अप्रैल 2009

इतिहास दिवाकर
आयतन 2, मुद्दा 1
अप्रैल
01 अप्र 2009
आतंकवाद कालगणना पृथ्वीराज चौहान भारतीय इतिहास भारतीय नव वर्ष संस्कृति
अप्रैल 2009
अप्रैल 2009 का यह अंक 'इतिहास दिवाकर' का एक त्रैमासिक अनुसंधान प्रकाशन है। इसमें मुख्य रूप से भारतीय नव वर्ष 'वर्ष प्रतिपदा' के महत्व पर ध्यान केंद्रित किया गया है। विभिन्न लेखों में विक्रमी, शक और कलियुगाब्द जैसे भारतीय संवतों की वैज्ञानिक और सांस्कृतिक प्रासंगिकता पर चर्चा की गई है। इसके अतिरिक्त, यह पृथ्वीराज चौहान की हार के ऐतिहासिक कारणों और भारत में प्रचलित जेहादी आतंकवाद की प्रकृति जैसे विषयों पर भी प्रकाश डालता है, जो इसे इतिहास, संस्कृति और समकालीन मुद्दों का एक व्यापक मिश्रण बनाता है।
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मुख्य विशेषताएं

यह पत्रिका भारतीय नव वर्ष 'वर्ष प्रतिपदा' के गहरे सांस्कृतिक और वैज्ञानिक महत्व पर प्रकाश डालती है, जो चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाता है और सृष्टि की शुरुआत का प्रतीक है।

विक्रमी और शक संवत् जैसे विभिन्न भारतीय कैलेंडर प्रणालियों की विस्तृत व्याख्या की गई है, जो उनके ऐतिहासिक प्रवर्तकों और उनके राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक के रूप में उनके महत्व को दर्शाती है।

पत्रिका में तराई के दूसरे युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की हार के पीछे के 'रहस्य' का विश्लेषण किया गया है, जिसमें आंतरिक विश्वासघात को एक महत्वपूर्ण कारक के रूप में इंगित किया गया है।

भारत में जेहादी आतंकवाद की वैचारिक जड़ों और ऐतिहासिक संदर्भ पर एक सामयिक लेख शामिल है, जो समकालीन चुनौतियों पर एक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।

योगदानकर्ताओं

डव
डॉ० विद्या चन्द ठाकुर
सम्पादक (Editor)
डक
डॉ० कुलदीप अग्निहोत्री
लेखक (Author)
सच
सुश्री चारू मित्तल
लेखक (Author)
CP
Shri Chander Pradesh
लेखक (Author)
बस
बाबा साहेब आपटे
लेखक (Author)
रप
राजकुमार पुंज
लेखक (Author)
ठर
ठाकुर राम सिंह
लेखक (Author)
चग
चेतराम गर्ग
सह सम्पादक (Co-Editor)

प्रकाशन सारांश

इतिहास दिवाकर - अप्रैल २००९

सम्पादकीय: नव संवत्सर : कलियुगाब्द 5111

भारतवर्ष में परम्परा के अनुसार एक वर्ष परिमाप में अनेक संवत् प्रचलित हैं जिनमें विक्रमी और शक संवत् सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। विक्रमी संवत् का उत्तरी और मध्य भारत में प्रतिष्ठित स्थान है तथा पश्चिमी और दक्षिण भारत में शक संवत् का व्यापक प्रचलन है। विक्रमी संवत् के प्रवर्तक उज्जैन के न्यायप्रिय शासक महाराजा विक्रमादित्य माने जाते हैं और शक संवत् की स्थापना प्रतिष्ठानपुर सौराष्ट्र के वीर पराक्रमी राजा शालिवाहन द्वारा की गई है। इन दोनों शासकों की एक बात समान रही है कि पहले महाराजा विक्रमादित्य ने विदेशी आक्रमणकारी शकों को हरा कर भारतवर्ष से बाहर किया और बाद में जब किसी तरह इनकी गतिविधियां फिर बढ़ी तो विक्रमी संवत् के 135 वर्ष पश्चात् राजा शालिवाहन ने शकों को पूरी तरह से पराजित करके देश को स्वतंत्र करवाया। विदेशी शत्रुओं से मुक्त देश को शक्ति और समृद्धि के शिखर पर पहुंचा कर कलियुगाब्द के 3044 वर्ष पश्चात् विक्रमी संवत् और 3179 वर्ष बाद शलिवाहन शक संवत् का प्रवर्तन हुआ। आज शासकीय मान्यता के कारण सामान्य कामकाज में प्रायः ईस्वी सन् का प्रयोग होता है लेकिन भारत की सनातन परम्परा से जुड़े समाज के प्रत्येक धार्मिक कृत्य व्रत, त्यौहार, जन्म से मृत्यु तक के सभी संस्कार आदि विक्रमी और शक संवत् की चान्द्रमास आधारित तिथियों अथवा सौरमास के प्रविष्टों के आधार पर ही सुनिश्चित होते हैं। इन दोनों तथा देश में प्रचलित अन्य संवतों के अतिरिक्त विगत वर्षों से राष्ट्रीय भावना के उत्थान के साथ भारतीय समाज पुनः अपने प्राचीन वैज्ञानिक संवत् कलियुगाब्द से अवगत हुआ है। इसे कलि संवत् या युगाब्द के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यह संवत् कलियुग की कालावधि को अभिव्यक्त करता है, अतः स्पष्टता की दृष्टि से इसे कलियुगाब्द कहा जाना ही उपयुक्त है।

विक्रमी, शक आदि संवत् जो भारत भूमि के इतिहास और संस्कृति के समृद्ध धरातल पर विकसित हुए, उनका प्रयोग हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान को अवश्य प्रतिबिम्बित करता है लेकिन हमें इस बात की जानकारी भी अवश्य रहनी चाहिये कि ये सब संवत् किसी व्यक्ति या कालक्रम में किसी घटना विशेष से सम्बंधित होने के कारण कालगणना के मौलिक वैज्ञानिक आधार नहीं हो सकते। वास्तव में कालगणना का सीधा सम्बंध काल से है और इसीलिये काल से जुड़ी गणना ही वैज्ञानिक कालगणना मानी जा सकती है।

राष्ट्र की गौरवशाली परम्परा की पहचान नव संवत्सर का प्रत्येक राष्ट्रवासी हृदय से अभिनन्दन करें तथा इस पावन अवसर पर सम्पूर्ण सृष्टि की मंगल कामना करें। ईश्वर चरणों में हमारी प्रार्थना है कि–
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत् ।
अर्थात् समस्त प्राणी सुख शांति से पूर्ण हों, सभी रोग व्याधि से मुक्त रहें, किसी के भी भाग में कोई दुःख न आवे और सभी कल्याण मार्ग का दर्शन एवं अनुसरण करें।

राष्ट्रीय महापर्व : वर्ष प्रतिपदा

• ठा० राम सिंह

वर्ष प्रतिपदा चैत्र मास के शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन प्रतिवर्ष आती है। अपने देश के घर–घर में वर्ष प्रतिपदा का पर्व बड़े उल्लास और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इसीलिये इस पावन दिवस को राष्ट्रीय महापर्व का महत्त्व प्राप्त है। ज्योतिष विद्या के प्रसिद्ध ग्रन्थ हेमाद्रि में उल्लिखित है कि सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को आरम्भ की थी। ब्रह्म पुराण में भी इसी प्रकार का उल्लेख है- चैत्र मासि जगद् ब्रह्मा ससर्ज प्रथमेऽह्नि । शुक्लपक्षे समग्रं तु तदा सूर्योदये सति ।। अर्थात् ब्रह्मा जी ने चैत्र मास में शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन सूर्योदय काल में सृष्टि की रचना की है।

कालान्तर में इस दिन के साथ राष्ट्रीय महत्त्व की कुछ ऐसी घटनाएं जुड़ गई जिससे इस पर्व को समाज में अत्यधिक आस्था और मान्यता प्राप्त हुई। जैसे सतयुग में जगत के त्राण के लिए भगवान् विष्णु ने इसी दिन मत्स्य रूप में पहला अवतार ग्रहण किया।

ईरान का उदाहरण

ईस्वी सन् २००१ के प्रथम दिन पहली जनवरी को ईरान के कुछ मुसलमानों ने नव वर्ष दिवस समारोह आयोजित किया। उनके इस अपराध के लिये वहां की सरकार ने उन्हें पचास-पचास कोड़े मारने का दंड दिया था। समारोह में सम्मिलित सभी पुरुषों और महिलाओं को यह सजा भुगतनी पड़ी। सरकार का कहना था कि पहली जनवरी ईसाइयों के नववर्ष का दिन है— मुसलमानों का नहीं। समाचार पत्रों में प्रकाशित यह घटना क्या हमारे लिये पाठ नहीं है? अतः हम भारत के नागरिक पहली जनवरी के स्थान पर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को अपना भारतीय नया वषीरम्भ मनाकर आत्मगौरव का अनुभव कर सकते हैं। हमें ईरान की भांति अपने संवत्सर का महत्त्व समझना चाहिए।

विक्रमी सम्वत् और शक सम्वत्

• राजकुमार पुंज

भारतीय कालगणना में काल की अवधि कल्प, मन्वन्तर, युग, संवत्सर आदि में विभाजित है। हिन्दू समाज का कोई भी व्यक्ति चाहे वह गांव में रहता है या शहर में, पढ़ा लिखा है या अनपढ़, भले ही काल की कल्प आदि लम्बी अवधियों के बारे में अधिक न जानता हो लेकिन वह चार युगों की जानकारी अवश्य रखता है। वह यह भी जानता है कि इस समय चार युगों में से कलियुग का समय चला हुआ है। काल पर आधारित कालगणना के अन्तर्गत लोक में कलियुग तथा चार युगों का बोध होना, हमारी कालगणना की समृद्ध परम्परा और वैज्ञानिकता का प्रतीक है। शास्त्रीय परम्परा हमें बताती है कि ईस्वी सन् २००९, २७ मार्च को चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन जब भारतीय कालगणना पर आधारित नया सम्वत् का आरम्भ है तो उस दिन से कलियुगाब्द ५१११ शुरू हो जाता है। इसके अतिरिक्त भारत के अनेक सम्वतों के नव वर्ष का पहला दिन यही है। जिनमें प्रमुख है विक्रमी सम्वत् और शक सम्वत्। २७ मार्च, २००९ की वर्ष प्रतिपदा से विक्रमी सम्वत् २०६६ तथा शक सम्वत् १९३१ का आरम्भ है।

डॉ० केशवराव बलिराम हेडगेवार

• बाबा साहेब आपटे

वर्ष प्रतिपदा महोत्सव हम लोग इस देश में प्रारम्भ से ही मनाते हैं। वर्ष प्रतिपदा स्फूर्ति एवं विजय का दिन है। हमारे देश में विभिन्न आक्रामक बाहर से आए। उन सभी को हमने मार भगाया। इतिहास हमें यह बताता है कि हमारे देश पर जब यूनानियों का आक्रमण हुआ था, तब चन्द्रगुप्त मौर्य ने उन्हें इस देश की सीमाओं के बाहर ही नहीं भगाया अपितु इस देश की सीमाएं भी बढ़ाई। यूनानियों के समान शकों ने भी आक्रमण किये। किन्तु यह आक्रमण यूनानियों से भिन्न थे। शकों ने अपना राज्य देश के अन्दर काफी दूर तक फैलाया था। विक्रमादित्य ने शकों को अपनी संस्कृति में आत्मसात् करने का बचा हुआ कार्य पूर्ण किया। इसीलिये उन्हें ‘शकारि विक्रमादित्य' कहा जाता है। जिस दिन यह कार्य पूर्ण हुआ वह दिन समाज के लिये एक विजय का दिन था। इसलिये उस दिन से शक संवत् की नई वर्षगणना शुरू हुई। हमारे समाज ने इस दिन 'वर्ष प्रतिपदा' को एक महोत्सव के रूप में मनाया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी वर्ष प्रतिपदा को उत्सव का स्थान दिया है, क्योंकि संघ भी यह कार्य करना चाहता है।

भारतेश्वर पृथ्वीराज चौहान का तराई के द्वितीय युद्ध में हारने का रहस्य

• सुश्री चारू मित्तल

भारत के अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान के जीवन वृत्त पर दो महत्त्वपूर्ण काव्य ग्रंथ-पृथ्वीराज रासो और पृथ्वीराज विजय लिखे गये हैं। हिन्दुस्तान की शिक्षा संस्थाओं में पृथ्वीराज चौहान के बारे में पढ़ाया जाता है कि पृथ्वीराज की कन्नौज के राजा जयचन्द से शत्रुता थी और इस कारण जयचन्द ने मुहम्मद गौरी को पृथ्वीराज पर आक्रमण करने के लिए बुलाया। जयचन्द ने पृथ्वीराज चौहान को हराने के लिए मुहम्मद गौरी की सहायता की। इस कारण पृथ्वीराज तराईन के द्वितीय युद्ध में हार गया। परंतु यह वास्तविकता नहीं है। पृथ्वीराज भारत का सम्राट था। जयचन्द उसके सामने कुछ भी नहीं था। पृथ्वीराज के हारने का कारण मुहम्मद गौरी भी नहीं था। अतः पृथ्वीराज के हारने के रहस्य को जानने के लिए पृथ्वीराज को जानना आवश्यक है।

युद्ध का परिणाम

दिल्ली पर मुसलमानों का राज हो गया। पृथ्वीराज की बनाई सुरक्षा पंक्ति (जम्मू से गुजरात तक) टूट गई और परिणाम स्वरूप १०० वर्ष के अन्दर इस्लाम की आक्रामक सेनाएं दक्षिण से हिन्दूसागर तक पहुंच गयी। घर का भेदी लंका ढाये। हमीर राय व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और देशद्रोहिता के कारण पृथ्वीराज हारा। मुहम्मद गौरी या जयचन्द के कारण नहीं। भारतीय इतिहास में जो भंयकर भूले हुई हैं उन सब में महाभंयकर भूल हमीर राय ने की। जिसने अपने व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को अपने देश से बड़ा माना और एक मास चन्दवरदाई के समझाने पर तथा पृथ्वीराज द्वारा क्षमा मागने को भी दुर्लक्षित कर दिया।