में जाने-पहचाने शब्द हैं। जहाँ भारतीय-चिन्तन में इसकी संकल्पना प्राचीनतम है, वहाँ पाश्चात्य जगत् में इसका चिन्तन १८वीं तथा १९ वीं शताब्दी की देन है। एक का आधार मूलतः सांस्कृतिक है, दूसरे का राजनीतिक है। स्वाभाविक है कि दोनों की अवधारणा तथा विकास का क्रम भिन्न रहा है।

भारत के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में इसे जानने के लिए इसके अर्थ, प्रकृति, व्यापकता तथा इसके आवश्यक तत्त्वों को जानना आवश्यक होगा। इससे संबंधित अनेक प्रश्न हैं। राष्ट्रीयता अथवा राष्ट्रवाद क्या है? क्या यह कोई प्राचीन अवधारणा अथवा आधुनिक विचार है? इसका विभिन्न देशों में, विभिन्न कालों में क्या स्वरूप रहा? क्या यह भावात्मक अभिव्यक्ति, वर्तमान वैश्विक चिन्तन में बाधा तो नहीं है?

राष्ट्रवाद का अर्थ

राष्ट्रवाद अथवा राष्ट्रीयता-संबंधी विचार पर पाश्चात्य विचारकों तथा भारतीय-तत्त्ववेत्ताओं ने समय-समय पर इसके अर्थ तथा भाव को प्रकट किया है। आधुनिक भारत की राष्ट्रीयता-विषयक अवधारणाएँ मुख्यतः पाश्चात्य चिन्तन से प्रभावित हैं। 'इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका' में दिया है,' 'राष्ट्रीयता एक मनोदशा है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अपने राष्ट्र के प्रति उच्चतम भक्ति अनुभव करता है।' ब्रिटेन के प्रसिद्ध विद्वान होन्स कोहन (१८९१-१९७१) ने इसे स्पष्ट करते हुए लिखा, राष्ट्रीयता एक विचार है, एक विचार-शक्ति है जो मनुष्य के मस्तिष्क तथा हृदय को नये विचारों और मनोभाव से भर देता है और उसकी चेतना को संगठित कर तथा कार्यों में परिवर्तन करने कि लिए प्रेरित करता है।'