सम्पादकीय
भारत का मेरुदण्ड
नवसंवत्सर कलियुगाब्द 5114, विक्रमी सम्वत् 2069 तथा शक सम्वत् 1934 की अनन्त शुभकामनाएँ। भारतीय सनातन परम्परा में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन नव संवत्सर के पावन पर्व की राष्ट्रव्यापी मान्यता है। इस दिवस का सम्बन्ध भारतवर्ष के धर्म और अध्यात्म से जुड़ा है। भारत के धर्म और अध्यात्म के श्रेष्ठ मार्ग – आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः (ऋग्वेद 1/89/1) अर्थात् – हमें सब ओर से कल्याणकारी विचार प्राप्त हों, का वैदिक संदेश न केवल भारत राष्ट्र के लिए अपितु सम्पूर्ण विश्व समाज के लिए हितकर है। स्वामी विवेकानन्द ने भारत के ऋषियों के धर्म अध्यात्म के दर्शन की छाप पाश्चात्य समाज में बड़ी गहराई तक पुनः स्थापित की है। स्वामी विवेकानन्द जी का जन्म पिता विश्वनाथ दत्त के घर, माता भुवनेश्वरी देवी की कोख से माघ कृष्ण सप्तमी, कलियुगाब्द, 4964 तदनुसार 12 जनवरी, 1863 को कोलकत्ता में हुआ। माता–पिता ने इनका नाम नरेन्द्रनाथ रखा जो स्वामी रामकृष्ण परमहंस से दिव्य ज्ञान प्राप्त करके स्वामी विवेकानन्द के नाम से सारे संसार में विख्यात हुए। 11 सितम्बर, 1893 को अमेरिका के शिकागो नगर में विश्व धर्म सम्मेलन को हिन्दू धर्म के प्रतिनिधि के रूप में सम्बोधित करते हुए स्वामी जी ने जब आरम्भ में अमेरिकावासी बहनों और भाईयो कहकर सम्बोधन किया तो सभी श्रोता मन्त्रमुग्ध हो गए। स्वामी विवेकानन्द भारत के धर्म एवं अध्यात्म की कीर्ति पताका विदेशों में फहरा कर जब जाफना के रास्ते भारत के तट पर पाम्बन नगर में पहुंचे तो वहां अपने अभिनन्दन समारोह में स्वामी जी ने कहा कि मैंने पाश्चात्य देशों में भ्रमण किया है और मेरा भिन्न-भिन्न देशों में बहुत सम्पर्क हुआ है। मुझे लगा कि प्रत्येक राष्ट्र का एक विशिष्ट आदर्श अवश्य होता है। यह आदर्श राष्ट्र जीवन का मेरुदण्ड होता है। भारत का मेरुदण्ड राजनीति नहीं है, सैन्य शक्ति भी नहीं है, व्यावसायिक अधिपत्य भी नहीं है और न यांत्रिक शक्ति ही है। भारत का मेरुदण्ड धर्म है।
विवेकानन्दामृतम्
धर्मभूमि भारत
स्वामी विवेकानन्द
जब जब धर्म की अवनति होती है और अधर्म बढ़ता है, तब तब मैं पुनः धर्म की स्थापना के लिए अवतीर्ण होता हूँ। ये शब्द पवित्र गीता में सनातन भगवान् के वाक्य हैं। यह वाक्य संसार में आध्यात्मिक शक्ति-प्रवाह के सनातन उत्थान और पतन के नियमों का मूल मन्त्रस्वरूप है। ये परिवर्तन बारम्बार संसार में नये-नये लयों में प्रकाशित हो रहे हैं और यद्यपि अन्यान्य महान् परिवर्तनों की तरह उनके कार्यक्षेत्र में प्रत्येक क्षुद्र वस्तु के ऊपर उनका प्रभाव पड़ता है, फिर भी अनुकूल स्थान में ही उनकी कार्यशक्ति का प्रकाश अधिक पाया जाता है। समष्टि रूप में जिस प्रकार आदिम अवस्था त्रिगुणों का साम्य-भाव है, इस साम्यावस्था के भंग होने और उसे पुनः प्राप्त करने के निमित्त होने वाले समस्त संघर्षों को ही हम प्रकृति की अभिव्यक्ति यह विश्व – कहते हैं और आदि साम्यावस्था प्राप्त होने तक यह जगत् एवं वस्तुओं की गतिविधि इसी प्रकार चलती रहेगी – उसी प्रकार मालूम होता है कि इस पृथ्वी पर जब तक मनुष्य जाति वर्तमान रूप में रहेगी तब तक विषमता और उसकी नित्य सहचरी, साम्य लाभ की चेष्टा, दोनों ही साथ-साथ चलती रहेंगी। इसके फलस्वरूप संसार में सर्वत्र भिन्न-भिन्न जातियों, उप जातियों से लेकर व्यक्तियों तक में विशेषत्व सृष्ट होता रहेगा।
नवसंवत्सर
नव-सम्वत्सर मास एवं दिवस-व्यवस्था
डॉ. गौरीनाथ रस्तोगी
भारत में प्रचलित नव-सम्वत्सर वस्तुतः केवल भारतवासियों का ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण मानवीय सृष्टि के लिए नववर्ष के आगमन का सूचक है, क्योंकि कहा गया है कि चैत्र मासे जगत ब्रह्मा ससर्ज प्रथमेऽहनि, शुक्ल पक्षे समग्रं तु तदा सूर्योदये सति। सरल शब्दों में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में ही ब्रह्मा जी ने सृष्टि की संरचना करते हुए सूर्य चन्द्र, पृथ्वी, नक्षत्रों आदि का सृजन किया तथा उनकी गति को आधार बनाकर काल-गणना प्रारम्भ की। सूर्य की इस सृष्टि से पूर्व त्रैलोक्य भर में अमावस्या का घोर अन्धकार अपने पांव पसारे हुए था। दिनकर के अस्तित्व में आने के साथ पृथ्वी पर प्रकाश प्रारम्भ हुआ। ब्रह्माजी द्वारा इस सृष्टि-रचना तथा काल-गणना का सम्पूर्ण उपक्रम निसर्ग अथवा प्रकृति से तादात्म्य रखकर किया गया अमावस्या का अन्धकार नष्ट होने के पन्द्रह दिन बाद पूर्णिमा को चित्रा नक्षत्र होने से उस मास का नामकरण चैत्र किया गया।
कुल्लू में नव-सम्वत्सर
ओम प्रकाश 'शास्त्री'
चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि को भारत में नव संवत्सर अर्थात् नव वर्ष आरम्भ होता है। इस नव संवत्सर को हिमाचल प्रदेश के कुल्लू क्षेत्र में नौंआ संवत कहते हैं। इस दिन नौंआ संवत के आधार पर पूरे साल भर के मेले, त्यौहार तथा उत्सवों आदि की तिथियां निश्चित की जाती हैं। वास्तव में यह नौंआ संवत शांत वातावरण में मनाया जाने वाला त्यौहार है। लोक मतानुसार यह विश्वास है कि इस दिन का आरम्भ जिस भी स्थिति में होता है, सारा साल उसी स्थिति में बीतता है। इसलिए इस दिन किसी भी प्रकार के ऐसे खाद्य पदार्थ का सेवन न किया जाए जिससे लड़ाई-झगड़े या किसी अप्रिय वातावरण का पूरे साल का आवरण बन जाए।
संवीक्षण
इतिहास का पुनर्लेखन
बाबा साहेब आपटे
भारत का इतिहास जो अब तक लिखा गया है, वह मुख्यतः विदेशी लेखकों ने लिखा है। उसमें हमारे भूतकाल को यथार्थ रूप में चित्रित करने की प्रवृत्ति नजर नहीं आती। इसके कई कारण हो सकते हैं। लेखकों का अज्ञान एवं पूर्वाग्रह तो बहुत बड़ी बाधा है ही, परन्तु दुनिया में भारत को बदनाम करने का एवं विजितों में हीन भावना निर्माण करने का अंग्रेजों का धूर्त कुचक्र सबसे प्रबल कारण रहा है। इसी हेतु से 'भारत गरम देश होने के कारण यहां के लोग अधिक परिश्रम नहीं कर सकते, उनकी बुद्धि केवल तत्वज्ञान अथवा काव्य लिख सकती है', इत्यादि धारणाएँ बनाई गईं और उनकी पुष्टि में फिर कहा गया कि ‘भारत में आर्य बाहर से आकर बस गये हैं।
संकल्प-पाठ का विवेचनात्मक अध्ययन
डॉ. ओम दत सरोच
हमारी संस्कृति कर्म-प्रधान है। उपनिषद् निरन्तर कर्म करने की प्रेरणा देते हुये सौ वर्ष की आयु प्राप्त करने की कामना करते हैं कि – कुर्वन्नेह कर्माणि जिजीविषामः शरद:शतम्। महाभारत युद्ध के समय जब अर्जुन मोहासक्त हो कर युद्ध से विमुख होने लगा तो श्रीकृष्ण ने उसे कर्म का महत्त्व समझाते हुये कर्मयोग का ज्ञान देकर उसे युद्ध-कर्म में प्रवृत्त किया। वेद विश्व का आदि ज्ञान है। वेद-ज्ञान की दो मुख्य धारायें हैं – ज्ञानकाण्ड और कर्मकाण्ड। ज्ञान-काण्ड के अर्न्तगत दार्शनिक चिन्तन परमेश्वर महिमा एवं विभिन्न देवस्तुतियां आती हैं। कर्मकाण्ड में यज्ञादि विधान पूजनादि आते हैं।
महाराज श्री अग्र का युग तथा उनके वंशज
ओम प्रकाश गर्ग 'मधुप'
एक प्राचीन कहावत है कि 'यथा राजा तथा प्रजा' यही सूत्र इतिहास लेखन में विद्वत् जनों के समक्ष अति प्राचीन काल से रहा होगा तभी विश्व के लगभग सभी इतिहास ग्रंथ राजन्य वर्ग तथा उनकी शासन व्यवस्था को ध्यान में रखकर ही लिखे गए हैं। भारतवर्ष की परम्परा में राजा की पदवी का अधिकारी क्षत्रिय ही होता है। पुराणों एवं स्मृतियों इत्यादि में यदि प्रसंग आने पर विवशतावश इतर राजाओं के सम्बन्ध में लिखना आवश्यक ही रहा हो तो केवल संकेत मात्र कर दिया गया अथवा उन्हें भी क्षत्रिय के रूप में ही प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।
क्रान्तिवीर
सत्याग्रही क्रान्तिवीर - शोभा राम
रूप शर्मा
हिमाचल प्रदेश में मण्डी स्वतन्त्रता पूर्व एक प्रसिद्ध राज्य था। वर्ष १९०९ ई. का मण्डी राज्य के इतिहास में एक विशेष स्थान है। यह वह ऐतिहासिक वर्ष था जब सत्ता पर बैठे तत्कालीन राजा भवानी सेन का सिंहासन डोलने लगा था। एक नवयुवक शोभा राम ने अपनी समझ बूझ का परिचय देते हुए पीड़ित लोगों को एक संगठित समूह के रूप में मण्डी के पड्डुल मैदान में एकत्रित कर अनूठा कारनामा किया था। लगभग आठ दिन तक मण्डी राज्य में प्रशासन राजा के स्थान पर शोभा राम के हाथों में रहा। उस समय लोगों में यह कहावत प्रचलित हो गई थी— राज भवानी सेना रा, हुक्म शोभा रामा रा।
स्थान वृत्त
गौरवशाली उज्जयिनी
ललित शर्मा
भारत के हृदय स्थल मध्यप्रदेश की पौराणिक और सांस्कृतिक नगरी महाकालपुरी अर्थात् उज्जयिनी प्राचीन और संवत् प्रवर्तक वीर विक्रमादित्य की राजधानी होने तथा कालजयी महाकालेश्वर शिव को अपनी गोद में प्रतिष्ठित कर सम्पूर्ण प्राचीन विश्व का मध्य स्थान होने का गौरव प्राप्त कर चुकी है। वेदों से महाकाव्यों तथा सभी पुराण ग्रंथों में इस प्राचीन और गौरवशाली नगरी की गरिमा का यशोगान गाया गया है। यहाँ के सन्दिपनी गुरु के आश्रम में शिक्षा प्राप्त की थी भगवान श्रीकृष्ण ने और फिर दिया था विश्व को गीता का अभिज्ञान।
यात्रा वृत्त
किन्नर कैलाश दर्शन
बीरबल शर्मा
हिमाचल प्रदेश के पर्वत शिखरों पर खड़ी अद्भुत शिलाओं को जनमानस शिव कैलाशों के रूप में मानता है। धार्मिक आस्था के प्रतीक इन कैलाशों की कठिन व जोखिम भरी यात्रा के लिए हर साल हजारों लोग जाते हैं। १९९९ में श्रीखंड की यात्रा के लिए जुलाई महीने में जब हमारा मण्डी-कुल्लू के सहयात्रियों का दल बागी पुल-जाओ सिंहगाड़ होकर निकला तो लगातार बारिश से डंडाधार की चढ़ाई से आगे नहीं जा सका और वापस लौट गया।
गतिविधियां
स्वर्गीय ठाकुर राम सिंह जी का ९७वां जन्म दिवस
फाल्गुन प्रविष्टे ४ कलियुगाब्द, ५११३, कृष्ण पक्ष ९/१०, ईस्वी सन् १६ फरवरी, २०१२ को ठाकुर जगदेव चन्द स्मृति शोध संस्थान, नेरी जिला हमीरपुर (हिमाचल प्रदेश) में शोध संस्थान के संस्थापक एवं राष्ट्रीय इतिहासवेत्ता स्वर्गीय ठाकुर राम सिंह जी का ९७वां जन्म दिवस समारोह आयोजित हुआ। इस अवसर पर देश के भिन्न-भिन्न स्थानों से पधारे विद्वानों तथा स्थानीय जनता ने श्रद्धेय ठाकुर राम सिंह जी को अपने श्रद्धासुमन अर्पित किए। प्रो. प्रेम कुमार धूमल, मुख्यमंत्री, हिमाचल प्रदेश, समारोह के मुख्य अतिथि थे और भारत में मंगोलिया के पूर्व राजदूत ओ. नयामदवा समारोह में विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित थे।



