अप्रैल 2010

इतिहास दिवाकर
आयतन 3, मुद्दा 1
अप्रैल
01 अप्र 2010
कालगणना ज्योतिष भारतीय इतिहास महाराणा प्रताप वराहमिहिर संस्कृति हिन्दू-मुस्लिम संवाद
अप्रैल 2010
अप्रैल २०१० का 'इतिहास दिवाकर' अंक भारतीय इतिहास, संस्कृति और कालगणना पर केंद्रित है। इसमें चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (नव संवत्सर) के वैज्ञानिक और सांस्कृतिक महत्व, विक्रमादित्य के नवरत्न वराहमिहिर के योगदान, और हरियाणवी लोकगाथाओं में महाराणा प्रताप की वीरता का विश्लेषण किया गया है। साथ ही, यह अंक भारत में हिंदू-मुस्लिम संवाद के ऐतिहासिक प्रयासों और समकालीन चुनौतियों पर भी प्रकाश डालता है।
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मुख्य विशेषताएं

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा भारतीय सनातन कालगणना का आधार है, जो किसी व्यक्ति या घटना पर नहीं, बल्कि पूर्णतः वैज्ञानिक काल-चक्र पर आधारित है। यह पृथ्वी पर मानव उत्पत्ति का पूजनीय दिन है।

महान खगोलशास्त्री वराहमिहिर, राजा विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक थे। उनके ग्रंथ 'पंच-सिद्धांतिका' और 'बृहत् संहिता' ज्योतिष, गणित और भू-विज्ञान के अमूल्य स्रोत हैं।

हरियाणवी लोक-नाट्य 'सांग' में महाराणा प्रताप की वीरता की गाथाएं राष्ट्रभक्ति और स्वधर्म रक्षा का संदेश देती हैं, जो लोक मानस में आज भी जीवित हैं।

यह अंक भारत में हिन्दू-मुस्लिम संवाद के ऐतिहासिक विकास का विश्लेषण करता है, जिसमें सूफीवाद से लेकर अंग्रेजों की 'बांटो और राज करो' नीति और समकालीन प्रयासों तक की चर्चा है।

योगदानकर्ताओं

ठर
ठाकुर राम सिंह
मार्गदर्शक (Mentor)
डश
डॉ० शिवाजी सिंह
मार्गदर्शक
चेतराम
मार्गदर्शक (Mentor)
इख
इरविन खन्ना
मार्गदर्शक
डव
डॉ० विद्या चन्द ठाकुर
सम्पादक (Editor)
चग
चेतराम गर्ग
सह सम्पादक
डर
डॉ० रमेश शर्मा
सम्पादक मण्डल
डओ
डॉ० ओम प्रकाश शर्मा
सम्पादक मण्डल
पस
प्रो० सतीश चन्द्र
सम्पादक मण्डल
सच
सुश्री चारु मित्तल
सम्पादक मण्डल
पर
प्रदीप राठौर
लेखक (Author)
रभ
राम भाऊ साठे
लेखक (Author)
लर
लज्जा राम तोमर
लेखक (Author)
रय
रामशरण युयुत्सु
लेखक (Author)
डक
डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री
लेखक (Author)

प्रकाशन सारांश

सम्पादकीय

नव संवत्सर : कलियुगाब्द 5112

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को भारतीय सनातन कालगणना के अनुसार नये वर्ष का शुभारम्भ होता है, इसलिए यह प्रतिपदा वर्ष प्रतिपदा कहलाती है। यह सनातन कालगणना अन्य कालगणनाओं की भांति किसी व्यक्ति या घटना से सम्बन्धित नहीं है, अपितु यह काल पर आधारित है तथा काल पर आधारित होने से पूर्णरूपेण वैज्ञानिक है जो कि वृहद् रूप में कल्प, मन्वन्तर और युगों में विभाजित है। भारत के ऋषि मनीषियों ने इस कालगणना को किसी भी धार्मिक अनुष्ठान में अनिवार्य रूप से किए जाने वाले संकल्प पाठ के विधान द्वारा सदा-सर्वदा के लिए संरक्षित किया है। संकल्प के आरम्भ में कालक्रम के वाचन के अनुसार सृष्टि सर्जक भगवान् ब्रह्मा की आयु के दूसरे परार्ध में श्वेतवाराह कल्प के अट्ठाइसवें कलियुग का प्रथम चरण प्रचलित है। कलियुग के प्रथम चरण के अन्तर्गत इस समय चैत्र सौर मास 3 प्रविष्टे, विक्रमी सम्वत् 2067 एवं ईस्वी सन् 16 मार्च, 2010 से कलियुगाब्द का 5112 वां वर्ष आरम्भ हुआ है। इस काल विवरण के अनुसार शोभन नामक विक्रमी संवत् 2067 के आरम्भ होने तक कलियुग के 5111 वर्ष बीत चुके हैं। अतः अब वर्ष प्रतिपदा से नव संवत्सर कलियुगाब्द 5112 आरम्भ हुआ है। सर्वशक्तिमान ईश्वर की अपार कृपा से नव संवत्सर कलियुगाब्द 5112 सर्वमंगलमय हो।

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा

केवल भारत का ही नहीं अपितु संपूर्ण मानव सृष्टि का पूजनीय दिन है

ठा० राम सिंह

नव वर्ष : इस समय विश्व में ७० से अधिक कालगणनायें प्रचलित हैं। उनसे संबन्धित देशों में उनके नववर्ष अपने अपने हिसाब-किताब के अनुसार आते हैं और अपने अपने देश की सांस्कृतिक और धार्मिक परम्पराओं और मान्यताओं के अनुसार मनाये जाते हैं। परंतु इन सभी कालगणनाओं के बारे में महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि इनका आधार सारे ब्रह्माण्ड को व्याप्त करने वाला कालतत्त्व न होकर व्यक्ति विशेष, घटना विशेष, वर्ग विशेष, सम्प्रदाय विशेष अथवा देश विशेष है।

भारतीय संस्कृति : विश्व में केवल भारतीय संस्कृति ही एक ऐसी संस्कृति है जो अनादि है क्योंकि इसका मूल वेद है। वेदों में दिये सिद्धान्त शाश्वत सत्य और नित्य हैं। प्राचीनतम होने पर भी वे सदैव नवीन है।

वर्ष प्रतिपदा का इतिहास : वर्तमान मानव सृष्टि के बारे में विद्वानों में बहुत मतभेद हैं। पश्चिम के खगोल शास्त्री, दार्शनिक, विचारक और उनके धर्मग्रन्थ इसे ६-७ हजार वर्ष पुरानी मानते हैं। परंतु भूगर्भीय क्षेत्र में निरंतर हो रहे अनुसंधानों के कारण यह बात अब वैज्ञानिक भी स्वीकार करने लगे हैं कि मानवीय सृष्टि की प्राचीनता मानव की कल्पनाशक्ति से परे हैं। भारतीय कालतत्त्व विशेषज्ञ मनीषियों या वेदों में दिये विवरणानुसार यह मानवीय सृष्टि लगभग २ अरब वर्ष पुरानी है।

देश की नयी पीढ़ी को नव संवत्सर का खुला पत्र

डॉ. प्रदीप राठौर

लो, भारत की नयी पीढ़ी! मैंने तुम्हें जान-बूझकर 'हैलो' कहकर सम्बोधित किया है, हालाँकि यह शब्द मेरी जुबान पर चढ़ा हुआ नहीं है। कुछ और कह कर तुम्हें सम्बोधित करता, तो शायद तुम्हारे साथ आत्मीयता स्थापित न कर पाता। पहचाना मुझे, मैं शोभन संवत्सर हूँ, तुम्हारा नया वर्ष। मैंने जब दस्तक दी तो तुम्हें सुनाई नहीं दी। मेरे अपने देश में मेरा कोई स्वागत नहीं हुआ। क्या तुमने मुझे भुला दिया है? जब विदेशियों का नववर्ष ३१ दिसम्बर की रात को आया था, तब तो तुम बहुत खुश थे।

हे नयी पीढ़ी! वह विदेशियों का नया साल था, जिसे तुमने धूमधाम से मनाया, भारतीयों का नहीं था। भारतीयों का नया साल तो मैं हूँ। लगता है कि मुझे तुम्हें अपना परिचय देना होगा। मैं भारतीय नववर्ष हूँ। मैं हर वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को आता हूँ। देश के अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग रूप में मैं मनाया जाता रहा हूँ। इस वर्ष मेरा नाम शोभन संवत्सर है।

संकल्प का सार

राम भाऊ साठे

हिन्दुओं में कोई भी मंगल कार्य करते समय प्रारम्भ में पुरोहित उस व्यक्ति से संकल्प कहलवाते हैं और बाद में वह कार्य प्रारम्भ होता है। संकल्प के तथा अन्य मन्त्र संस्कृत भाषा में रहते हैं। संकल्प शब्द का अर्थ है निश्चय। संकल्प करना माने निश्चय करना, काम करने का निश्चय करना। जिसने जन्म लिया है वह काम करता ही रहता है। कार्य करने के विषय में मन में लिए गये इस हेतु के इस निश्चय को संकल्प कहते हैं। कोई भी मंगल कार्य प्रारम्भ करते समय हम लोग इसी संकल्प का अर्थात् हेतु निश्चय का, विधिपूर्वक उच्चारण करते हैं।

विक्रमादित्य की राजसभा के रत्न : वराहमिहिर

लज्जा राम तोमर

अब से लगभग डेढ़ हजार वर्ष पूर्व भारतीय इतिहास के 'स्वर्णयुग' गुप्तकाल में जब देश की जनता सब प्रकार से सुखी थी, बाह्य आक्रमणों से देश सुरक्षित था, तो देश में कला, साहित्य और विज्ञान के क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति हुई। उस समय मध्य देश (वर्तमान मध्य प्रदेश) के अंतर्गत विद्या और ज्ञान के प्रमुख केन्द्र उज्जयिनी (वर्तमान उज्जैन) के निकटवर्ती कापित्थ नामक ग्राम में आदित्यदास नामक ब्राह्मण के घर में वराहमिहिर का जन्म हुआ था। वराहमिहिर गुप्तकाल में भारत में ज्योतिर्विज्ञान के एक बहुत प्रसिद्ध विद्वान हुए। प्राचीन भारत के ज्योतिषियों में वराहमिहिर ही सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं। उनका एक प्रसिद्ध ग्रंथ है 'पंच-सिद्धांतिका' अर्थात् पाँच सिद्धान्त। यह खगोल-विद्या और ज्योतिष विज्ञान का प्रामाणिक ग्रन्थ माना जाता है।

हरियाणवी भाषा में महाराणा प्रताप

रामशरण युयुत्सु

ज्येष्ठ शुक्ल, तृतीय, कलियुगाब्द ४६४२ (विक्रमी सम्वत् १५९७, ईस्वी सन् १५४०) को वर्तमान राजस्थान प्रांत के तत्कालीन मेवाड़ राज्य के राजकुमार के रूप में महाराणा प्रताप ने जन्म लिया। यह मुगल शासक अकबर के समकालीन थे। वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की वीरता की गाथाएं भारतीय इतिहास का गौरवशाली अध्याय है। 'सांग' हरियाणा की नाट्य-परम्परा का सिरमौर है, जिसे यहाँ का कौमी नाटक भी कहा गया है। हरियाणा के प्रसिद्ध सांगी पंडित मांगेराम ने लगभग चालीस सांग लिखे और स्वयं मंचित किए हैं। वीररस के सांगों में इनका सांग 'चित्तौड़गढ़ का केहरी' विशेष उल्लेखनीय सूची में रहा है।

मुसलमानों से संवाद रचना के नये प्रयास

डॉ. कुलदीप अग्निहोत्री

भारत का मुसलमानों से वास्ता हजरत मोहम्मद की मृत्यु के कुछ समय बाद ही पड़ना शुरू हो गया था। अरबों का भारत पर पहला आक्रमण कलियुगाब्द ३७३८-३९ (सन् ६३६-३७) में हुआ। भारत और इस्लाम पंथियों का इस्लाम के इतिहास में सबसे लम्बा संघर्ष विद्यमान है। हिन्दू-मुस्लिम संवाद के प्रारंभिक दौर में एक ऐसा पड़ाव आता है जिसकी अवहेलना नहीं की जा सकती। यह दौर या पड़ाव सूफी संप्रदाय के नाम से जाना जाता है। सूफियों ने इस्लाम की ईश्वर विषयक कट्टरता को भी कम किया और किसी सीमा तक ईश्वर और भक्त के बीच उभर आये मध्यस्थों की फौज को भी चुनौती दी। इस्लामी शासन काल में अकबर ने सत्ता आकांक्षा से हिन्दू-मुस्लिम संवाद का प्रयास किया था।